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Saturday, May 16, 2026

आइसना मध्य प्रदेश इकाई में वरिष्ठ पत्रकार कैलाश गौर प्रदेश उपाध्यक्ष नियुक्त


आइसना मध्य प्रदेश इकाई में वरिष्ठ पत्रकार कैलाश गौर प्रदेश उपाध्यक्ष नियुक्त


भोपाल । ऑल इंडिया स्माल पेपर्स एसोसिएशन (आइसना) मध्यप्रदेश इकाई में श्री कैलाश गौर जी को प्रांतीय उपाध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया है।

वरिष्ठ पत्रकार कैलाश गौर जी की संगठन के प्रति कर्मठता और जुझारू छवि को देखते हुए संगठन के मध्य प्रदेश के प्रांतीय अध्यक्ष विनय जी. डेविड ने मध्यप्रदेश प्रांतीय इकाई में शामिल करते हुए उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया है।
कैलाश गौर जी ने पूर्व में कई पत्रकार संगठनों में प्रांतीय पदाधिकारी के रूप में सेवा दी है एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने दैनिक भास्कर भोपाल में कई वर्षों तक अपनी सेवा दी है। अभी हाल में इंदौर के दैनिक नवभारत में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।



आइसना मध्य प्रदेश इकाई में वरिष्ठ पत्रकार कैलाश गौर प्रदेश उपाध्यक्ष नियुक्त



ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन (आइसना) के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री शिव शंकर त्रिपाठी जी ने आशीर्वाद एवं सभी संगठन के पदाधिकारियों एवं सदस्य गणों की ओर से आपको इस विशेष अवसर पर ढेर सारी शुभकामनाएं दी गई है।
आप सभी पदाधिकारी एवं सदस्यगण कैलाश गौर जी को इस विशेष अवसर पर बधाइयां शुभकामनाएं दे सकते हैं।
शुभकामनाओं सहित

विनय जी. डेविड
9893221036
प्रांतीय अध्यक्ष (मध्य प्रदेश)
ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
(आइसना)

Tuesday, May 12, 2026

कोर्ट का बड़ा फैसला देखें : मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का डर दिखाकर 85 लाख सब्सक्राइबर्स वाले 4PM चैनल को बंद कर दिया, कोर्ट को कहना पड़ा चैनल बहाल करो

कोर्ट का बड़ा फैसला देखें : मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का डर दिखाकर 85 लाख सब्सक्राइबर्स वाले 4PM चैनल को बंद कर दिया, कोर्ट को कहना पड़ा चैनल बहाल करो


मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का डर दिखाकर 85 लाख सब्सक्राइबर्स वाले 4PM चैनल को बंद कर दिया. लेकिन जब मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुँचा तो सच अदालत के रिकॉर्ड में खुद सामने आ गया.

कोर्ट ने साफ लिखा कि 4PM पर लगभग 50 हजार वीडियो थे और उनमें से सिर्फ 26 वीडियो पर आपत्ति जताई गई.
फिर सवाल ये है कि 50 हजार वीडियो वाले पूरे चैनल को क्यों बंद किया गया ! क्या यही लोकतंत्र है !
अगर 26 वीडियो पर विवाद था तो कानून के मुताबिक उन्हीं वीडियो पर कार्रवाई होनी चाहिए थी.
लेकिन यहाँ पूरा चैनल बंद कर दिया गया. यानी निशाना वीडियो नहीं था. निशाना आवाज थी.
सरकार अदालत में राष्ट्रीय सुरक्षा और पब्लिक ऑर्डर जैसे भारी-भरकम शब्द लेकर पहुँची. लेकिन आखिर में कोर्ट को कहना पड़ा कि कथित आपत्तिजनक वीडियो अस्थायी रूप से ब्लॉक करो और चैनल बहाल करो.
मतलब साफ है. करोड़ों दर्शकों की आवाज बंद करने की कोशिश की गई.
आज देश में हालत ये है कि सरकार से सवाल पूछो तो राष्ट्रविरोधी सच दिखाओ तो खतरा और सत्ता की आलोचना करो तो पूरा चैनल बंद.



लेकिन याद रखिए.
4PM बिकने वालों में नहीं है.
डरने वालों में नहीं है.
झुकने वालों में नहीं है.
मोदी सरकार पूरी ताकत लगाकर भी सच की आवाज को स्थायी रूप से बंद नहीं कर सकी.
आखिरकार अदालत के रिकॉर्ड में दर्ज हो गया कि 50 हजार वीडियो वाले चैनल को सिर्फ 26 वीडियो के नाम पर बंद किया गया था. साथ ही ये आज तक नहीं बताया गया कि इन 26 विडियो में आपत्तिजनक क्या था !
इतिहास गवाह है.
सत्ता हमेशा सवालों से डरती है.
और जब सरकार मीडिया से डरने लगे, समझ लीजिए सच अभी जिंदा है


सच की जीत हुई है। आवाज बंद करने की एक और कोशिश नाकाम साबित हुई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने 4PM चैनल को खोलने का फैसला जारी कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि चैनल पर 50 हजार वीडियो अपलोड किए गए हैं। सरकार को 26 वीडियो पर आपत्ति है, तो सिर्फ उन वीडियो को temporary तौर पर ब्लॉक किया जाए। और सरकार कारण भी बताए कि उन 26 वीडियो में क्या दिक्कत है? साथ ही, सरकार, 4PM को उन 26 वीडियो पर अपना पक्ष रखने के लिए समय दे। इस फैसले से एक बार फिर साबित हो गया है, देश में सच अभी कहा जाता रहेगा। और ये भी कि सरकार इस तरह से मनमाने फैसले नहीं ले सकती। और सवाल पूछना, सच दिखाना ही असली देशभक्ति है। 4PM बिना डरे, बिना दबे, सच कहता रहेगा। इस मौके पर आप सभी दर्शकों का शुक्रिया, आभार।











Tuesday, March 31, 2026

समस्त पत्रकार बंधुओं एवं उनके परिवार हेतु शैल्बी अस्पताल में निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर 31 मार्च 2026 को


जबलपुर के समस्त पत्रकार बंधुओं एवं उनके परिवार हेतु शैल्बी अस्पताल में निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर 31 मार्च 2026 को

