Monday, April 30, 2012

dash bhakti....JAN SABA


जेल की बैरक नंबर-13 में रहेंगी नूपुर तलवार

गाजियाबाद की विशेष सीबाआई अदालत से जमानत याचिका खारिज होने के बाद आरुषि हत्याकांड के सिलसिले में नूपुर तलवार ने सेशंस कोर्ट में अर्जी दायर की है। नूपुर ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आज सरेंडर कर दिया था। नूपुर के वकील ने कहा है कि सत्र न्यायालय में अपील दाखिल की जाएगी। विशेष अदालत के समक्ष समर्पण करते ही नूपुर को हिरासत में ले लिया गया। नूपुर के वकील ने कहा है कि सत्र न्यायालय में अपील दाखिल की जाएगी। विशेष अदालत के समक्ष समर्पण करते ही नूपुर को हिरासत में ले लिया गया। गिरफ्तारी केफौरन बाद नूपुर ने जमानत की अर्जी दाखिल की, लेकिन सीबीआई ने उसका विरोध किया।

नूपुर के वकील ने कहा कि आज ही सत्र न्यायालय में अपील दाखिल की जाएगी। निर्देश के बावजूद दंतचिकित्सक नूपुर के गाजियाबाद की अदालत में पेश नहीं होने पर उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया गया था। नूपुर ने सुबह सीबीआई की विशेष न्यायाधीश प्रीति सिंह के समक्ष समर्पण किया। सीबीआई ने उनकी जमानत का विरोध करते हुए दलील दी कि उनके महिला होने को आधार बनाकर जमानत नहीं मांगी जा सकती।

सीबीआई के वकील आर.के. सैनी ने कहा कि नूपुर अदालत में पेश होने के आदेशों को नजरअंदाज करती रही हैं और यह मामला जघन्य दोहरे हत्याकांड से सम्बद्ध है। नूपुर और उनके दंत चिकित्सक पति राजेश तलवार जब सुबह करीब 10.15 बजे पहुंचे तो पुलिस वहां पहले से मौजूद थी। नूपुर को पिछले दरवाजे से अदालत ले जाया गया।

इससे पहले शुक्रवार को सर्वोच्चा न्यायालय ने नूपुर को इस मामले की सुनवाई कर रही सीबीआई की विशेष अदालत में समर्पण करने का निर्देश दिया था। न्यायमूर्ति ए.के. पटनायक की अध्यक्षता वाली सर्वोच्चा न्यायालय की पीठ ने कहा कि वह निचली अदालत में समर्पण करने के बाद जमानत की अर्जी दाखिल कर सकती हैं और अदालत इस मामले को शीघ्र और योग्यता के आधार पर निपटा सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश देने के बाद नूपुर की याचिका पर सुनवाई अगले शुक्रवार के लिए स्थगित कर दी। नूपुर ने इस हत्याकांड के सिलसिले में उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के सर्वोच्चा न्यायालय के आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की थी। नूपुर एवं राजेश की 14 वर्षीया पुत्री आरूषि की हत्या मई 2008 में उनके नोएडा स्थित आवास में हो गई। इस हत्या के अगले दिन परिवार केनौकर हेमराज की लाश घर के छत से बरामद की गई। तलवार दम्पति इस मामले में आरोपी हैं। राजेश जमानत पर हैं।

Sunday, April 29, 2012

आइसना कटनी इकाई के लखन लाल अध्यक्ष, अनिल रावत उपाध्यक्ष, संजीव द्विवेदी सचिव बने

आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोशिएशन (आइसना) की जिला इकाई कटनी घोषित

कटनी. आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोशिएशन के प्रांतीय अध्यक्ष श्री अवधेश भार्गव, प्रांतीय महासचिव श्री विनय जी डेविड  एवं प्रांतीय सचिव श्री ओम सरावगी के अनुमोदन से आइसना की कटनी इकाई का गठन किया गया है। जिसमें आइसना के संरक्षक वरिष्ठ पत्रकार श्री नंदलाल सिंह जी, अध्यक्ष पद पर लखन लाल, उपाध्यक्ष अनिल रावत, सचिव संजीव द्विवेदी, सहसचिव मुकेश वर्मा, कोषाध्यक्ष पी.वैंकट. रत्नाकर को मनोनीत किया गया है। आइसना के कार्यकारणी सदस्य गणों में सर्व श्री रवि गुप्ता, कपिल दुरगड़े, विशाल मरकाम, गोविंद सिंह चौहान, सुजीत तिवारी, डी.आर. रजक आदि को सम्मलित किया गया है। नवीन कार्यकारिणी के गठन के पश्चात आइसना की प्रथम बैठक रविवार को आइसना के चांडक चौक स्थित कार्यालय में प्रांतीय सचिव श्री ओम सरावगी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई जिसमें पत्रकारों की मूलभूत समस्याओं एवं उनके निराकरण के विषय में विस्तृत चर्चा की गई।

हर पत्रकार को अधिमान्यता दी जाना चाहिये : विनय डेविड


नरसिंहपुर. आल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोशिएशन के प्रांतीय महासचिव श्री विनय जी डेविड ने पत्रकारों की मूलभूत समस्याओं एवं उनके निराकरण के विषय में विस्तृत जानकारी दी एवं जिले के पत्रकारों को एकत्रित होकर शासन से मिलने वाली सुविधाओं और हर पत्रकार को जिला कार्यालय में पंजीबद्ध करने एवं अधिमान्यता की मांग शासन से की जाना चाहिएं जिसके लिए आइसना की नरसिंहपुर इकाई के गठन के लिए सदस्यता अभियान शुरू किया गया है। आइसना की सदस्यता हेतु मनीष साहू एवं अमर नौरिया से संपर्क किया जा सकता है। बैठक में पत्रकार सलामत खान, अमर नौरिया, मनीष साहू, राजीव कटारे, डॉ. पंकज विश्वास, विपिन दुबे (महाकाल), मंजीत छाबड़ा, बबलू मेहरा, राजीव ऋषि जैन, जगदीश प्रसाद राव, राकेश शर्मा, आनंद नेमा, विमल बानगात्री, भोजराज पटेल, श्रीवास्तव एवं अन्य पत्रकार साथी उपस्थित थे।

Saturday, April 28, 2012

परिणीति ने पहनी इतनी ट्रांसपेरेंट ड्रेस, हो गया वार्डरोब मॉलफंक्शन!

बॉलीवुड में ‘लेडिज वर्सेस रिक्की बहल’ से कदम रखने वाली परिणीति चोपड़ा वार्डरोब मॉलफंक्शन का शिकार हो गईं|
कुछ दिनों पहले एक चैनल के अवॉर्ड शो में परिणीति एक ब्लैक रंग की ड्रेस में पहुंची| यह ड्रेस इतनी ट्रांसपेरेंट थी कि इसमें से परिणीति के अंतः वस्त्र बिलकुल साफ़ झलक रहे थे|
वैसे इससे परिणीति को कुछ फर्क नहीं पड़ा और वह अपनी इस बोल्ड ड्रेस में कैमरे के सामने सहजता से पोज करती नजर आईं|
परिणीति प्रियंका चोपड़ा की कजिन हैं और जल्द ही फिल्म ‘इश्कजादे’ में अर्जुन कपूर के साथ नजर आएंगी|

रिश्वतकांड: बंगारू लक्ष्मण को 4 साल की सजा 1 लाख का जुर्माना

भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को सीबीआई की विशेष अदालत  ने शनिवार को तहलका रिश्वत कांड में 4 साल के कारावास की सजा सुनाई है साथ ही उन पर 1 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भ्रष्टाचार देश को दीमग की तरह खा रहा है इसे रोकना बेहद जरुरी हो गया है इसलिए बंगारु लक्ष्मण की सजा में राहत नहीं दी जा सकती। बंगारु लक्ष्मण पर फर्जी हथियार डीलरों से रिश्वत लेने का आरोप है।
 
आपको बता दें कि न्यूजपोर्टल तहलका डॉट कॉम द्वारा 2001 में कराए गए स्टिंग ऑपरेशन में बंगारु कैमरे पर एक लाख की रिश्वत लेते पकडे गए थे। पोर्टल ने 13 मार्च 2001 को को वीडियो सीडी किया था । जिसके बाद राजनीतिक गलियारों में सनसनी फैल गई। इसके बाद बंगारु को भाजपा प्रमुख पद से इस्तीफा देना पडा था। इस मामले में तत्कालीन रक्षामंत्री जार्ज फर्नाडीस को भी अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

इस फैसले पर अगर गौर किया जाए तो विपक्षी पार्टी बीजेपी जहां कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार की मुहिम चलाए हुए है और उन्ही की पर्टी के एक बड़े नेता को सजा मिलना बड़ी गंभीर बात है। इस बार वीडियो टेप को सबूत मानते हुए, अदालत ने एक बड़ा फैसला दिया है। भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 9 के तहत बंगारू लक्ष्मण को 4 साल की कैद की सजा और 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया है। भ्रष्टाचार को बड़ी समस्या बताते हुए कोर्ट का कहना था कि कोर्ट भ्रष्टाचार के किसी भी आरोपी को राहत नहीं देगी। बहरहाल बंगारू लक्ष्मण को कोर्ट परिसर से तिहाड़ जेल भेज दिया गया है।

वहीं दूसरी तरफ बंगारू लक्ष्मण के वकील का कहना है कि वो इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट जाएंगे। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी का कहना है कि भाजपा को आत्म चिंतन करने की जरुरत है और इस फैसले से वो काफी आहत हैं। वहीं बीजेपी नेता बंडारु दत्तात्रेय का कहना है कि यूपीए सरकार ने सीबीआई से जांच करवा कर जो षडयंत्र रचा है जब कि उनके नेताओं की भी जांच होनी चाहिए।वही बीजेपी के नेता शहनबाज हुसैन का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है। और जहां तक बंगारू लक्ष्मण की बात है तो ये उनका व्यक्तिगत मामला है।

