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Tuesday, July 4, 2017

पत्रकारिता मे आकर रुमानी ख्वाब, कैसै टूटते हैं


पत्रकारिता के लिए चित्र परिणाम

TOC NEWS // BHOPAL
राजेंद्र सिंह जादौन की जुबानी

पत्रकारिता में जब यूवा आता हैं तो बहुत रुमानी ख्याल और फौलादी इरादे साथ लाता हैं। अदम गोंडवी के इस शेर के जरिए उस ख्याल को कुछ यूं पेश कर रहा हु …

भूख के अहसास को शेरो सुखन तक ले चलो
या अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले चलो
जो गजल माशूक के जलवो से वाकिफ हो गई
उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक
ले चलो…

लेकिन जब यही हम करने चलते हैं और असलियत से साबका पड़ता है, तो सारी रुमानियत भरभरा कर गिर जाती है। इरादे टूट जाते हैं और यथार्थ की कठोरता हमें बदल देती है। हम पत्रकारिता में अभिव्यक्ति की आजादी, नैतिकता जैसी सीख लेकर आते हैं और जब ये करना शुरु करते हैं तो सच्चाई कुछ और दिखाई देती है। अभिव्यक्ति की आजादी संपादक की बंद अलमारी में खुली किताब की तरह होती है। 

हमें लगता था कि हमारे लिखने से दुनिया बदल जाएगी पर सच्चाई ये कि जो लिखते हैं उससे मैनेजमेंट की दुनिया बदलती है, समाज का कुछ नहीं। आप जरा सी उसकी नीतियों के खिलाफ गए और तलवार से आपका सिर कलम। नैतिकता आदि सैद्धांतिक बातें हैं जो प्रयोग के धरातल पर खंडित हो जाती है, सच कुछ और दिखाई देता है। पत्रकार नैतिकता का निर्वाह करे कि वह लिखे जो लिखने को कहा जा रही या जो उसे डिक्टेट किया जा रहा है। 
 
सच को छुपा कर नया सच गढने की गंदली कोशिश होती रहती है लगातार, आप सब सच नहीं लिख पाते क्योंकि अखबार पत्रिकाएं ब्रांड हैं। आप मैनेजमेंट के चंगुल में दबे हुए पपेट (कठपुतली) हैं। आपकी आवाज मैनेजमेंट की नीतियों के अनुसार निकलती है। आप अपनी राह पर नहीं चल सकते। सारी क्रांतियों की धूल गर्द ओ गुबार उडती रहती है। पत्रकारिता में कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम ने बहुत बेडा गर्क किया है। ऐसे में जेनुइन पत्रकार अपनी नौकरी बचाए कि नैतिकता।
 
जब में रिपोर्टर के तौर पर काम करता था तो मुझे लगता था कि संपादक के निर्देश के चलते कई गड़बड़िया की जा रही है, पर जब में स्वंय दो साल के लिए संपादक बना तो मुझे एहसास हुआ कि वाकई संपादक कितना बेचारा होता है। वे तो मार्केट और मैनेजमेंट के बीच पिस रह होते है। उसके मुंह से कोई और बोल रहा होता है।
अंग्रेजी और हिंदी पत्रकारिता में भी काफी फर्क है जो अंतर भारत और इंडिया के बीच है, उतना ही बड़ां अंतर दोनों भाषाओं की पत्रकारिता की बीच स्पष्ट तौर पर दिखता है।
 
मैनेजमेंट पत्रकारो को कई सुविधाएं देता है और उसे अपना गुलाम बनाना चाहता है। आप उसके खिलाफ लिखेंगे तो मारे जाएंगे या दरबदर की ठोकर खाएंगे। दुनिया भर में पत्रकार इसीलिए तो मारे जा रहे कि वे बेखौफ अपनी नैतिकता बचाना चाहते हैं, सच लिखना चाहते है, प्रशासन का भोंपू नहीं बनना चाहते।
 
पत्रकार आज कई तरह के दबावों में काम करता है। कई कारक हैं जो उसके काम को प्रभावित करते हैं। ठेका सिस्टम, मैनेजमेंट की पॉलिसी, अपनी नैतिकता कायम रखने का संकल्प, प्रशासन का भय, बंटा हुआ समाज, ये सब मिल कर उसके लेखन पर दबाव बनाते हैं। ऐसे में इन सबके बीच संतुलन बैठाने के चक्कर में विचारधाराएं उसके लिए बहुत बडी बाधक बनती है। 
 
आज मीडिया जनता के बीच सबसे अधिक संदिग्ध है। और पत्रकारिता के लिए एक बड़ा सवाल उठता है कि पत्रकारिता के मूल्य कैसे बचे ?
 
👉
(एक संपादक की पोस्ट और दर्द का गुबार)

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