 *जबलपुर के पत्रकारों के लिए विशेष सूचना* 

 *जबलपुर के समस्त पत्रकार बंधुओं एवं उनके परिवार हेतु शैल्बी अस्पताल में निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर 31 मार्च 2026 को*

 *दिनांक:* 31 मार्च 2026

⏰ *समय:* प्रातः 10:00 बजे से दोपहर 2:00 बजे तक

पत्रकार बंधुओं के देश के प्रति समर्पण और उनके सेवा भाव को नमन करते हुए, *“जो हैं देश की सेवा में, शैल्बी उनकी सेवा में”* इस विशेष पहल के अंतर्गत एक *विशाल निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर* का आयोजन किया जा रहा है।

शैल्बी अस्पताल, अहिंसा चौक, जबलपुर के के द्वारा इलेक्ट्रॉनिक प्रिंट मीडिया के समस्त वीडियो/फोटो ग्राफर, पत्रकारों एवं उनके परिवारों के लिए निशुल्क स्वास्थ्य शिविर दिनांक 31 मार्च 2026 को सुबह 10:00 बजे से दोपहर 2:00 बजे तक आयोजित किया जा रहा है।


इस शिविर में उपलब्ध निःशुल्क सुविधाएँ :

1. हड्डी, मस्तिष्क, कैंसर, हृदय रोग, शिशु रोग, पेट, छाती आदि समस्त विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा निःशुल्क परामर्श

2. लगभग ₹ 4500 तक की जाँचें पूर्णतः निःशुल्क जिनमें -ECG, PFT, Uric Acid, Blood Sugar आदि शामिल हैं।

3. आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त रेडियोलॉजी एवं पैथोलॉजी जाँचों में 20% तक की छूट

4. दवाओं पर 10% तक की विशेष छूट

आइए, इस अवसर का लाभ उठाएं और अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य की जांच कराएं।

*आपकी सेवा में सदैव तत्पर – शैल्बी अस्पताल*

Saturday, March 28, 2026

शराब का कारोबार मौलिक अधिकार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने डिस्टिलरी के लाइसेंस सस्पेंड करने का फैसले सही ठहराया

जस्टिस विवेक अग्रवाल की बेंच ने :
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सोम डिस्टिलरीज़ के कई लाइसेंस सस्पेंड करने के फैसले को सही ठहराया

सभी जिले एवं तहसीलों में ब्यूरो संवाददाताओं की आवश्यकता है हमसे  (https://timesofcrime.com/ ) जुड़ने के लिए संपर्क करें : 9893221036 

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सोम डिस्टिलरीज़ के कई लाइसेंस सस्पेंड करने के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि शराब का कारोबार कोई मौलिक अधिकार नहीं है और यह सख्त कानूनी नियमों के अधीन है।

जस्टिस विवेक अग्रवाल की बेंच ने कहा:

"पहली बात तो यह कि शराब का कारोबार कोई मौलिक अधिकार नहीं है। दूसरी बात यह कि जब आनुपातिकता (Proportionality) की कसौटी पर इसे परखा जाता है तो उस आधार पर भी अथॉरिटी का फैसला एक्साइज एक्ट और उसके तहत बनाए गए नियमों के दायरे में है, इसलिए इसमें कोई गलती नहीं निकाली जा सकती।"

याचिकाकर्ताओं ने 4 फरवरी, 2026 को एक्साइज कमिश्नर द्वारा जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें दो संस्थाओं - सोम डिस्टिलरीज़ प्राइवेट लिमिटेड और सोम डिस्टिलरीज़ एंड ब्रूअरीज़ प्राइवेट लिमिटेड - को दिए गए आठ लाइसेंस सस्पेंड कर दिए गए।

यह कार्रवाई फरवरी 2024 में जारी एक 'कारण बताओ नोटिस' (Show-Cause Notice) के आधार पर की गई। यह नोटिस, जाली परमिट का इस्तेमाल करके अवैध रूप से शराब की ढुलाई करने के मामले में हुई आपराधिक सज़ाओं के चलते जारी किया गया। जिन लाइसेंसों की बात हो रही है, उनकी मूल समय सीमा 31 मार्च, 2024 को खत्म हो गई, लेकिन बाद में उन्हें अगले सालों के लिए रिन्यू कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि 'कारण बताओ नोटिस' मूल लाइसेंस की अवधि खत्म होने के बाद लागू नहीं रह सकता और इसे रिन्यू किए गए लाइसेंसों पर लागू नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि पुराने लाइसेंसों की अवधि खत्म होते ही 'कारण बताओ नोटिस' बेअसर हो गया। इसे अगले सालों के लिए रिन्यू किए गए लाइसेंसों पर लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे यह भी कहा कि चूंकि आपराधिक मामलों में अपील दायर की जा चुकी है और सज़ाओं पर रोक लगा दी गई, इसलिए 'कारण बताओ नोटिस' का मूल आधार ही खत्म हो गया।

वकील ने आगे तर्क दिया कि इसमें 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' का उल्लंघन हुआ। इसमें सुनवाई का उचित मौका न मिलना और दो अलग-अलग संस्थाओं के खिलाफ एक ही (संयुक्त) 'कारण बताओ नोटिस' जारी करना शामिल है।

इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि कर्मचारियों को मिली सज़ाओं के लिए कंपनियों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह कि संबंधित कानूनी प्रावधानों का गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया।

राज्य सरकार के वकील ने तर्क दिया कि लाइसेंसों का सालाना रिन्यूअल इस शर्त पर होता है कि कानूनी प्रावधानों का पालन किया जाएगा। इसलिए पहले किए गए उल्लंघनों के कानूनी परिणाम अभी भी लागू रहेंगे। उन्होंने आगे यह भी तर्क दिया कि आपराधिक सज़ा पर कोई रोक (Stay) नहीं लगी है। सिर्फ सज़ा को सस्पेंड कर देने से यह साबित नहीं हो जाता कि वे दोषी नहीं हैं।

अदालत ने याचिकाकर्ता के तर्कों को खारिज कर दिया, यह मानते हुए कि लाइसेंस नए सिरे से दिए गए अनुदान नहीं थे, बल्कि अधिनियम और नियमों के पालन की शर्त पर उनका नवीनीकरण किया गया। इसलिए नवीनीकरण होने पर पिछली अनियमितताओं का महत्व समाप्त नहीं हो गया।