सुनीलम् और अनुराग एक सिक्के के दो पहलू

सचित्र रिर्पोट रामकिशोर पंवार

मेरा जन्म बैतूल जिले में हुआ है इसलिए मैं जिले की माटी और यहां के लोगो के भाव एवं स्वभाव को अच्छी तरह से जानता हूं। बैतूल जिले में मैंने अनुराग मोदी एवं डॉ सुनील मिश्रा ऊर्फ सुीनलम् दोनो की नस -नस से मैं वाकीफ हूं। आज का करोड़पति सुनीलम् कभी पाथाखेड़ा के वीर कुंवर सिंह और आजाद नगर में मेरे ही हम नाम कामरेड रामू पंवार की बैसाखी के सहारे चला करता था। उस समय डॉ सुनील मिश्रा को सुनीलम् बनाने वाले जार्ज फर्णाडीज थे। जार्ज साहब की समाजवाद की एक डोर के सहारे कोयला मजूदरो की राजनीति के लिए रघु ठाकुर की ऊंगलियां पकड़ कर कामरेड रामू पंवार को कठपुतली बना कर अपनी राजनीति की दुकान शुरू की। उस समय मैंने और वीरेन्द्र झा एवं सज्जू भाई जान ने उस सुनीलम् को खड़ा करने में कथित मदद की जिसके पास फुटाने खाने के भी पैसे नहीं थे।

 रामू पंवार और सज्जू खान के घरो तथा आन्दोलन से जुड़े लोगो की रोटी खाकर कथित जनसंघर्ष करने वाले डॉ सुनीलम् ने रामू पंवार को मोहरा बना कर उसे सडक़ से सडक़छाप तक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भाकपा के युथ फेडरेशन का कामरेड रामू पंवार समाजवाद के चक्कर में ऐसा फंसा की उसे बाबा बनने के पूर्व में दर्जनो मुकदमों और महिनो तक जेल की हवा खानी पड़ी। इस दौर में पंखा फैक्टरी कांड और न जाने कितने कांडो से जुड़े रहे डॉ सुनीलम् ने रामू पंवार को अपनी महत्वाकांक्षा के चक्कर में दर किनार कर पाथाखेड़ा से परमंडल में अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा लम्बी छलंाग लगा ली। समाजवाद के आन्दोलन के चक्कर में उन बेकसूर आन्दोलन कारी किसानो को पुलिस की गोलियों से मरवा डालने  वाले सुनीलम् स्वंय सियार बन कर किसी कोने में छुप गया। जब बाहर निकला तो उसने स्वंय को किसानो का सच्चा हितैषी बनाने के लिए महेन्द्र सिंह टिकैत से लेकर देश भर के किसानो के नेता ओं की मदद से स्वंय किसानो का रहनुमा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 
डॉ सुनील मिश्रा ने किसान नेता के रूप में स्वंय को प्रस्तुत करके मेघा पाटकर जैसे समाजवादियों की मदद से मुलताई विधानसभा क्षेत्र की भोली - भाली जनता को दस साल तक ठगने का काम किया। इस बीच समाजवाद का दुसरा चेहरा समाजवादी जन परिषद के रूप में आया। अस बीच गांव के किसानो की आग ने समाजवाद के दुसरे वीभत्स चेहरे के रूप में गांवो से सटे जंगलो में शरण ले ली। अब बैतूल जिला मुख्यालय पर हाथो में तख्ती लेकर बैनरो एवं पोस्टरो के साथ समाजवाद का नारा जल - जमीन जंगल , अनुराग शमीम मंगल के रूप में सडक़ो पर शोर करने लगी। टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान मुम्बई में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत गुजराती परिवार में जन्मे अनुराग मोदी ने गुजरात से लेकर मध्यप्रदेश तक के ग्रामिणो अंचलो से लेकर जंगलो में आन्दोलन की आग लगाई। हरदा से बैतूल जिले की सीमा में घुसपैठ बनाने वाले अनुराग मोदी एवं शमीम मोदी का नाम भंडारपानी के जंगल कांड के बाद अचानक सुर्खियों में आया। उच्च शिक्षा प्राप्त मोदी दम्पति ने समाजवाद - माक्र्सवाद की नई परिभाषा नक्सलवाद के रूप में दी। बैतूल जिला प्रशासन एवं हरदा जिला प्रशासन की गृहमंत्रालय एवं राज्य शासन को भेजी गई अनेको बार की गुप्तचर रिर्पोट में इस बात के संकेत दिए गए कि अनुराग मोदी के श्रमिक आदिवासी संगठन एवं समाजवादी परिषद की आड़ में बैतूल एवं हरदा जिले के जंगलो में नक्सलवाद घुसपैठ कर रहा है। विचारणीय तथ्य यह है कि भंडारपानी कांड के बाद से बैतूल जिले के आदिवासी एक बैनर तले गांवो से शहर की ओर हाथो में कुल्हाड़ी और बैनरो के साथ क्यों आ रहे है। जल - जमीन - जंगल की आड़ में आदिवासी श्रमिक संगठन के रूप में अचानक शमीम मोदी और अनुराग मोदी आ धमकने के बाद डॉ सुनीलम् एक दुसरे के पूरक बन गए। जहां एक ओर डॉ सनीलम् ने जिला प्रशासन को अपने निशाने पर साधने के लिए ग्रामिणो एवं किसानो को मोहरा बना कर उन पारधियों को अपना शिकार बनाया जो अपराधी प्रवृति के घुमन्तु जनजाति के लोग कहे जाते है। गांवो के आसपास के खेतो - खलिहानो एवं जंगलो से तीतर - बटेर पकड़ कर उन्हे बेचने वाली पारधी जाति के प्रति ग्रामिणो में फैले जन आक्रोष की आड़ में अपनी कुर्सी सलामत रखने के लिए डॉ सुनीलम् ने नफरत की आग में अपनी पूर्णाहुति डाली जरूर लेकिन सीमा परिर्वतन के चक्कर मासोद एवं मुलताई एक विधानसभा बन गई और डॉ सुनीलम् अपनी कुर्सी बचा नहीं सके और विधानसभा चुनाव बुरी तरह से हार गए। मुलताई से अपना बोरिया बिस्तर बंधने के बाद डॉ सुनीलम् अपनी समाजवाद की बैसाखी को छोड़ कर अन्ना टीम के साथ देश जगाने चले गए लेकिन बैतूल से उनका पीछा नहीं छुटा। इस बार डॉ सुनीलम् के गले की फांस बने पारधी और उन्हे समाजवाद के दुसरे चेहरे ने एक बार फिर जेल की चौखट पर ला खड़ा किया। 

आज डॉ सुनीलम् जिस पारधी जाति के खिलाफ ज़हर ऊगल रहे है दर असल में उसी पारधी जाति ने बीते डॉ सुनीलम् के दस वर्षो के विधायक कार्यकाल में सबसे अधिक अपराधिक गतिविधियों को अंजाम दिया। अपराधिक प्रवृति की धुमुन्तु जनजातियों में शामिल पारधियों के कथित आचरण को लेकर फैले जन आक्रोष की अपने विधायक कार्यकाल में डॉ सनीलम् को कोई चिंता नहीं हुई। विधानसभा चुनाव के आसपास घटी चौथिया कांड की घटना ने नया इतिहास रच डाला। जहां एक ओर डॉ सुनीलम् का परमंडल गोली कांड चौथिया अग्रिकांड में बदल डाला वहीं दुसरी ओर पिपलबर्रा के आदिवासियों को मोहरा बना कर जनहित याचिका के बहाने वन विभाग को अपना निशाना बना कर अनुराग मोदी ने एक पूरे गांव और गांव के लोगो को राष्ट्रीय ही नहीं अंतराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिला दी। सबसे मजेदार एवं विचारणीय बात यह है कि दोनो कथित समाजवाद का चोला पहने अनुराग मोदी एवं डॉ सुनीलम् ने अपने - अपने नाम पर स्वंयसेवी संगठन बना रखे है जिन्हे देश ही नहीं विदेशो से भी अनुदान मिलता है। डॉ सुनील मिश्रा ने अपने आन्दोलन के लिए कथित देश भर के समाजवादियों एवं समाजसेवियों के बीच में घुसपैठ की वहीं दुसरी ओर अनुराग एवं शमीम मोदी ने अपने क्लासमेट साथियों के इलेक्ट्रानिक मीडिया एवं प्रिंट मीडिया के क्षेत्र में पकड़ का भरपूर फायदा अपने जन आन्दोलनो को दिलवाया। 

