महादेव जाने को पैसे दे ओ ना , पैसे दे ओ ना.......
बैतूल , बडा हो या छोटा गरीब हो या अमीर सभी नंगे पांव पैरो में घुंघरू बांध कर कंधे पर भारी वजनी त्रिशूल को लेकर नाचते हुए गा रहे थे महादेव जाने को पैसे दे ओ ना , पैसे दे ओ ना....... महाराष्ट से लेकर बैतूल के दुरस्थ गांवो से शिव भक्तो का भीख मांगते बडा महादेव जाने का अंदाज कोई आज का नहीं बरसो पुराना है। बैतूल जिले की सीमा से लगी पचमढी बडा महादेव की पहली पायरी तक पहुंचने का रास्ता जिले से जाता है। सतपुडाचंल में यूं तो बडा महादेव पचमढी एवं छोटा महादेव भोपाली हर साल लाखो की संख्या में शिव भक्त जाते है। मराठी भाषी एवं आदिवासी समाज के बीच गांवो से निकली पदायात्रियों की टोली का अंदाज अजूबा होता है। आस्था एवं विश्वास तथा श्रद्धा का त्रिवेणी संगम तब और भी भक्तीमय हो जाता है जब पूरे गांव के लोग ऐसे पदयात्रियों का जगह - जगह भव्य स्वागत एवं आतिथ्य सत्कार करते है। बडादेव के रूप में पूज्यनीय आदिवासी के देवाधिदेव की यात्रा उनके लिए भी रोमांच से भरी होती है। बैलो को सजाधजा कर बैलगाडी से पूरे एक पखवाडे की धार्मिक यात्रा के बाद लौटते भक्त गांव में प्रवेश करने से पहले ताप्ती, पूर्णा, वर्धा, देनवा , बेल नदियों में स्नान करते है। आठनेर नगर के 80 वर्षीय रिटायर कर्मचारी माधोराव लोखंडे भगवान शिव के भक्त हैं। 80 वर्ष की उम्र में वे 111 किलो वजन के त्रिशूल को कंधे पर रखकर शिव भजनों की धुन पर नृत्य करते हैं। वे भोला मंडल के साथ 60 सालों से लगातार पचमढ़ी की यात्रा कर रहे हैं। अभी नगर में पचमढ़ी भोलेनाथ के दरबार में चढ़ाए जाने वाले त्रिशूल की घर.घर पूजा अर्चना का क्रम जारी है। माधोराव लोखंडे ने बताया कि उनके मंडल सदस्य महाशिवरात्रि पर पचमढ़ी में भोले बाबा के दरबार में पहुंचेंगे। इसके पहले नगर में त्रिशूल की पूजा अर्चना की जाती है। |
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