इसके अलावा, अदालत ने स्पष्ट किया कि सज़ा का निलंबन दोषसिद्धि (Conviction) पर रोक के बराबर नहीं होता; अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा कोई भी साक्ष्य पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि दोषसिद्धि पर ही रोक लगा दी गई।

नैसर्गिक न्याय के मुद्दे पर अदालत ने पाया कि धारा 31(1-A) के तहत वैधानिक आवश्यकताओं का विधिवत पालन किया गया, क्योंकि कारण बताओ नोटिस में कारणों का उल्लेख था, आवश्यक विवरण दिए गए और जवाब देने का अवसर भी प्रदान किया गया। अदालत ने आगे यह भी कहा कि याचिकाकर्ता अपने जवाबों में जाली परमिट का उपयोग करके शराब की ढुलाई करने के मुख्य आरोप से इनकार करने में विफल रहे, जो उनके खिलाफ गया।

अदालत ने फैसला सुनाया,

"यहां तक ​​कि लाइसेंस के खंड V में भी शर्तों के उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान है। इसलिए इस कसौटी पर भी आबकारी आयुक्त के कार्य में कोई दोष नहीं निकाला जा सकता।"

अदालत ने आगे यह भी कहा कि आबकारी अधिनियम की धारा 31(1)(c) और 44 के तहत कर्मचारियों, एजेंटों और लाइसेंस धारक की ओर से कार्य करने वाले व्यक्तियों के कार्यों के लिए लाइसेंस धारक को ही जिम्मेदार माना जाता है। इस प्रकार, ड्राइवर, क्लीनर और अन्य संबंधित व्यक्तियों की दोषसिद्धि ही वैधानिक परिणामों को लागू करने के लिए पर्याप्त थी।

पीठ ने कहा,

"इस प्रकार, 'कोई भी व्यक्ति जो उसकी (लाइसेंस धारक की) ओर से उसकी स्पष्ट या निहित अनुमति से कार्य कर रहा हो' - इस वाक्यांश में उस ट्रक का ड्राइवर और क्लीनर भी शामिल होगा, जिसमें सामग्री की ढुलाई की गई। इसलिए मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत उनकी दोषसिद्धि, आबकारी अधिनियम की धारा 31 की उप-धारा (1) के खंड (c) की भाषा के अनुसार, लाइसेंस धारक पर भी बाध्यकारी होगी।"

आनुपातिकता के सिद्धांत (Doctrine of Proportionality) को लागू करते हुए अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि उल्लंघन की गंभीरता को देखते हुए - जिसमें जाली परमिट का उपयोग और आबकारी राजस्व की हानि शामिल थी - राज्य द्वारा की गई कार्रवाई उचित और न्यायसंगत थी।

पीठ ने टिप्पणी की,

"इसलिए विदेशी शराब की ढुलाई के लिए जाली परमिट का उपयोग करके की गई धोखाधड़ी के संदर्भ में प्रतिवादियों के विवादित कार्यों को जब आनुपातिकता के सिद्धांत की कसौटी पर परखा जाता है, तो उनमें कोई दोष नहीं निकाला जा सकता।"

इस प्रकार, अदालत ने रिट याचिका खारिज की।

Case Title: Som Distilleries v State of Madhya Pradesh [WP-4915-2026]


Sunday, February 22, 2026

आइसना पत्रकार संगठन के 9वें सम्मान समारोह 2026 में वृद्धाश्रम एवं समाज सेवियों का सम्मान


आइसना पत्रकार संगठन के 9वें सम्मान समारोह 2026 में वृद्धाश्रम एवं समाज सेवियों का सम्मान

सभी जिले एवं तहसीलों में ब्यूरो संवाददाताओं की आवश्यकता है हमसे  (https://timesofcrime.com/ ) जुड़ने के लिए संपर्क करें : 9893221036

वरिष्ठ पत्रकार नीलेश जाट, सौरभ राठौर, पंचम कुशवाहा का हुआ सम्मान

नरसिंहपुर। देश के सबसे संघर्षशील एवं 44 वर्षों से पत्रकारों के हितों में सेवा संघर्ष करने वाले ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर एसोसिएशन (आइसना ) राष्ट्रीय स्तरीय पत्रकार संगठन के द्वारा विगत नो वर्षों से पत्रकार सम्मेलन एवं सम्मान समारोह का आयोजन सतत रूप से किया जा रहा है जिसमे वरिष्ठ पत्रकारों और सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों का सम्मान किया गया ।


आइसना पत्रकार संगठन के 9वें सम्मान समारोह 2026 में वृद्धाश्रम एवं समाज सेवियों का सम्मान

22 फरवरी 2026 में मां नर्मदा के तट सीढी घाट पर आयोजित इस कार्यक्रम में भोपाल एवं जबलपुर से पधारे वरिष्ठ पत्रकारों एवं आईसना संगठन के प्रांतीय अध्यक्ष विनय जी. डेविड, प्रदेश महासचिव पंडित विनोद मिश्रा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अमर नौरिया, प्रदेश संगठन महामंत्री प्रशांत वैश्य, प्रदेश उपाध्यक्ष प्रहलाद कौरव, प्रांतीय उप सचिव कुणाल सिंह कार्यक्रम के जिला संयोजक केशव स्थापक कार्यक्रम प्रभारी और जिला अध्यक्ष राजेश लोधी संगठन को लेकर और पत्रकारिता क्षेत्र को लेकर अपने-अपने विचार रखें उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता बहुत कठिन दौर से गुजर रही है धरातल की पत्रकारिता वही है जो हर छोटे बड़े मुद्दे जनता से जुड़े मुद्दे उठाएं घोटालों को जनता के सामने लाना, अपनी कलम से उसे उजागर करना यही असली पत्रकारिता है पर आज ऐसे पत्रकारों को सबसे ज्यादा संघर्ष करना पड़ रहा है जो घोटालों की परत खोल रहे है।


आइसना पत्रकार संगठन के 9वें सम्मान समारोह 2026 में वृद्धाश्रम एवं समाज सेवियों का सम्मान


इस सफल कार्यक्रम के लिए सभी ने संगठन के सदस्यों की एकता एकजुटता की भी प्रशंसा की और कहा कि आइसना संगठन लगातार पत्रकारों के हितों में कार्य कर रहा है, संगठन के सदस्यों की एकजुटता से ऐसे आयोजन सतत रूप से होना संभव हुआ है.