अनुराग ने बकायदा अपने श्रमिक आदिवासी संगठन एवं समाजवादी जन परिषद के आन्दोलनो के लिए टीवी चैनल एवं प्रिंट मीडिया में स्थानीय स्तर अपने चहेतो की घुसपैठ करवाई और उन्हे मोहरा बना कर बैतूल में अपने छोटे से आन्दोलन को स्टं्रीग आपरेशनो के माध्यम से प्रायोजित खबर के रूप में परोसना शुरू किया। बैतूल के पूर्व कलैक्टर विजय आनंद कुरील ने बकायदा राज्य सरकार एवं केन्द्र सरकार को प्रेषित शासकीय एवं गैर शासकीय रिर्पोट में बैतूल जिले के तीन टीवी चैनलो के पत्रकारों को नक्सलवादी बताते हुए उनकी पूरी कारस्तानी की रिर्पोट तक भेजी थी। जिले के पूर्व सासंद स्वर्गीय विजय कुमार खण्डेलवाल स्वंय कई बार प्रदेश सरकार को आगह कर चुके थे कि बैतूल जिले में नक्सलवा का बीज अंकुरीत हो रहा है। सबसे हास्याप्रद बात तो यह है कि बैतूल जिले के एक गांव पीपलबर्रा के अनुबंधित आदिवासी मासिक मजदूरी पर श्रमिक आन्दोलन से जुड़े हुए है। इन एक जैसे नाम और चेहरे वाले आदिवासियों की जागरूकता का यह आलम है कि बिना रेडियों एवं टीवी के अमेरिका से लेकर बैतूल तक की चिंता की चिता लेकर बैतूल आ धमकते है। हालात तो यह है कि बैतूल जिले के आदिवासी अंचल में बसे पीपलबर्रा में अब धीरे - धीरे नक्सलवाद पांव पसरने लगा है। अमेरिका में यदि ओबामा को दस्त लग जाए अमेरिका के व्हाइट हाऊस को चिंता नहीं होगी लेकिन पीपलबर्रा के आदिवासी उक्त दस्तकांड को लेकर हाथो में बैनर और पोस्टर लिए बैतूल की सडक़ो पर उतर जाते है। प्रायोजित खबरो के लिए अनुराग मोदी की पूरी टीम कभी इन आदिवासियों से कलैक्टर को राखी बंधवाती है तो कभी कुछ भी करवाती रहती है। जबसे सीबीआई ने चौथिया के पारधीकांड की अंतिम जांच रिर्पोट एवं 82 लोगो के खिलाफ न्यायालय में चालान पेश किया है तबसे दो समाजवादी के दो कोणो के बीच जबरदस्त युद्ध छिड़ गया है। डॉ सुनीलम् के चौथिया के पारधी कांड को लेकर प्रेषित लेख को अनुराग मोदी ने तथ्यों की गलत बयानी बताया है। अनुराग मोदी कहते है कि पारधी समुदाय के खिलाफ नफरत के ज़हर से भरा है। इधर चौथिया कांड पर पूर्व विधायक एवं टीम अन्ना से जुड़े डॉ सनीलम् कहते है कि इन दिनों म.प्र. के बैतूल जिले की मुलताई तहसील का पारधी कांड फिर चर्चा में है। जबलपुर स्थित सीबीआई न्यायालय द्वारा 82 ग्रामीणों के खिलाफ गैर जमानती वारंट 11 सितम्बर, 2007 की घटना के 5 साल बाद सीबीआई द्वारा चलान प्रस्तुत करने के बाद जारी किया गया है। जिमसें वर्तमान विधायक पूर्व विधायक तथा वर्तमान बेतूल जिला पंचायत के उपाध्यक्ष मुलताई नगरपालिका अक्ष्यक्ष पति भी शामिल हैं। चैनालों को देखकर वह अखबारों को पढक़र दर्शक और पाठक यह समझ रहे होंगे कि सभी पार्टी के नेताओं तथा बहुसंख्यक जातियों के लोगों ने मिलकर गरीब पारधीयों के घर जलाने का जघन्य अपराध किया है। मुलताई का 10 वर्ष तक विधायक रहने के कारण उक्त घटना को लेकर मेरी जानकारी में जो तथ्य आए हैं उसके अनुसार मुलताई के सांडिया नामक ग्राम में 9 सितम्बर 2007 को पारधियों ने सामूहिक बलात्कार के बाद गांवडे परिवार की एक महिला की हत्या कर दी थी। गुस्साये ग्रामीणों ने आन्दोलन किया, तब अधिकारियों ने 1995 में चौथिया ग्राम में कांग्रेस द्वारा इन्दिरा आवास योजना के तहत पट्टे देकर बसाये गये 11 पारधी परिवारों को चौथिया से हटाकर अनयत्र बसाने का आश्वासन दिया था। आश्वासान पूरा न किये जाने पर ग्रामवासियों ने जिलाधीश को चेतावनी पत्र लिखकर 12 सितम्बर को महापंचायत कर 13 तारीख से पारधियों के पट्टे निरस्त करने अपराधी पारधियों का जिलाबदर करने तथा पीडि़त महिला को मुआवजा देने की मांग की थी। पुलिस के एसडीओपी साकल्ले द्वारा कहा गया कि 12 तारीख के पहले प्रशासनिक पुलिस कार्यवाही के माध्यम से पाराधियों को हटाया जायेगा। लेकिन कार्यवाही करने की बजाय अधिकारियों ने ग्रामीणों को उकसा कर 11 तारीख के सुबह 7 बजे से कार्यवाही करने को कहा था। डॉ सुनीलम् कहते है कि घटना स्थल पर वे ही नहीं सभी वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद थे। उनके द्वारा किसानों को यह समझाने की कोशिश की कि अधिकारी स्वंय कार्यवाही न कर लोगों को उकसा रहे हैं। डॉ सुनीलम् के अनुसार उन्हे स्थानीय नेताओं द्वारा बोलने से रोका गया लेकिन चित्र में डॉ सुनीलम्  और राजा पंवार दोनो साथ - साथ खड़े भीड़ को उकसा रहे है। डॉ सुनीलम् कहते है कि वे अपराधियों पर कार्यवाही के निर्देश देकर वहां से चले गए। डॉ सुनीलम् का यह आरोप है कि चौथिया कांड के बाद पारधियों को तब से लेकर अब तक प्रशासन द्वारा पाला-पोसा जा रहा है, जहां कहीं भी प्रशासन की ओर से पाराधियों के पुर्नवास की बात सामने आती है उस इलाके के किसान विरोध प्रदर्शन के लिये सामूहिक तौर पर मैदान में उतर जाते हैं। इसका कारण यह है कि पारधियों ने 1995 के बाद न केवल बड़े पैमाने पर स्थानीय कांग्रेस के नेताओं तथा पुलिस के संरक्षण में अपराध किये बल्कि कई हत्याओं, चोरी, हमले, की घटनाओं में शामिल होते हुए अशांति की जड़ रहे। मोटे तौर पर 1500 से अधिक अपराधिक घटनाओं को उन्होंने अंजाम दिया, डॉ सुनीलम् कहते है कि पारधियों ने ही कांग्रेस के इशारे पर षडय़ंत्र पूर्वक 12 जनवरी 1998 के किसन आंदोलन के दौरान पथराव कर गोली चालन करवाने के षडय़ंत्र किया थाद्ध सरकार के संरक्षण के चलते उनमें से एक पर भी पुलिस द्वारा सभी 67 में से एक भी प्रकरण दर्ज नहीं किया गई। पारधियों का मनोबल इतना बढ़ गया था कि वे सरेआम किसानों के खेत की खड़ी फसल या जानवर ले जाते थे, क्षेत्र में चोरी करना तथा अन्य अपराध इनके द्वारा किये जाते थे कई बार उन्होंने पुलिस के थाना प्रभारी तक पर हमला कि_जीवन कारावास की सजा भी सुनाई गई। अब सवाल यह उठता है कि डॉ सुनीलम्  कांग्रेस को दोष दे रहे है लेकिन पूरे दस साल तक तो वे विधायक रहे है और उन्होने कितनी बार बैतूल जिला मुख्यालय पर पारधियों के कथित अपराधिक स्वभाव के कारण आन्दोलन या प्रर्दशन किया था।

अब डॉ सुनीलम् चौथिया के पारधी कांड में आरोपी बनने के बाद कहते है कि उच्च न्यायालय के निर्देश पर सीबीआई द्वारा जांच की गई। डॉ सुनीलम् का आरोप है कि सीबीआई ने ग्राम के किसानों को बुरी तरह प्रताडि़त कर फर्जी तौर पर हत्या के प्रकरणों में 40-50 किसानों को फंसा दिया। दस-दस दिन तक किसानों को मुलताई रेस्ट हाऊस में कमरे में बंद करने फर्जी तौर पर अपराध स्वीकार (कबूल) करने तक कई-कई घंटों तक पीटा गया लेकिन डॉ सुनीलम्  यह बता नहीं सके कि किसी भी किसान या ग्रामिण ने सीबीआई के द्वारा बंधक बना कर रखने या उन्हे बुरी तरह से पीटने की रिर्पोट किसी थाने में या राज्य सरकार को क्यों नहीं की....? डॉ सुनीलम्  कहते है कि मुलताई क्षेत्र में केवल अधिकारियों द्वारा समय से अपराधियों पर कार्यवाही करने की बजाय उन्हें संरक्षण देने तथा हालात बेकाबू होने पर स्वयं कार्यवाही करने की बजाय ग्रामीणों को सीधी कार्यवाही के लिये उकसाने के चलते 150 से अधिक ग्रामीण जिनका कभी कोई अपराधिक रिकाडऱ् नहीं रहा है उन्हे फंसाया गया है। डॉ सुनीलम्  कहते है कि जन आक्रोष की एक घटना मुलताई के पास खापाखतेड़ा ग्राम में लोहारों की तीन महिलाओं को जिंदा जला दिया गया था। इस नफरत की आग में जली तीन निर्दोरूा महिलाओं की हत्या के आरोप में 150 से अधिक ग्रामीणों पर मुकदमे चले तथा 40 से अधिक ग्रामीणों को आजीवन कारावास भी हुआ। इसी तरह की घटना मुलातई तहसील में घटाअमरावती में हुई थी जिसमें कई सालों तक जेल काटने के बाद ग्रामीण छूट सके। मजेदार बरत तो यह है कि डॉ सुनीलम्  कहते है कि कानून हाथ में लेना गलत है किसी की मकान जलाना जघन्य अपराध है, लेकिन डॉ सुनीलम्  पर बैतूल जिले के विभिन्न थानो में दर्ज अपराधो को देखा जाए तो वे पारधियों से बड़े अपराधी है लेकिन उनका जिला बदर नहीं हुआ और विधायक बनने के बाद उन पर दर्ज सभी अपराधिक मामले स्वत: राज्य सरकार द्वारा जनहित में वापस ले लिए गए। कभी पुलिस रिकार्ड में राजनैतिक गुण्डे के रूप में दर्ज रहे डॉ सुनीलम्  कहते है कि जन आक्रोष के चलते इस तरह के अपराध क्यों घटित हुये, इस पर सोचा जाना जरूरी है। यदि अपराधियों पर पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों ने समय पर जिला बदर की कार्यवाही कर दी होती तथा 5 घंटे तक आगजनी के दौरान संरक्षण देने की बजाय आगजनी रोकी गई होती, तब भी यह घटना टाली जा सकती थी। माननीय उच्च न्यायालय के निर्देशो पर पारधियों की बसाहट का विरोध करने वाले डॉ सुनीलम्  कोर्ट की अवमानना करने से भी नहीं चुक रहे है वे कहते है कि अभी भी प्रशासन व पुलिस के जिलाअधिकारी जन भावनाओं का आदर करने की बजाय पारधियों को वापस, उसी स्थान पर चौथिया में बसाने की जिद पर अड़े हैं। 