आइसना पत्रकार संगठन के 9वें सम्मान समारोह 2026 में वृद्धाश्रम एवं समाज सेवियों का सम्मान

इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार नीलेश जाट ,सौरव राठौर और गाडरवारा के वरिष्ठ पत्रकार पंचम कुशवाहा जी का नगद राशि और स्मृति चिन्ह भेट कर सम्मान किया गया ।

वहीं गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने के लिए करने के लिए संघर्ष करने वाले अनुराग भार्गव जी का भी सम्मान किया इस मौकों पर सिख समाज से भी कुछ वरिष्ठ शामिल हुए जिसमें जनरल सिंह और लखवीर सिंह द्वारा भी अपने विचार रखे ।


आइसना पत्रकार संगठन के 9वें सम्मान समारोह 2026 में वृद्धाश्रम एवं समाज सेवियों का सम्मान

श्री बुद्ध प्रकाश विश्वकर्मा जी को नशे के खिलाफ आवाज उठाने के लिए और सुरेश ठाकुर को समाज सेवा के लिए सम्मानित किया गया वही संगठन के सहयोग के लिए बरमान के युवा पत्रकार सुभाष और वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर मालवीय जी को सम्मानित किया गया ।


आइसना पत्रकार संगठन के 9वें सम्मान समारोह 2026 में वृद्धाश्रम एवं समाज सेवियों का सम्मान

इस मौके पर प्रदेश अध्यक्ष विनय जी. डेविड द्वारा सभी पत्रकार बंधुओ को प्रशंसा पत्र से सम्मानित किया गया, जिसमें संपादक गौरव रैकवार, धर्मपाल रजक, शिल्पी जैन , सचिन जोशी, सुश्री मालती गुर्जर, अरुण शर्मा, दीपक अग्रवाल, रंजीत तोमर, डाक्टर बृजेश रजक, अंकित नेमा आशीष दुबे, लीलाधर लोधी यश वर्मा, दीपक मुदगल सहित अनेक पत्रकारों को सम्मान पत्र प्रदत्त किए गए ।


आइसना पत्रकार संगठन के 9वें सम्मान समारोह 2026 में वृद्धाश्रम एवं समाज सेवियों का सम्मान

कार्यक्रम वरिष्ठ पत्रकार प्रदेश सह सचिव मंजीत सिंह छाबड़ा जी द्वारा आयोजित किया गया कार्यक्रम में सभी वरिष्ठ पत्रकारों के साथ समाज सेबी भी उपस्थित रहे, साथ ही उनका सम्मान-साल श्रीफल व सम्मान पत्र देकर किया गया।


आइसना पत्रकार संगठन के 9वें सम्मान समारोह 2026 में वृद्धाश्रम एवं समाज सेवियों का सम्मान

नर्मदा घाट में हुए इस आयोजन में जबलपुर जिले से पत्रकार पुष्पेंद्र सिंह परिहार, पत्रकार राज गुलाटी, शैलेन्द्र शेलू सहित अन्य लोग उपस्थित हुए।


आइसना पत्रकार संगठन के 9वें सम्मान समारोह 2026 में वृद्धाश्रम एवं समाज सेवियों का सम्मान


मंच संचालन मंजीत छाबड़ा और आभार कार्यक्रम के संयोजक केशव स्थापक द्वारा किया गया ।

Thursday, February 5, 2026

ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ( आइसना ) का संभागीय सम्मान समारोह 22 फरवरी 2026 को नरसिंहपुर में


ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ( आइसना ) का संभागीय सम्मान समारोह 22 फरवरी 2026


ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ( आइसना ) का संभागीय सम्मान समारोह 22 फरवरी 2026 को नरसिंहपुर के मां नर्मदा बरमान के तट परआयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन नरसिंहपुर के बरमान घाट पर लगातार 9 बरसों से आयोजित हो रहा है। इस वर्ष फिर प्रदेश सहसचिव मनजीत छाबड़ा जी एवं नरसिंहपुर जिला इकाई के तत्वाधान में आयोजित किया जा रहा है। इस आयोजन में क्षेत्रीय स्तर के पत्रकार एवं समाज सेवी साथियों को विभिन्न विधाओं में सम्मानित किया जाएगा। 

ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ( आइसना ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री शिव शंकर त्रिपाठी जी एवं मध्य प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष विनय जी. डेविड  ने इस आयोजन की सफलता के लिए शुभकामनाएं दी हैं। आप सभी क्षेत्रीय पत्रकार साथी का इस गरिमामय आयोजन में शामिल होने का विनम्र आग्रह हैं।

विनय जी. डेविड

9893221036

प्रदेश अध्यक्ष ( मध्य प्रदेश )

ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ( आइसना )

Tuesday, January 20, 2026

प्रदेश भर के 70 पत्रकार एवं 20 जनसंपर्क विभाग के अधिकारी - कर्मचारी हुए संम्मानित


प्रदेश भर के 70 पत्रकार एवं 20 जनसंपर्क विभाग के अधिकारी - कर्मचारी हुए संम्मानित


जिले एवं तहसीलों में ब्यूरो संवाददाताओं की आवश्यकता है हमसे जुड़ने के लिए संपर्क करें : 9893221036

भोपाल। खोजी पत्रकार यूनियन एवं सर्च स्टोरी मीडिया ग्रुप के संयुक्त तत्वावधान में, सर्च स्टोरी, अंतिम खबर एवं टीएनपी न्यूज़ चैनल के सहयोग से एक भव्य सम्मान समारोह का आयोजन भोपाल में किया गया। इस समारोह का उद्देश्य पत्रकारिता और जनसंपर्क के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित कर उनका उत्साहवर्धन करना रहा।

इस अवसर पर टीएनपी न्यूज़ चैनल से जुड़े प्रदेश भर के लगभग 70 सक्रिय संवाददाताओं को उनके निष्ठावान, निर्भीक एवं जनहितकारी पत्रकारिता कार्य के लिए सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया गया कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारों की भूमिका आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी पहले थी, और उनकी जिम्मेदारी समाज के प्रति और भी बढ़ गई है।
समारोह के दौरान जनसंपर्क विभाग में कार्यरत 12 अधिकारियों एवं 4 कर्मचारियों को भी उनके विभागीय दायित्वों के कुशल निर्वहन, सूचना के पारदर्शी प्रसार एवं मीडिया के साथ समन्वयपूर्ण कार्य के लिए सम्मान प्रदान किया गया। इसके साथ ही 2 सेवानिवृत्त अधिकारियों सैयद ताहिर अली ,सुश्री उमा भार्गव एवं एक सेवानिवृत्त फोटोग्राफर आगा मियां को उनके लंबे, समर्पित एवं अनुकरणीय सेवा कार्यों के लिए विशेष सम्मान से नवाज़ा गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बाबूलाल बंजारा, अध्यक्ष घुमंतू, अर्धघुमंतू एवं विमुक्त अभिकरण (कैबिनेट दर्जा) ने अपने संबोधन में कहा कि पत्रकार समाज की आवाज़ होते हैं और उनकी निष्पक्षता व निर्भीकता ही लोकतंत्र को मजबूत बनाती है। उन्होंने पत्रकारों से सामाजिक सरोकारों, वंचित वर्गों और आम जनता के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का आह्वान किया।
वरिष्ठ पत्रकार राधा बल्लभ शरद ने अपने विचार रखते हुए कहा कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व है। उन्होंने युवा पत्रकारों को तथ्यपरक, संतुलित एवं नैतिक पत्रकारिता अपनाने की सलाह दी और सम्मानित किए गए सभी पत्रकारों एवं अधिकारियों को बधाई दी।
समारोह में सर्च स्टोरी के समूह संपादक एवं सर्च स्टोरी मीडिया ग्रुप के सीएमडी राजेन्द्र सिंह जादौन भी विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि सर्च स्टोरी मीडिया ग्रुप का उद्देश्य सदैव जनहित, जवाबदेही और सच्चाई को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करना रहा है। उन्होंने सभी सम्मानित प्रतिभागियों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन मीडिया जगत को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान करते हैं।
कार्यक्रम सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ, जिसमें पत्रकारों, अधिकारियों एवं अतिथियों की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही। अंत में सभी सम्मानित जनों को उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएँ दी गईं।

Sunday, January 11, 2026

कर्मचारियों के बकाया भुगतान के लिए सहारा इंडिया की संपत्तियों को बेचा जाए : परमानंद पांडे महासचिव: आईएफडब्ल्यूजे


कर्मचारियों के बकाया भुगतान के लिए सहारा इंडिया की संपत्तियों को बेचा जाए : परमानंद पांडे महासचिव: आईएफडब्ल्यूजे

नई दिल्ली, 10 जनवरी 2026 . इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (आईएफडब्ल्यूजे) ने सभी प्रकाशन केंद्रों पर दैनिक राष्ट्रीय सहारा अखबार के मनमाने ढंग से बंद किए जाने पर गहरा दुख और शोक व्यक्त किया है। केंद्रीय श्रम मंत्री और केंद्रीय श्रम आयुक्त को लिखे पत्र में, आईएफडब्ल्यूजे के महासचिव परमानंद पांडे ने श्रम कानूनों के अनिवार्य प्रावधानों का पालन किए बिना अखबार का संचालन बंद करने के लिए सहारा प्रबंधन की कड़ी निंदा की है। 

उन्होंने कहा कि देश के कानून की ऐसी घोर अवहेलना बर्दाश्त नहीं की जा सकती। श्री पांडे ने जोर दिया कि अचानक बंद होने से सैकड़ों कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं, उनके परिवार संकट में हैं और कड़ाके की ठंड में जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 

उन्होंने आगे कहा कि सहारा प्रबंधन, जो कथित धोखाधड़ी और छल के माध्यम से संपत्तियों का विशाल साम्राज्य बनाने के लिए पहले से ही कुख्यात है, ने एक बार फिर न्याय के प्रति अपनी अवमानना ​​का प्रदर्शन किया है। समूह के पूर्व मालिक ने धोखाधड़ी के मामलों में लंबी जेल की सजा भी काटी है, जो उसके दुराचार की गंभीरता को रेखांकित करता है। 

आईएफडब्ल्यूजे मांग करता है कि कर्मचारियों के बकाया भुगतान के लिए सहारा इंडिया की संपत्तियों को बेचा जाए। रोजगार कानून के तहत, किसी भी संगठन के अवैध रूप से बंद होने के बाद श्रमिकों के दावों को पहली शिकायत के रूप में माना जाना चाहिए।

फेडरेशन ने सहारा प्रबंधन के खिलाफ दृढ़ संघर्ष छेड़ने और कर्मचारियों के अधिकारों और हितों की रक्षा करने में विफल रहने वाली राज्य सरकारों को जवाबदेह ठहराने का संकल्प लिया है। 

परमानंद पांडे महासचिव: आईएफडब्ल्यूजे

Thursday, December 4, 2025

आईसना संगठन की आरती त्रिपाठी एवं अरुण त्रिपाठी जी को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में सदस्य मनोनीत

आरती त्रिपाठी एवं अरुण त्रिपाठी जी को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में सदस्य मनोनीत 


ऑल इंडिया स्मॉल न्यूजपेपर्स एसोसिएशन (A.I.S.N.A) संगठन के लिए गर्व का क्षण आया है, जब एसोसिएशन के दो राष्ट्रीय पदाधिकारियों राष्ट्रीय महासचिव आरती त्रिपाठी एवं अरुण त्रिपाठी जी को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में विधिवत सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया है। यह नियुक्ति संगठन तथा देशभर के पत्रकारों के लिए सम्मान और खुशियों का विषय है।


जिसमें कल 3 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में भारत के राजपत्र में अधिसूचित के अनुसार ऑल इंडिया स्मॉल न्यूज़पेपर्स एसोसिएशन के दो राष्ट्रीय पदाधिकारियों को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में विधिवत सदस्यता शामिल होने पर संगठन में हर्ष की लहर, पत्रकार हितों की मजबूती की उम्मीद है।