एक तरफ डॉ सुनीलम् कहते है कि देश के नागरिक को किसी भी स्थान पर रहने का अधिकार है, तथा गरीबों को बसाना सरकार की जिम्मेदारी व जवाबदेही है, लेकिन अपराधियों और सामान्य व्यक्तियों में भेद करना भी आवश्यक है लेकिन डॉ सुनीलम्  को कौन समझाए कि उच्च न्यायालय की मंशा क्या है..? दोहरे चरित्र एवं मानसिकता वाले समाजवाद का चोला उतार कर समाजसेवी बने टीम अन्ना के सदस्य डॉ सुनीलम्  स्वंय किसी के अपने नहीं रहे उन्होने सांपो की तरह अपनी त्वचा रूपी सोच एवं मानसिकता को बार - बार बदला है। अब डॉ सुनीलम्  कहते है कि सामान्य लोगों के पुर्नवास का सभी नागरिक स्वागत करेंगे लेकिन अपराधियों का स्थान जेल के अलावा कोई दूसरा नहीं होना चाहिये । अब स्वंय के चौथिया कांड में अपराधी के रूप में जेल जाने की बारी आई तो डॉ सुनीलम्  कहते है कि जो लोग यह बतलाने की कोशिश करते हैं पाराधियों के साथ जातीय पूर्वाग्रह के चलते इस तरह का बर्ताव किया जा रहा है वे बैतूल जिले की लाखों जनता की भावना का अपमान करते हैं। तथा 10-10 लाख रुपये की साहूकारी करने वाले तथा लगातार अपराध करने वाले कुछ पारधी अपराधियों को संरक्षण देकर उनका मनोबल बढ़ाने का काम करते हैं। आज मौजूदा समय में चौथिया कांड के शिकार बने पारधियों के सबसे बड़े समर्थक एवं हितैषी के रूप में अनुराग मोदी ही सामने आए है ऐसे में दोनो समाजवादियों की अपनी - अपनी महत्वराकांक्षा के चलते चौथिया का पारधी कांड निर्णायक मोड़ पर आ गया है। 

इस कंाड के चलते दो दर्जन नामजद तथा दो हजार अज्ञात आरोपियों की शिनाख्त होने के बाद उनका उत्पीडऩ एवं जीवन जेल में काटना है। डॉ सुनीलम् अपने बचाव में पलटवार करते है कि 11 पारधी परिवारों में से अपराधिक तत्वों पर कानूनी कार्यवाही कर न केवल पारधी परिवार उजडऩे से बच सकते थे बल्कि 1995 के बाद से लेकर अब तक जिस प्रताडऩा से 25 गांव के 50 हजार से अधिक किसानो एवं ग्रामिणो को शांति से जीवन गुजारने का अवसर मिल सकता था। अब डॉ सुनीलम्  को अपने साथ उन किसान परिवार की भी चिंता सताने लगी है जिनके परिवार जनों के जेल में जाने से उनके कथित उजड़ जाएगें। अपने जेल जाने की बारी आई तो डॉ सुनीलम्  कहते है कि उच्च न्यायालय तथा तमाम आयोगों के निर्देशों के बावजूद सरकार पुर्नवास करने में असक्षम साबित हुई है। सरकार 17 वर्षों में 11 पारधी परिवारों नहीं बसा पायी है। डॉ सुनीलम् कहते है कि देश के तमाम मानवाधिकार संगठनों नागरिक संगठनों तथा राजनैतिक दलों की अगुवाई करने वाले किसानों के बीच जाकर स्वतंत्र रूप से जनसुनवाई करें ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके, सच्चाई सामने आ सके। केवल कानून व्यवस्था के नजरिये से समस्या का समाधान नहीं होगा। डॉ सुनीलम्  का यह कहना कि प्रशासनिक एवं पुलिस के उच्चाधिकारी सब कुछ करा-कर सीबीआई से लेन-देन कर कानून की गिरफ्त के बाहर हो गये हैं, लेकिन आम किसानों ग्रामीणों और स्वंय उनको कौन बचायेगा? कौन न्याय दिलाएगा? इधर पूरे घटनाक्रम के पीछे की कहानी कुछ और ही बयां करती है। बैतूल जिले में जनहित याचिका के माध्यमों से जिला प्रशासन एवं राज्य सरकार के बाद राजनैतिक दलो के लिए सरदर्द बने अनुराग मोदी पारधियों के सरगना अलस्या की आड़ में सौदेबाजी करने में लगे हुए है लेकिन अलस्या पारधी और रत्ना पारधी दोनो ही उच्च न्यायालय तक मामले के पहुंच जाने के बाद अपने मामले को लेकर स्वंय जितने सक्रिय है उतने स्वंय अनुराग मोदी नहीं है।

 सीबीआई कब आती है और कब जाती है जिला प्रशासन को भले ही पता न हो लेकिन सीबीआई की नस - नस से वाकीफ अलस्या सीबीआई की भी उच्च न्यायालय में शिकव - शिकायत करने से नहीं चुकते है। बैतूल जिले का पारधी कांड बैतूल जिले की राजनीति को जबरदस्त प्रभावित करने जा रहा है। सपा , कांग्रेस , भाजपा तीनो ही राजनैतिक पार्टी के अति महत्वाकांक्षी नेताओं से लेकर जनप्रतिनिधि तक का आने वाला भविष्य तय करने जा रहा चौथिया का पारधी कांड जिले के कई नेताओं की खामोशी और गायब होने की कहानियों को जन्म देने वाला है। लोग कहते है कि अलस्या पारधी का अनुराग मोदी का मुखौटा ओढ़े अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को करारी शिकस्त देने में लगे हुए है। समाजवाद का चोला उतारने वाले और कथित नक्सलवाद का चोला ओढऩे वाले के बीच चलने वाली  इस जल - जमीन और जंगल की लड़ाई का हश्र क्या होगा यह आने वाला समय ही बता पाएगा।

Tuesday, April 24, 2012

एमपी हाऊसिंग बोर्ड का घोटाला,करोड़ों की चपत

भोपाल // आलोक सिंघई
राजधानी का बहुचर्चित रिविएरा टाऊन प्रोजेक्ट जनता के खजाने के लिए मंहगा सौदा साबित हो रहा है। इस बेशकीमती जमीन पर बनाए गए हाऊसिंग प्रोजेक्ट ने जहां नियमों कानूनों की धज्जियां उड़ाकर रख दीं हैं वहीं यह परियोजना सरकारी जमीन की बंदरबांट बनकर रह गई है। इन्हीं गड़बडिय़ों पर पर्दा डालने के लिए समय समय पर अफसरों,नेताओं और प्रभावशाली ठेकेदारों को आवास उपलब्ध कराए गए। पूर्व लोकायुक्त जस्टिस रिपुसूदन दयाल को गैरकानूनी तरीके से लाभ पहुंचाने का मामला इन दिनों माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर के समक्ष विचाराधीन है। इसी सिलसिले में अब नया विवाद सामने आया है जिससे पता चलता है कि ये प्रोजेक्ट पूरी तरह से भ्रष्टाचार के दलदल में समाया हुआ है।प्रस्तुत है इस मामले की तहें खोलती विशेष रपट |

माता मंदिर के पास कुक्कुट पालन प्रक्षेत्र कोटरा सुल्तानाबाद की भूमि दो चरणों में मध्यप्रदेश हाऊसिंग बोर्ड को मिली थी। पहले चरण में 13.31 एकड़ की भूमि को पुर्नघनत्वीकरण योजना के नाम पर देना बताया गया। दूसरे चरण में करीब साढ़े दस एकड़ भूमि एमपी एमएलए के नाम से हाऊसिंग बोर्ड को आवासीय परियोजना बनाने के लिए दे दी गई। रोचक तथ्य यह है कि आवास एवं पर्यावरण विभाग ने आदेश दिनांक 2 सितंबर 1999 क्रमांक एफ 13-14 । 99 । 32 के जरिए मंत्रिपरिषद की विभागीय समीक्षा में विचार के दौरान दिनांक 22 जून 99 को कई निर्णय लिए और शासकीय भूमि पर मकानों के पुर्नघनत्वीकरण योजनाओं के त्वरित क्रियान्वयन के लिए साधिकार समिति का गठन किया । शासन ने उस समय पुर्नघनत्वीकरण योजना के संबंध में मार्गदर्शी सिद्धांत निर्धारित किए बिना मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक बैठक दिनांक 7.4.2011 को आयोजित की।

इस बैठक में कुक्कुट प्रक्षेत्र की 13.71 एकड़ भूमि पुर्नघनत्वीकरण योजना के अंतर्गत मप्र हाऊसिंग बोर्ड को 10.95 करोड़ में सौंप दी। बैठक दिनांक 7.4.2001 के बिंदु क्रमाक 3- ब के अनुसार इस आवासीय योजना के ले आऊट का अनुमोदन प्रदान करते समय वृक्षों से आच्छादित 3 एकड़ भूमि को ग्रीन बैल्ट के रूप में सुरक्षित रखते हुए उसे सर्व सुविधायुक्त उद्यान के रूप में विकसित करने की शर्त लगाई गई। साथ ही भविष्य में प्रक्षेत्र की शेष भूमि 24.28 एकड़ के उपयुक्त विकास को भी ध्यान में रखने की शर्त थी। भूमि की कीमत 10.95 करोड़ के विरुद्ध मप्र हाऊसिंग बोर्ड को प्रथम चरण में हथाईखेड़ा में पोल्ट्री फार्म का निर्माण, अन्य फार्मों का सुद्ृढ़ीकरण, विभागीय आवासगृहों का निर्माण और दूसरे चरण में पशु चिकित्सा भवनों एवं पशु चिकित्सा महाविद्यालयों का सुदृढ़ीकरण करते हुए उनमें उपकरणों का प्रदाय करना था तृतीय चरण में प्रशिक्षण संस्थाओं का निर्माण एवं मरम्मत के साथ कुक्कुट विकास भवन की मरम्मत का कार्य भी करना था। यह तीनों चरण चार सालों की अवधि में पूरे किए जाने थे। बिंदु क्रमांक 5 में पशुपालन विभाग ने ये शर्त रखी कि हाऊसिंग बोर्ड ने विभाग के कार्य के लिए जो समयावधि और लागत तय की है उसमें किसी प्रकार की वृद्धि नहीं की जाएगी। यदि हाऊसिंग बोर्ड विलंब करता है तो बोर्ड से अपूर्ण कार्य की लागत की दो प्रतिशत तक दंड राशि भी वसूल की जाएगी।

बिंदु क्रमांक 6 में यह स्पष्ट किया गया कि भूमि की रजिस्ट्री में हाऊसिंग बोर्ड को शासन की ओर से स्टांप। पंजीयन शुल्क में किसी भी प्रकार की छूट नहीं दी जाएगी। बिंदु क्रमांक 8 में ये कहा गया कि पशु चिकित्सा विभाग की क्रय समिति उपकरणों की खरीद करेगी, परंतु क्रय के उपरांत देयकों का भुगतान हाऊसिंग बोर्ड करेगा। 
बिंदु क्रमांक 9 में यह स्पष्ट शर्त रखी गई कि प्रस्तावित आवासीय योजना के अंतर्गत निर्मित किए जाने वाले आवास । फ्लैटों को खुले बाजार में विक्रय किए जाने के लिए मंडल के दो विज्ञापन अथवा प्रथम तीन माह की अवधि तक शासकीय विभागों एवं राज्य शासन के उपक्रमों के अधिकारियों तथा कर्मचारियों को आबंटन में प्राथमिकता दी जाएगी। 
चूंकि पुर्नघनत्वीकरण योजना के मार्गदर्शी सिद्धांत नहीं बने थे इसलिए हाऊसिंग पालिसी 1995 के पैरा 6.8, 6.9, एवं 6.10 के अंतर्गत कमिश्नर हाऊसिंग बोर्ड और डायरेक्टर वेटनरी विभाग के मध्य दिनांक 31 जुलाई 2001 को एक एमओयू हस्ताक्षरित किया गया। जिसके बिंदु क्रमांक 6 में यह स्पष्ट किया गया कि इस योजना के शुरु के दो विज्ञापनों अथवा तीन माह की अवधि में शासकीय सेवक एवं अर्ध शासकीय संस्थाओं के कर्मचारियों को आबंटन में प्राथमिकता दी जाए। 

इस 13.31 एकड़ भूमि के विकास एवं भवन निर्माण योजना की स्वीकृति संयुक्त संचालक नगर तथा ग्राम निवेश जिला भोपाल ने अपने पत्र क्रमांक 3283 । एल . पी. । 29 । नग्रनि। 2003 दिनांक 20.09.2003 द्वारा प्रदान की। स्वीकृति पत्र के बिंदु क्रमांक 9 में यह स्पष्ट किया कि प्रस्तावित नक्शे में 62 विकसित आवासीय इकाईयां कमजोर आय वर्ग के लिए उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। नगर निगम भोपाल इसका अनुपालन सुनिश्चित करेगा। बिंदु क्रमांक 11 में यह स्पष्ट किया गया कि स्थल पर विद्यमान वृक्षों को यथावत रखना होगा। बिंदु क्रमांक 26 में पुन: ये स्पष्ट किया गया कि इनफार्मल सेक्टर के लिए मंडल ने आवास नीति 1995 के बिंदु क्रमांक 5.2 के अनुसार प्रस्तावना देकर स्थल से दो सौ मीटर की दूरी पर प्रस्ताव दिया है। अत: 680 वर्ग मीटर न्यूनतम पर 20.37 वर्गमीटर के 52 ईडब्ल्यूएस इकाई निर्मित करनी होंगी जिसका पालन नगर निगम भोपाल सुनिश्चित करेगा। नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के मूल स्वीकृत नक्शा दिनांक 23.09.2003 में तीन तरफ बहुमंजिला इमारतें स्वीकृत की गईं थीं। इसी के आधार पर इस योजना को पुर्नघनत्वीकरण की मंजूरी मिली थी। 

महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि हाऊसिंग बोर्ड को इस 13.71 एकड़ भूमि का कब्जा आयुक्त सह संचालक पशु चिकित्सा सेवाएं मध्यप्रदेश ने पत्र दिनांक 11 जनवरी 2005 को सौंपा। परंतु कार्यपालन यंत्री संभाग क्रमांक 6 ने इस योजना में बुकिंग के लिए प्रथम विज्ञापन दिनांक 6.11.2003 को जारी कर दिया। दूसरा विज्ञापन दिसंबर 2003 में जारी हुआ। उच्चाधिकार प्राप्त समिति एवं एमओयू में निहित शर्त के अनुसार प्रथम दो विज्ञापन अथवा प्रथम तीन माह की अवधि में शासकीय । अर्ध शासकीय कर्मचारियों को प्राथमिकता देना था। परंतु यह नहीं किया गया। तत्कालीन अपर आयुक्त हाऊसिंग बोर्ड ने पत्र दिनांक 17.10.2003 द्वारा 134 भवनों की प्राथमिक प्रशासकीय स्वीकृति जारी की जो केवल छह माह तक के लिए वैध थी। इसके उपरांत आज दिनांक तक अंतिम प्रशासकीय स्वीकृति जारी नहीं की गई है। 

कार्यपालन यंत्री । संपत्ति अधिकारी संभाग 6 भोपाल ने तीसरा विज्ञापन दिनांक 13.12.2005 को जारी किया। इसमें भी शासकीय अथवा अशासकीय कर्मचारियों को कोई प्राथमिकता नहीं दी गई। वृत्त 1 भोपाल के तत्कालीन उपायुक्त श्री आर.के.यादव एवं संभाग 6 के तत्कालीन कार्यपालन यंत्री श्री डी.के.मेहता ने नगर तथा ग्राम निवेश विभाग द्वारा वर्ष 2003 में स्वीकृत नक्शे में तीन तरफ स्थित बहुमंजिला भवनों के स्थान पर 36 ड्यूप्लेक्स बंगलों की योजना बनाकर दिनांक 9.11.2007 को एक विज्ञापन जारी कर दिया। जिसमें केवल शासन के विभागों एवं शासकीय उपक्रमों के अधिकारियों कर्मचारियों से आवेदन आमंत्रित किए गए। तथा सभी के सभी 36 मकान शासकीय कर्मचारियों को आबंटित कर दिए गए। जबकि मप्र शासन आवास एवं पर्यावरण विभाग की ओर से जारी आदेश के अनुसार अनुसूचित जाति जनजाति, सांसद विधायक आदि सभी वर्गों को सम्मलित करते हुए 65 प्रतिशत से अधिक आरक्षण किया जाना नियम विरुद्ध है परंतु कार्यपालन यंत्री एवं उपायुक्त ने मिलकर योजना परिवर्तित कर सौ प्रतिशत आरक्षण दे दिया। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि साधिकार समिति की बैठक दिनांक 7.4.2001 एवं एमओयू दिनांक 30.7.2001 की कंडिका 6 अनुसार शासकीय और अर्धशासकीय कर्मचारियों को केवल प्रथम दो विज्ञापनों में ही प्राथमिकता देनी थी। 

इस बीच मुख्यालय से तत्कालीन अपर आयुक्त श्री ए. के. शुक्ला सेवा निवृत्त हो गए। मुख्यालय में उनका कार्य वृत्त 1 के तत्कालीन उपायुक्त आर.के.यादव ने प्राप्त कर लिया। श्री यादव ने बहुमंजिला भवनों के स्थान पर इन 36 भवन (4 नाईस ड्यूप्लेक्स कार्नर, 14 ट्रिपलेक्स एवं 18 ड्यूप्लेक्स भवन)की पृथक से प्राथमिक प्रशासकीय स्वीकृति दिनांक 3.01.2008 को जारी कर दी। ये स्वीकृति केवल तीन माह के लिए ही वैध थी परंतु आज दिनांक तक अंतिम प्रशासकीय स्वीकृति जारी नहीं हुई है। लाटरी इस तरह से डाली गई कि जिसमें उस इलाके के तीन पटवारी, एक ए.एनएम, मंत्री के पीए, उनकी पुत्री और 18 डाक्टरों के नाम निकल आए। 

मप्र हाऊसिंग बोर्ड के विज्ञापन दिनांक 9.11.2007 के बिंदुक्रमांक 6 में यह स्पष्ट किया गया था कि भवनों का मूल्य पूरी तरह अनुमानित है। योजना पूरे होने पर स्वीकृत वास्तविक मूल्य निर्धारण अनुसार भवन का मूल्य देना होगा। बिंदु 7 में यह स्पष्ट किया गया था कि सर्विस टैक्स,लीज रेंट आदि नियमानुसार देय होगा। योजना 2003 से चल रही है तबसे तीन चरणों में विकास कार्य हो रहा है जो अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। यही दो बिंदु सभी विवादों की जड़ बन गए हैं। जबकि विवादों का बिंदु यह भी है कि संपूर्ण प्रक्रिया में आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किया गया है। पहले दो विज्ञापनों के स्थान पर बहुमंजिला भवनों की योजना को परिवर्तित कर इन 36लोगों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से 36 ड्यूप्लेक्स मकान बनाकर दे दिए गए। 