भारत के राजपत्र में आईसना संगठन की राष्ट्रीय नेतृत्व क्षमता और पत्रकार हितों की सक्रिय आवाज को देखते हुए दोनों पदाधिकारियों को इस प्रतिष्ठित पद पर जिम्मेदारी सौंपी गई है। इस नियुक्ति के बाद संगठन के सदस्यों एवं प्रदेश इकाइयों में उत्साह का माहौल देखा जा रहा है।

आईसना के पदाधिकारियों आरती त्रिपाठी एवं अरुण त्रिपाठी ने PCI सदस्य बनने के अवसर पर कहा कि यह प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में संगठन की भूमिका को और मजबूती देगा और आने वाले समय में छोटे एवं मध्यम समाचार पत्रों के हितों की रक्षा तथा पत्रकार सुरक्षा के मुद्दों पर महत्वपूर्ण पहल की जाएगी।

इस मौके पर आईसना संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं संरक्षक उत्तराखंड सरदार गुरदीप सिंह टोनी जी ने अपने दोनों राष्ट्रीय पदाधिकारियों को PCI में शामिल होने पर उन्हें शुभकामनाएं और बधाई दी है तथा प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में सक्रिय एवं प्रभावी योगदान की अपेक्षा व्यक्त की है।

इस दौरान आईसना की उत्तराखंड इकाई का मानना है कि इस नियुक्ति से ग्रामीण एवं लघु समाचार पत्रों की आवाज और अधिक मजबूत होगी तथा पत्रकारों से संबंधित मुद्दों और चुनौतियों को प्रभावी ढंग से केंद्र में उठाया जा सकेगा।

इस मौके पर उत्तराखंड इकाई की ओर से प्रदेश अध्यक्ष शमशेर सिंह बिष्ट एवं प्रदेश महासचिव सोमपाल सिंह, सह सचिव अफरोज खां, कोषाध्यक्ष धीरज पाल सिंह, जिला अध्यक्ष सुश्री प्रिया गुलाटी, अशोक रावत ,नीरज पाल एवं अजय कुमार ने प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य मनोनीत होने पर AISNA के राष्ट्रीय महासचिव मैडम आरती त्रिपाटी एवं अरुण त्रिपाठी जी विधिवत सदस्य-PCI बने पर अपने दोनों राष्ट्रीय पदाधिकारीगण का हार्दिक स्वागत,आभिनंदन कर बधाई एवं शुभकामनाए दी और कहा इससे उत्तराखंड में आईसना से जुड़े पत्रकारों को और मजबूती व नई ऊर्जा मिलेगी।

साथ ही प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया में राष्ट्रीय स्तर के संगठन में से सरदार गुरिंदर सिंह, बी एम शर्मा , सुधीर पंड्या, ( तीनों आल इंडिया स्माल एंड मीडियम न्यूजपेपर्स फेडरेशन से संबंधित पी.सी.आई. में शामिल विधिवत सदस्य । इस दौरान बड़े गर्व की बात है कि पांचों सदस्य छोटे समाचार पत्रों से हैं, निश्चित रूप से अब स्माल एंड मीडियम समाचार पत्रों के हितार्थ पैरवी करेंगे । पुन: उत्तराखंड इकाई की ओर से सभी सदस्य गणों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन 

Saturday, October 18, 2025

मध्यप्रदेश के दो पत्रकारों के लिए अगर सवाल पूछने की कीमत गिरफ्तारी हो, तो संविधान किताबों में रह जाएगा, ज़मीन पर नहीं


मध्यप्रदेश के दो पत्रकारों के लिए अगर सवाल पूछने की कीमत गिरफ्तारी हो, तो संविधान किताबों में रह जाएगा, ज़मीन पर नहीं


अभिमनोज

राजस्थान पुलिस द्वारा मध्य प्रदेश के दो पत्रकारों आनंद पांडेय और हरीश दिवेकर की गिरफ्तारी ने पूरे देश में एक बार फिर उस प्रश्न को जीवित कर दिया है कि क्या सत्ता के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले पत्रकारों के साथ राज्य मशीनरी निष्पक्ष रह पाती है?

मामला सतह पर भले ही “उगाही” और “झूठी खबरें फैलाने” का प्रतीत होता हो, पर इसकी तह में कई ऐसे कानूनी और संवैधानिक प्रश्न छिपे हैं जो न केवल इस गिरफ्तारी की वैधता बल्कि हमारे लोकतांत्रिक ढांचे की आत्मा तक को झकझोरते हैं।न्यायालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि लोकतंत्र में आलोचना से निपटने का तरीका सूचना का दमन नहीं, बल्कि तथ्यों पर आधारित सुनवाई और प्रमाण प्रस्तुत करना है। लोकतंत्र की सच्ची रक्षा तभी संभव है जब सत्ता और सवाल दोनों अपनी मर्यादाओं में रहें। पत्रकार सवाल पूछता है और यही उसका कर्तव्य है।यदि सवाल पूछने की कीमत गिरफ्तारी बन जाए, तो संविधान केवल किताबों में रह जाएगा, ज़मीन पर नहीं। यह सिर्फ दो पत्रकारों की गिरफ्तारी का मामला नहीं, बल्कि संविधान की साख और लोकतंत्र की आत्मा की परीक्षा है।

दोनों पत्रकार, जो द सूत्र नामक यूट्यूब चैनल चलाते हैं, के खिलाफ राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी के कार्यालय की ओर से एक एफआईआर दर्ज कराई गई थी। आरोप है कि उन्होंने दीया कुमारी के विरुद्ध भ्रामक खबरें प्रसारित कर आर्थिक लाभ प्राप्त करने की कोशिश की। शिकायत में कहा गया कि उन्होंने यह प्रसारित किया कि दीया कुमारी ने कथित रूप से सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा किया है और सरकार इस पर मौन है। यह शिकायत नरेंद्र सिंह राठौर (निवासी नागौर, वर्तमान में जयपुर) द्वारा दर्ज कराई गई थी, जबकि कुछ रिपोर्टों में जिनेश जैन का नाम भी सामने आया है। एफआईआर दर्ज होते ही राजस्थान पुलिस ने मध्य प्रदेश पहुंचकर दोनों पत्रकारों को हिरासत में लिया और उन्हें जयपुर ले आई।

देखने में यह कार्रवाई सामान्य प्रतीत होती है, लेकिन जब इसे भारतीय संविधान और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता( BNSS) की धाराओं के आलोक में परखा जाए, तो पूरी प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न उभरते हैं। पहली दृष्टि में यह मामला BNSS की धारा 35 तथा संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के उल्लंघन की ओर संकेत करता है।

गिरफ्तारी से पहले कोई प्रथम सूचना नोटिस (Notice of Appearance) जारी नहीं किया गया, न ही ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत हुआ जिससे यह सिद्ध हो सके कि तत्काल गिरफ्तारी अपरिहार्य थी। जब कोई अपराध “गैर-गंभीर” श्रेणी में आता है और आरोपी सहयोग के लिए उपलब्ध है, तो पुलिस को BNSS की धारा 35 के तहत पहले नोटिस देना अनिवार्य है। लेकिन यहां ऐसा प्रतीत होता है कि गिरफ्तारी सीधे राजनीतिक प्रभाव के आधार पर की गई - जो संविधान की भावना के पूर्णतः: विपरीत है।

कानूनी दृष्टि से सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या राजस्थान पुलिस को मध्य प्रदेश की सीमा में इस प्रकार की गिरफ्तारी करने का अधिकार था, और क्या उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के संबंधित प्रावधानों का पालन किया? जब किसी राज्य की पुलिस दूसरे राज्य में कार्रवाई करती है, तो उसे स्थानीय पुलिस को अग्रिम सूचना देना अनिवार्य होता है। यह प्रावधान न्यायिक पारदर्शिता और आरोपी के अधिकारों की रक्षा के लिए है। उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं कि मध्य प्रदेश पुलिस को गिरफ्तारी से पहले या दौरान औपचारिक रूप से सूचित किया गया। यदि यह सत्य है, तो यह न केवल प्रक्रियात्मक खामी है बल्कि संघीय ढांचे और न्यायिक अनुशासन का उल्लंघन भी है।

इसके अतिरिक्त यह भी स्पष्ट नहीं कि गिरफ्तारी के समय दोनों पत्रकारों को उनके अधिकारों - गिरफ्तारी के कारण जानने और वकील से परामर्श के अधिकार (Article 22(1)) -की जानकारी दी गई या नहीं। यदि यह अधिकार उनसे छीना गया, तो यह सीधे-सीधे मौलिक अधिकारों के हनन की श्रेणी में आता है।

पुलिस ने इस मामले को “साइबर अपराध” और “उगाही” के एंगल से जांचने की बात कही है, लेकिन अब तक कोई डिजिटल साक्ष्य या लिखित प्रमाण सार्वजनिक नहीं किए गए। यदि आरोपित वीडियो या रिपोर्ट तथ्यहीन थे, तो सबसे पहले संबंधित प्लेटफ़ॉर्म से कंटेंट टेकडाउन नोटिस जारी किया जाना चाहिए था। सीधे गिरफ्तारी का अर्थ केवल यही निकाला जा सकता है कि राज्यसत्ता आलोचना को अपराध मान रही है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में दुराशय पूर्ण मंशा (Mala Fide Intent) की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि किसी लोकसेवक के विरुद्ध खबर प्रसारित करने पर बिना जांच के सीधे गिरफ्तारी होती है, तो यह प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि “लोकतंत्र में सत्ता की आलोचना देशद्रोह नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार है।” (देखें -Romesh Thapar vs State of Madras, 1950; Shreya Singhal vs Union of India, 2015)।

हाई कोर्ट के समक्ष यह प्रश्न उठाया जाना चाहिए कि क्या यह कार्रवाई प्रेस-स्वतंत्रता के हनन का उदाहरण है? क्या “मानहानि” और “उगाही” जैसे आपराधिक आरोपों की आड़ में आलोचनात्मक पत्रकारिता को दबाने का प्रयास किया गया? संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध केवल तभी लगाए जा सकते हैं जब वे विधि द्वारा युक्तिसंगत हों लेकिन इस गिरफ्तारी में युक्तिसंगतता का कोई ठोस आधार नहीं दिखता।

यह भी गौर करने योग्य है कि पुलिस ने कहा है कि आरोपियों को 24 घंटे के भीतर अदालत में पेश किया गया, परंतु क्या यह प्रक्रिया न्यायिक निगरानी में हुई या केवल औपचारिकता पूरी की गई? यदि अदालत में पुलिस ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी, तो यह गिरफ्तारी अवैधानिक (Illegal Detention) की श्रेणी में आएगी।

यदि यह सचमुच उगाही या ब्लैकमेलिंग का मामला होता, तो पुलिस को फॉरेन्सिक ऑडिट, बैंक लेनदेन और संचार रिकॉर्ड जैसे प्रमाण प्रस्तुत करने चाहिए थे। इनके अभाव में यह कार्रवाई केवल भय का वातावरण बनाने का प्रयास प्रतीत होती है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया। जब शिकायत उनके कार्यालय से दर्ज हुई है, तो आरोपों के तथ्य स्पष्ट होने चाहिए थे। बयान की अनुपस्थिति इस बात का संकेत है कि यह कार्रवाई प्रशासनिक स्तर पर ही संचालित की गई , जो न्यायिक दृष्टि से कमजोर कड़ी है।

यदि यह मामला हाई कोर्ट के समक्ष आता है, तो अदालत को यह देखना होगा कि क्या यह गिरफ्तारी “आवश्यकता” के बजाय “दमन” का प्रतीक है। सुप्रीम कोर्ट ने Arnesh Kumar vs State of Bihar (2014) में स्पष्ट कहा था कि गिरफ्तारी तभी की जा सकती है जब यह जांच के लिए अपरिहार्य हो अन्यथा यह मनमानी कार्रवाई मानी जाएगी।

पत्रकारिता के क्षेत्र में यह घटना भय और असुरक्षा का संकेत देती है। यदि कोई पत्रकार किसी प्रभावशाली व्यक्ति पर सवाल उठाए और परिणामस्वरूप पुलिस कार्रवाई का सामना करे, तो यह लोकतंत्र के लिए गहरी चेतावनी है।