रिविएरा टाऊन में विवादों की स्थितियां 2009 के आरंभ में ही बन गईं थीं। मंडल के उपायुक्त (वाय) ने परिपत्र क्रमांक 07 दिनांक 19.05.2008 जारी किया। जिसमें पर्यवेक्षण शुल्क एवं आकस्मिक व्यय3 प्रतिशत पारित कर दिया गया। यह शुल्क उन सभी योजनाओं पर लागू था जिनका अंतिम मूल्य निर्धारण परिपत्र जारी होने तक नहीं हुआ था। इससे रिवियेरा फेस वन के सभी आबंटिती ( एमपी एमएल ए समेत)प्रभावित हो गए। इस समस्या के निराकरण के लिए मामला बोर्ड की 205 वीं बैठक दिनांक 15.09.2009 के अनुक्रमांक 26 पर प्रस्तुत हुआ। चूंकि पूर्व में जारी सभी नीतियां उन प्रकरणों पर लागू थीं जिनके अंतिम मूल्य निर्धारण नहीं हुए थे। ऐसी स्थिति में बोर्ड के समक्ष यह प्रस्ताव दिया कि जिन योजनाओं में विक्रय अभिलेख । अनुबंध निषपादित किए जा चुके हैं उनका मूल्य निर्धारण तत्समय लागू प्रावधानों के अनुसार किया जाए। संचालक मंडल ने सर्व सम्मति से इस प्रस्ताव को अनुमोदित कर दिया। परंतु अधिकारियों ने आदेश ।

परिपत्र क्रमांक 17 दिनांक 07.10.2009 जारी करते समय बोर्ड की ओर से स्वीकृति प्राप्त मूल प्रस्ताव, (पंजीयन विलेख। अनुबंध निष्पादित हो जाना अर्थात रजिस्ट्री हो गई है) के शब्दों का उपयोग न करते हुए उसके स्थान पर पूर्व में जो योजनाएं प्रारंभ हो चुकी हैं उन पर नई नीति लागू न होने के निर्देश जारी कर दिए गए। इस मूल प्रस्ताव में शब्दों का हेरफेर कर दिया गया। योजना पूर्ण होने के स्थान पर योजना आरंभ शब्द का उपयोग करके सभी को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया गया।

इस प्रकरण में महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भोपाल की रिविएरा टाऊन फेस 1 एवं बागमुगलिया एम्स के पास बन रही एमराल्ड पार्क सिटी योजना में केवल प्लाट पर रजिस्ट्री कर दी गई थी। जिसके कारण जिस वर्ष में प्लाट की रजिस्ट्री हुई उसी वर्ष की कलेक्टर गाईडलाईन के आधार पर उसकी कीमत ले ली गई। यही खेल सभी बिल्डर्स भी कर रहे थे। महानिरीक्षक पंजीयन एवं मुद्रांक मध्यप्रदेश ने शासन को स्टाम्प ड्यूटी एवं रजिस्ट्री फीस में हो रही हानि को देखते हुए इस पर आपत्ति ली। इसके बाद हाऊसिंग बोर्ड ने प्लाट पर रजिस्ट्री करना बंद कर दिया है जिसके कारण रिविएरा के ये 36 आबंटिती एवं प्रदेश के अन्य आबंटिती कलेक्टर गाईड लाईन के घेरे में आ गए। 

हाऊसिंग बोर्ड और शासन के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि योजनाओं को समय पर पूरा न करने के कारण कलेक्टर गाईडलाईन में हुई बेतहाशा वृद्दि का भार आबंटितियों पर डाला जाए तो उसे उनके गुस्से का सामना करना पड़ रहा है, कार्य में विलंब होने के कारण परियोजना में देरी हुई, इस पर कार्रवाई होती है तो सभी इंजीनियर जांच के घेरे में आ जाएंगे। अगर बोर्ड अपने इंजीनियरों को बचाता है तो उसका नुक्सान बोर्ड को खुद वहन करना पड़ेगा।

दूसरा डर यह भी है कि जिस तरह टू जी स्पेक्ट्रम आबंटन मामले में आबंटन के विक्रय के वर्ष के सर्किल रेट न लेते हुए ए. राजा ने 2001 के सर्किल रेट पर सभी स्पेक्ट्रम आबंटित कर दिए तो स्पेक्ट्रम आबंटन दिनांक के रेट और 2001 के रेट के अंतर की राशि 175 लाख करोड़ के घोटाले में ए राजा फंसे हुए हैं लगभग ऐसी ही स्थितियां रिविएरा और अन्य योजनाओं में भी बन गई है। मकान 2012 में पूर्ण हो रहे हैं और कलेक्टर रेट 2007 का लगा दिया जाए तो निर्णय लेने वाले उलझें नहीं इसीलिए हाऊसिंग बोर्ड ने गेंद सरकार के पाले में डाल दी है। आवास एवं पर्यावरण विभाग ने यह गेंद मुख्यमंत्री महोदय के पाले में डाल दी और मुख्यमंत्री ने यह गेंद गेंद वित्त विभाग के पाले में डाल दी है। यदि कलेक्टर रेट में माफी का ये प्रस्ताव सरकार स्वीकार कर लेती है तो बोर्ड को अकेले रिविएरा टाऊन में कम से कम छह करोड़ का और पूरे मध्यप्रदेश में 35 से 40 करोड़ का नुक्सान भुगतना पड़ेगा। इस हेराफेरी का लाभ लेने वाले तो हकीकत में पचास साठ करोड़ से ज्यादा लाभ पाएंगे जिसका बोझ सीधे जनता के खजाने पर पड़ेगा। फिलहाल ये मामला वित्त विभाग के सामने विचाराधीन है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वह जनता के धन की रक्षा करेगा।

" इन्वेस्टरों को जनता के खजाने से मुनाफा बांटने का प्लान "
"सरकार सोचे कि वह गरीबों का हक मारकर किसे नवाज रही "

रिविएरा टाऊन प्रोजेक्ट में कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य निम्नानुसार हैं। 

1. कुक्कुट भवन की योजना पुर्नघनत्वीकरण योजना के अंतर्गत नहीं मानी जा सकती क्योंकि पुर्नघन्त्वीकरण योजना के प्रथम मार्गदर्शी सिदंत 6 सितंबर 2002 को जारी कर दिए गये थे। इस स्थिति में एमओयू दिनांक 30.7.2001 में आवास नीति 1995 के पैरा 6.8, 6.9.और 6.10 को आधार बनाकर कार्रवाई की गई। इस स्थिति में आवास नीति के नियम लागू होंगे। 

2.रिविएरा टाऊन के तीनों चरणों में से किसी भी चरण की प्रशासकीय स्वीकृति मंडल ने जारी नहीं की। अधिकारियों ने अपनी मनमर्जी से बिना प्रशासकीय स्वीकृति के योजना बनाकर बेच दी। किसी भी अधिकारी पर इसके लिए कोई कार्रवाई भी नहीं की गई। 

3. विज्ञापन में आबंटितों से लीज रेंट लेने का उल्लेख है परंतु पुर्नघनत्वीकरण योजना को आधार बनाकर भूभाटक नहीं लेने का तर्क दिया जा रहा है। जबकि इसके विपरीत कलेक्टर भोपाल ने प्रमुख सचिव राजस्व विभाग को पत्र दिनांक 17.12.2009 द्वारा मार्गदर्शन मांगा है,तथा कमिश्नर हाऊसिंग बोर्ड ने अर्धशासकीय पत्र दिनांक 2.12.2009 द्वारा प्रमुख सचिव राजस्व विभाग से भू भाटक लेने या नहीं लेने बाबत मार्गदर्शन मांगा है। 

4. यह योजना साधिकार समिति की बैठक दिनांक 7.4.2011 में लिए गए निर्णय एवं एमओयू दिनांक 30.7.2001 में निहित प्रावधानों के अनुसार संचालित एवं निर्णीत होगी। जिसमें संपूर्ण भूमि की रजिस्ट्री कराए जाने, ग्रीन बैल्ट को सुरक्षित रखने, क्रय समिति के अनुसार उपकरणों का भुगतान करने, केवल प्रथम दो विज्ञापनों में ही शासकीय कर्मचारियों को प्राथमिकता का लाभ देना था। परंतु बोर्ड ने इन तीनों शर्तों का उल्लंघन किया है। 

5. पुर्नघनत्वीकरण योजना के मार्गदर्शी सिदंत 6 सितंबर 2009 को जारी हुए जिसमें विकास संस्थाओं को आबंटित भूमि पर भू भाटक नहीं लगने का उल्लेख है। यह निर्देश बाद में जारी हुए हैं जो साधिकार समिति की बैठक दिनांक 7.4.2011 में लिए गए निर्णय को अधिक्रमित नहीं करते। इसी आधार पर कलेक्टर भोपाल ने पत्र क्रमांक 607 दिनांक 17.11.2009 द्वारा प्रमुख सचिव राजस्व विभाग से यह स्पष्ट मार्गदर्शन चाहा है कि साधिकार समिति की बैठक में उक्त भूमि के नामांतरण मंडल के पक्ष में किए जाने का एवं कितना प्रीमियम व लीज रेंट लिया जाए इस संबंध में कोई लेख नहीं किया है अत: नामांतरण मंडल के पक्ष में करने एवं प्रीमियम के अनुसार भूभाटक की राशि किस प्रकार वसूल की जाए इसका मार्गदर्शन चाहा है जो आज दिनांक तक नहीं मिला है और न ही भूमि का नामांतरण हुआ है।ये भूमि आज तक शासन के ही रिकार्ड में दर्ज है। कानून के अनुसार हाऊसिंग बोर्ड भी आज तक उसका मालिक नहीं है। जबकि वह यह भूमि बेच चुका है।

6. बोर्ड बैठक दिनांक 15.09.2009 में जो योजनाएं प्रारंभ की जाकर पंजीयन विलेख । अनुबंध निष्पादित किए जा चुके हैं उनका मूल्य निर्धारण तत्समय लागू प्रावधानों के अनुसार करने का निर्णय हुआ था। मंडल के अधिकारियों ने मिलीभगत करके आयुक्त से भ्रमपूर्ण परिपत्र संशोधन जारी करवा दिया जिसमें केवल योजनाओं के शुरु होने का उल्लेख था रजिस्ट्री और अनुबंध संबंधी अनिवार्यता का उल्लेख ही नहीं किया गया था। जिसके कारण आबंटिती ये दावा कर रहे हैं कि पिछली नीति के अनुसार ही उनसे तत्समय की गाईडलाईन के अनुसार रजिस्ट्री मूल्य लिया जाए। यदि बोर्ड अपने ही अधिकारियों की गलती को छिपाएगा तो उसे करोड़ों की हानि होगी और उसकी जवाबदारी किसकी होगी। जनता के कल्याण के नाम पर चलाई जाने वाली योजनाओं पर पहला हक तो जनता का ही है।

अश्लील सीडी ने ली सिंघवी की बलि

नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी की कथित अश्लील सीडी भले ही सार्वजनिक नहीं हो पाई हो, लेकिन इसका असर उनके राजनीतिक करियर पर पड़ ही गया। चारों तरफ से पड़ते दबाव के बाद सोमवार शाम अभिषेक मनु सिंघवी ने कानून मामलों पर संसद की स्थायी समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। साथ ही उन्होंने कांग्रेस प्रवक्ता के पद से भी इस्तीफा दे दिया है। स्थायी समिति के अध्यक्ष पद से सिंघवी का इस्तीफा मंजूर कर लिया गया है।



कुछ दिन पहले सोशल नेटवर्किंग साइट पर आई कथित अश्लील सीडी विवाद का खामियाजा कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी को भुगतना ही पड़ा। हालांकि, कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद यह सीडी सार्वजनिक नहीं हो पाई थी। । सिंघवी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिख कर उन्हें अपने फैसले के बारे में सूचित किया है। इस मौके पर सिंघवी ने कहा कि चूंकि मैं पार्टी का एक अनुशासित सिपाही हूं। मैं यह ठीक नहीं समझता कि पार्टी को इस मामले में किसी प्रकार की असुविधा हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि सभी आरोप पूरी तरह से निराधार और गलत हैं।
गौरतलब है कि कानून मामलों की स्थायी समिति ने ही लोकपाल बिल का अंतिम ड्राफ्ट तैयार किया था। सीडी जारी होने के अगले ही दिन यह खबर आई थी कि टीवी चैनल को यह कथित सीडी सौंपने वाले ड्राइवर के साथ सिंघवी का समझौता हो गया है। कोर्ट में उनके ड्राइवर ने हलफनामा भी दिया था। कोर्ट की रोक और सीडी देने वाले ड्राइवर के हलफनामे के बाद चैनल भी इस विवादित सीडी को लौटाने पर राजी हो गया था।  इस बीच भारतीय जनता पार्टी ने संकेत दिया है कि अभिषेक सीडी मामले को संसद की आचरण या विशेषाधिकार समिति के पास ले जाया जा सकता है। पार्टी सूत्रों ने कहा कि यदि सीडी असली है तो यह आचरण समिति का मामला बनता है और अगर गढी गई है तो यह किसी सांसद के विशेषाधिकार का मामला है।  सिंघवी के इस्तीफे के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता अरूण जेटली ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार से इस बारे में संसद में जवाब तलब किया जायेगा। इसका आशय यह हुआ कि इन इस्तीफों के बाद भी कांग्रेस को मंगलवार से शुरू हो रहे संसद के सत्र में विपक्ष के सवालों से जूझना पड़ सकता है। भाजपा के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने इस प्रकरण को कास्टिंग काउच बताते हुए कहा कि हाईकोर्ट में किसी को जज बनवाने का प्रलोभन देना इस श्रेणी में आता है।
सिंघवी विवाद पर कांग्रस की अधिकारिक प्रतिक्रिया देते हुए पार्टी प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि ये जो भी स्थिति सामने आई उस पर अभिषेक मनु सिंघवी ने ये कदम उठाया है, और मैं समझता हूं कि अभिषेक मनु सिंघवी ने सही कदम उठाया है। अगर उन्होंने अपने आप इस्तीफा दिया और पार्टी ने स्वीकार कर लिया या पार्टी ने उनसे इस्तीफा देने के लिए कहा, दोनों बातें ही एक है।

मुर्गी ने दिया बच्चे को जन्म !

Click to Downloadअंडे का फंडा बड़ा ही विचित्र सवाल है अभी तक हमारे पास इस सवाल का जवाब नहीं था कि मुर्गी पहले आयी या अंडा लेकिन अब ऐसा लगता है जैसे श्रीलंका की एक मुर्गी इस विवाद को सुलझा देगी। इस मुर्गी ने अंडा नहीं बल्कि अपने पेट से एक चूजे को जन्म दिया है।

श्रीलंका के पहाड़ी इलाके में स्थित वेलिमादा शहर के एक पशुचिकित्सक पी. आर. यपा का कहना है कि ऐसा लगता है जैसे अंडा मुर्गी के पेट में ही परिपक्व हो गया।

चूजे को जन्म देने के बाद मुर्गी की मौत हो गई। चूजे के जन्म के बाद इंटरनल ब्लिडिंग के कारण मुर्गी की मौत हो गई लेकिन चूजा बिल्कुल ठीक है। यपा ने कहा कि मैंने ऐसी घटनाओं के बारे में केवल सुना था लेकिन ऐसा होते हुए मैंने पहली बार देखा है। उन्होंने कहा कि उनके द्वारा किए गए पोस्टमार्टम से इस दुर्लभ घटना की पुष्टि हुई है।

कलमवीरों का हंसी ठिठोली में सम्मान

 कलमवीरों का हंसी ठिठोली में सम्मान

भोपाल से विनय जी. डेविड की रिपोर्ट 09893221036

नई सदी की पहली होली जो इण्डियन फेडरेशन ऑफ वर्किग जर्नलिस्टस (ifwj) ने भोपाल में 24 मार्च 2012 को भाई चारा मजबूत करने के लिए पत्रकार भवन में आयोजित किया।








हंसी ठिठोली में सम्मान किया
हंसी ठिठोली 2012 वाकई में उन पत्रकारों को संजोकर उनको सम्मानित किया। जिसकी चर्चा भोपाल में दौड़ पड़ी है वहीं स्वर्गीय पत्रकार साथियों के परिवारों को सम्पर्क किया जिसको उक्त कार्यक्रम में सम्मानित किया है उनके नाम स्वर्गीय प्रेम बाबू श्रीवास्तव, स्वर्गीय धन्नालाल शाह, स्वर्गीय त्रिभुवन यादव, स्वर्गीय मोदी जी, स्वर्गीय अयोध्या प्रसाद गुप्ता, स्वर्गीय ध्यान सिंह तोमर, स्वर्गीय जगत पाठक, स्वर्गीय सत्यनारायण श्रीवास्तव एवं जिनका दूर दूर तक पत्रकार भवन से नाता नहीं रहा स्वर्गीय पवन विद्रोही, स्वर्गीय शोभाराम श्रीवास्तव को सम्मानित किया जायेगा। खास बात यह है कि इन आयोजकों ने वाकई में पत्रकारिता का डन्का बजाने वाले कमलवीरों का हंसी ठिठोली का पात्र बना दिया है। मजाक मजाक में ही उनको हंसी ठिठोली में उड़ा दिया। इन पत्रकारों के परिवार वालों ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि कलम की आहूति देने वाले पत्रकार भवन के लिए श्रम करने वालो को ऐसा मजाकियां सम्मान मिले। वहीं अपनी आहूलादित क्षणों को परिजनों के साथ सजोना और दुख दर्द को बांटना चाहते है।

कलम वीरों का मान-अपमान
क्या वाकई में इन लोग का सोच है जो उन कलमवीर पत्रकारों का सम्मान किया है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि 14 सालों तक कलमवीरों की याद भी नहीं आई और आई तो हंसी ठिठोली जैसे कार्यक्रम के तहत जो महामूर्ख सम्मेलन जैसा लगता है। आप उन कलमवीरों का मान या अपमान आप स्वयं परखे और जिनके नाम चयन किये है उनके परिवार वाले।