कानूनी रूप से यह मामला प्रेस-स्वतंत्रता बनाम सत्ता नियंत्रण की खींचतान का नया अध्याय बन सकता है। हाई कोर्ट को यह सुनिश्चित करना होगा कि राज्य-सत्ता की सीमाएँ तय रहें और कानून का उपयोग दमन के उपकरण के रूप में न हो। यदि यह सिद्ध होता है कि गिरफ्तारी बिना उचित प्रक्रिया के की गई, तो यह अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन माना जाएगा ,जो किसी भी लोकतांत्रिक शासन में अस्वीकार्य है।

कानून और लोकतंत्र का संतुलन यह नहीं कहता कि पत्रकारिता को निरंकुश स्वतंत्रता मिले, बल्कि यह कहता है कि आलोचना को अपराध न माना जाए। हर रिपोर्ट और हर सवाल लोकतंत्र की जड़ है; अगर उसे दबाया गया, तो लोकतंत्र की आत्मा का ह्रास होगा।

इसलिए आवश्यक है कि हाई कोर्ट इस पूरे प्रकरण की न्यायिक जांच (Judicial Scrutiny) करे, पुलिस की कार्रवाई की वैधता की समीक्षा करें और यह स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे कि भविष्य में किसी पत्रकार के विरुद्ध कार्रवाई से पहले कानून के सभी प्रावधानों का पालन किया जाए।

यह गिरफ्तारी पहली दृष्टि में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35 (जिसमें गिरफ्तारी से पहले नोटिस का प्रावधान है) और संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के उल्लंघन की ओर संकेत करती है:

BNSS धारा 35 का उल्लंघन:

गिरफ्तारी से पहले प्रथम सूचना नोटिस जारी न करना प्रक्रिया का सीधा उल्लंघन है। जब अपराध "गैर-गंभीर" श्रेणी में आता है और आरोपी जांच में सहयोग के लिए उपलब्ध है, तो पुलिस को BNSS की धारा 35 के तहत नोटिस जारी करना अनिवार्य है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस अनिवार्य कदम को दरकिनार कर गिरफ्तारी सीधे राजनीतिक प्रभाव के आधार पर की गई, जो संविधान की भावना के विपरीत है।

अंतरराज्यीय गिरफ्तारी की वैधता:

क्या राजस्थान पुलिस ने मध्य प्रदेश में गिरफ्तारी करते समय BNSS की धारा के प्रावधानों (अंतरराज्यीय गिरफ्तारी के लिए स्थानीय पुलिस को सूचित करना) का पालन किया? यदि मध्य प्रदेश पुलिस को औपचारिक रूप से अवगत नहीं कराया गया, तो यह न केवल प्रक्रियात्मक खामी है, बल्कि संघीय ढांचे और न्यायिक अनुशासन की अवमानना भी है।

मौलिक अधिकारों का हनन:

गिरफ्तार पत्रकारों को उनके अधिकारों (गिरफ्तारी के कारण जानने और कानूनी सलाहकार से परामर्श का अधिकार) की जानकारी दी गई या नहीं? यदि यह अधिकार छीना गया, तो यह सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन की श्रेणी में आता है।

आलोचना को अपराध मानना:

बिना ठोस डिजिटल साक्ष्य या लिखित प्रमाण सार्वजनिक किए, आलोचनात्मक रिपोर्टिंग को "साइबर अपराध" और "उगाही" बताना केवल एक ही अर्थ रखता है- राज्यसत्ता आलोचना को अपराध मान रही है।

दमन का प्रतीक:

सुप्रीम कोर्ट ने Arnesh Kumar vs State of Bihar (2014) मामले में स्पष्ट किया था कि गिरफ्तारी केवल तभी की जानी चाहिए जब वह जांच के लिए अपरिहार्य हो। यदि जांच के लिए आरोपी का सहयोग पर्याप्त है, तो गिरफ्तारी अंतिम विकल्प होना चाहिए, न कि प्रथम प्रतिक्रिया। इस मामले में, गिरफ्तारी "आवश्यकता" के बजाय "दमन" का प्रतीक प्रतीत होती है।

न्यायिक नजीर की अवमानना:

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि "लोकतंत्र में सत्ता की आलोचना देशद्रोह नहीं, बल्कि नागरिक अधिकार है।" (जैसे: Romesh Thapar vs State of Madras, 1950)। यदि किसी लोक सेवक के खिलाफ खबर प्रसारित करने पर बिना तथ्य जांचे सीधी गिरफ्तारी होती है, तो यह "प्रेस की स्वतंत्रता" पर गंभीर आघात है।

राजस्थान पुलिस की यह कार्रवाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रहार है। अब यह न्यायपालिका के विवेक पर है कि वह इस आग को न्याय से बुझाती है या सत्ता की चुप्पी से इसे और भड़कने देती है। न्यायालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि लोकतंत्र में आलोचना से निपटने का तरीका सूचना का दमन नहीं, बल्कि तथ्यों पर आधारित सुनवाई और प्रमाण प्रस्तुत करना है। यदि सवाल पूछने की कीमत गिरफ्तारी बन जाए, तो संविधान केवल किताबों में रह जाएगा, ज़मीन पर नहीं। यह सिर्फ दो पत्रकारों की गिरफ्तारी का मामला नहीं, बल्कि संविधान की साख और लोकतंत्र की आत्मा की परीक्षा है।

Friday, October 10, 2025

अब पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करना आसान नहीं, किसी भी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट का पत्रकार को लेकर अहम फैसला. सरकार की आलोचना के लिए किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए : सुप्रीम कोर्ट अभिषेक उपाध्याय की याचिका में कोर्ट नेआदेश में लिखा कि पत्रकार को उसके विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1) से सुरक्षित हैं.

केवल सरकार की आलोचना के लिए किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए।


सुप्रीमकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करना अब आसान नहीं

दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जाना चाहिए। यह फैसला पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए दिया गया है।

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क्या है पूरा मामला

पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ यूपी पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पत्रकार को उसके विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1) से सुरक्षित है।

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सुप्रीम कोर्ट का आदेश

सरकार की आलोचना के लिए किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए।– पत्रकारों को उनके विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।– लोकतंत्र में मीडिया की स्वतंत्रता आवश्यक है, और सरकार की आलोचना को अपराध नहीं माना जा सकता।

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पत्रकारों के लिए राहत

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पत्रकारों की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है। यह आदेश सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों के खिलाफ दायर मुकदमों पर रोक लगाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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