पानी के टैंकर ग्रामिणो की नहीं बरातियों की प्याय बुझा रहे

खुली

सासंद विधायक निधि सवा लाख रूपए की लागत से बने के पानी के टैंकर ग्रामिणो की नहीं बरातियों की प्याय बुझा रहे
बैतूल,(रामकिशोर पंवार): ताप्तींचल में बसे आदिवासी बाहुल्य बैतूल जिले में अपने समय काल को पूरा होते देख जिले के सासंद एवं विधायको ने दोनो हाथो से जिले की 558 ग्राम पंचायतो एवं नगरीय क्षेत्रो को सवा लाख रूपए की लागत से बने पानी के टैकंरो के लिए दिल खोल कर सरकारी पैसा लूटाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। बैतूल जिले के नगरीय क्षेत्र से लेकर ग्रामिण क्षेत्र के अधिकांश पानी के टैंकर ग्रामिणो की प्यास बुझाने के बदले बरातियों की प्यास बुझाने के लिए मनमाने ढंग से वसूले जा रहे किराये पर चल रहे है। जिले में अनेको स्थानो पर सासंद एवं विधायक निधि से खरीदे गए अनेको पानी के टैंकर तो सरकारी एवं गैर सरकारी निमार्ण कार्यो के लिए पानी की सप्लाई तक कर रहे है। जानकारो का ऐसा मानना है कि जिले के कांग्रेसी एवं भाजपाई सासंद एवं विधायको ने अपने समर्थक नगरीय क्षेत्रो की नगर पालिकाओं एवं परिषदो तथा ग्राम पंचायत को अपनी सासंद एवं विधायक निधि से पीने के पानी की सप्लाई करने के लिए आवश्क्य टैंकर उपलब्ध  करवाए है उनकी सरकारी दस्तावेजो में लागत सवा लाख रूपए है लेकिन दरअसल में प्रति टैंकर लागत चालिस हजार रूपए आई है। इतनी बड़ी संख्या में पानी के टैंकरो के लिए अनुदान देने के पीछे की कहानी कुछ इस प्रकार बताई जाताी है कि जिले के तथाकथित इमानदार एवं कत्वर्यनिष्ठ जनप्रतिनिधियों को एक टैंकर पर 80 से 85 हजार रूपए के मुनाफे की रकम का बड़ा हिस्सा मिला है। घर बैठे मुनाफे के चक्कर में इस बार सासंद एवं विधसायको द्वारा ग्रीष्म ऋतु में होने वाले तथाकथित पेयजल संकट से लोगो को निजात दिलाने के बहाने पानी के टैंकरो के लिए अपनी निधि का खुल कर उपयोग किया है। बतौर कमीशन पाने की राजनीति बहाने ग्रीष्म ऋतु के पेयजल संकट के समाधान के लिए स्वंय की निधि से प्रति टैंकर सवा लाख रूपए का अनुदान स्वीकृत कर उसका आनन - फानन में सप्लाई करने वाली एजेंसी को त्वरीत भुगतान भी करवाया गया है। सबसे आश्चर्य जनक बात है कि अपनी सासंद की कुर्सी चले जाने के डर से अभी तक अपनी सासंद निधि का फूंक - फूंक कर उपयोग करने वाली सासंद ने भी अपने दोनो हाथो से लूटाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। उल्लेखनीय है कि एक सासंद श्रीमति ज्योति बेवा प्रेम धुर्वे के जाति प्रमाण पत्र को लेकर हाईकोर्ट में दायर की गई दो अलग - अलग जनहित याचिका के सुरक्षित फैसले एवं हाईकोर्ट जबलपुर के रहमो करम पर टिकी भाजपाई आदिवासी महिला सासंद श्रीमति ज्योति बेवा प्रेम धुर्वे ने इस बार सबसे अधिक पानी के टैंकरो के लिए अपनी सासंद निधि से अनुदान स्वीकृत किया है। सासंद द्वारा स्वीकृत पानी के टैंकरो के घटिया निमार्ण की पोल उस समय खुल गई जब भीमपुर जनपद की ग्राम पंचायत कुनखेड़ी में सासंद निधि से स्वीकृत पानी का टैंकर पलट जाने से बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया। बताया जाता है कि ग्राम कुनखेड़ी में एक वैवाहिक कार्यक्रम के लिए ग्राम पंचायत सचिव के टै्रक्टर से पानी की सप्लाई करते समय टैंकर पलट गया जिसके चलते पानी के टैंकर का एक हिस्सा पूरी तरह से उखड़ गया। अब पंचायत सचिव द्वारा उस व्यक्ति पर दबाव बना कर उससे रूपए की मांग की जा रही है ताकि उन रूपयों से क्षतिग्रस्त टैंकर का निमार्ण कार्य हो सके। इसी तरह मामूली सी गर्मी में पानी के टैंकर के टायरो के फटाके के धमाके की तरह फट जाने की भी कई घटनाएं सामने आ रही है जो कि पानी के टैंकर में घटिया टायर एवं टुयूब के सप्लाई होने की कहानी बयंा करते है। ताप्तींचल में बसे आदिवासी बाहुल्य बैतूल जिले में पानी के टैंकर के दिल खोल कर दिए गए अनुदान के मामले में कांग्रेस एवं भाजपा एक दुसरे पर कोई आरोप - प्रत्यरोप लगाने की स्थिति में नहीं है क्योकि लगभग सभी जगह उन लोगो द्वारा पानी के टैंकरो की सप्लाई की है जो कि कांग्रेस एवं भाजपा के छुटभैया नेता - अभिनेता कहे जाते है। करोड़ो की लागत से बाटे गए पानी के टैंकरो के लिए अपनी - अपनी निधि से अनुदान के बदले सासंद एवं विधायको ने दिल खोल कर बोल्ड अक्षरो में स्वंय का नाम लिखवा कर वाह - वाही लूटने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। अब सवाल यह उठता है कि बैतूल जिले में पानी के टैंकरो की सप्लाई में हुई सौदेबाजी की जांच के लिए बैतूल जिले में टीम अन्ना की कमी लोगो को काफी खल रही है। वही अब यह देखना भी बाकी है कि पानी के टैंकर को लेकर वसूली गई अवैध कमीशन खोरी की जांच जिला प्रशासन या राज्य सरकार करवा पाती भी है या नहीं.?

Monday, April 23, 2012

पति को ठुकराया प्रेमी ने छोडऩे की दी धमकी

ब्यूरो प्रमुख // पी.वेंकट रत्नाकर (कटनी// टाइम्स ऑफ क्राइम)
ब्यूरो प्रमुख से संपर्क: 7879362625
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कटनी. पुराणों एवं वेदों में लिखा है स्त्री को बनाने वाले भगवान  भी की स्त्री को कब क्या सूझ रहा है स्वयं बनाने वाला नहीं समझ पाया। तो आम इंसान की बिसात क्या 15 अप्रेल को सायं 7 बजे लगभग जिला कोतवाली में आया सुनीता जो महाराष्ट्र के भोई परिवार की सबसे छोटी बेटी है जो की भोपाल के बनोरी मोहल्ले के रहने वाले बब्लू भोई के साथ आज से 10 साल पहले हुई थी जो की कुलार थाना सर्वधर्म कालोनी बनोरी मोहल्ले की रोते हुये कटनी कोतवाली में आई और मेजर से कहने साहब में पढ़ी नहीं हॅं और में सुनील रजक जो की मेरा प्रेमी है उसके साथ में दो साल पहले में कटनी भाग आई थी और सुनील रजक के साथ में गांधी गंज में बिना शादी के रह रही थी जो अब आये दिन मुझे मारता पीटता है और गाली गलौच करके आपत्तिजनक बातें करके मुझे अपमानित कर छोडऩे की बात करता है जबकि मुझे अगर छोड़ दिया तो में कहां जाऊंगी और इस पराये शहर में क्या करूगीं इसलिए मैं इन्हें छोडऩा नहीं चाहती हू। कृपा करके इनको समझाओ की ये मुझे नहीं छोड़े।

आत्म हत्या करने की कोशिश  

सुनीता भोई अपने प्रेमी सुनील रजक की रोज के प्रताडऩा से तंग आकर आत्म हत्या जैसे कदम उठाना पड़ गया 15 दिन पहले सुनीता भोई ने प्रताडऩा से इतनी क्षुब्ध हो गई की फ ांसी लगा ली तो वहीं के लोगों ने सुनीता को जिला अस्पताल में भर्ती कराया तो सुनीता बच गई। इससे बाद भी जब सुनील रजक जो उसका प्रेमी है वह प्रताडि़त करना नहीं बंद किया तो परेशान हो कर जहर खा लिया उसके बाद भी बच गई। जब सुनील रजक को यह बात पता चली तो वह दहशत में घर छोड़ कर भागा और पन्द्रह दिन बाद लौट आया और फि र प्रताडि़त करने लगा और पन्द्रह तारीक को सुनीता को मारते पीटते कटनी कोतवाली ले आया। सुनीता से मिली जानकारी के अनुसार सुनीता की शादी भोपाल निवासी बब्लू के साथ 10 साल पहले हुई थी तब सुनील रजक काम की तलाश में भोपाल आया हुआ था सुनील रजक नल फि टींग के काम का अच्छा जानकार है। और मेरे घर के पास के किराये के मकान में किराये से रहने लगा और सुनील रजक का मेरे घर आना जाना शुरू हो गया और हमारे बीच प्यार हो गया लेकिन मेरे पहले पति से तीन बच्चे भी हैं किन्तु सब जानते हैं की प्यार किसी से छुपता नहीं और सुनीता के पति को सुनील और सुनीता के प्यार का पता चल गया और पति पत्नि के बीच में रोज का झगड़ा शुरू हो गया रोज के झगड़े से तंग आकर सुनीता के पति ने कुलार थाने में एक आवेदन दिया की मेरी पत्नि का मेरे पड़ोस में रहने वाले सुनील रजक से इश्क हो गया मेरी बदनामी काफ ी हो चूकी है इसलिये में अपनी पत्नि को छोडऩा चाहता हू मेरी पत्नि कहीं भी जाये किसी के साथ जाये कहीं जाये मुझे कोई लेना देना नहीं रहेगा। जबकि सुनील रजक की उम्र मेरी पत्नि से 7 साल छोटी है। कुलार थाने से सुनील रजक को बुलाया गया और  सुनील से बुलाया गया और पूछा गया की सुनीता के पति ने छोड़ दिया है तुम्हारी वजह से तो क्या तुम सुनीता को रखोगे तो सुनील रजक ने कहा कि में सुनीता से शादी करूगां।

बिन ब्याही बनी सुनील की पत्नि  

 दो साल पहले सुनील रजक के साथ रह रही सुनीता के बताये अनुसार सुनीता और सुनील रजक के साथ बिना शादी किये दो साल से रही हू किन्तु जब भी में सुनील से शादी करने के लिये कहती हूॅं तो शादी के टाल देते है इसलिये मैने दो बार आत्म हत्या जैैसा कदम उठाया किन्तु में इनके साथ ही रहना चाहती हूॅं क्योंकि मेरा यहॉं कोई नहीं है तब जाकर पुलिस के हस्ताक्षेप करने पर सुनील रजक माना और सुनीता को अपने साथ लेकर गया।

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