Saturday, March 28, 2026

शराब का कारोबार मौलिक अधिकार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने डिस्टिलरी के लाइसेंस सस्पेंड करने का फैसले सही ठहराया

जस्टिस विवेक अग्रवाल की बेंच ने :
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सोम डिस्टिलरीज़ के कई लाइसेंस सस्पेंड करने के फैसले को सही ठहराया

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सोम डिस्टिलरीज़ के कई लाइसेंस सस्पेंड करने के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि शराब का कारोबार कोई मौलिक अधिकार नहीं है और यह सख्त कानूनी नियमों के अधीन है।

जस्टिस विवेक अग्रवाल की बेंच ने कहा:

"पहली बात तो यह कि शराब का कारोबार कोई मौलिक अधिकार नहीं है। दूसरी बात यह कि जब आनुपातिकता (Proportionality) की कसौटी पर इसे परखा जाता है तो उस आधार पर भी अथॉरिटी का फैसला एक्साइज एक्ट और उसके तहत बनाए गए नियमों के दायरे में है, इसलिए इसमें कोई गलती नहीं निकाली जा सकती।"

याचिकाकर्ताओं ने 4 फरवरी, 2026 को एक्साइज कमिश्नर द्वारा जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें दो संस्थाओं - सोम डिस्टिलरीज़ प्राइवेट लिमिटेड और सोम डिस्टिलरीज़ एंड ब्रूअरीज़ प्राइवेट लिमिटेड - को दिए गए आठ लाइसेंस सस्पेंड कर दिए गए।

यह कार्रवाई फरवरी 2024 में जारी एक 'कारण बताओ नोटिस' (Show-Cause Notice) के आधार पर की गई। यह नोटिस, जाली परमिट का इस्तेमाल करके अवैध रूप से शराब की ढुलाई करने के मामले में हुई आपराधिक सज़ाओं के चलते जारी किया गया। जिन लाइसेंसों की बात हो रही है, उनकी मूल समय सीमा 31 मार्च, 2024 को खत्म हो गई, लेकिन बाद में उन्हें अगले सालों के लिए रिन्यू कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि 'कारण बताओ नोटिस' मूल लाइसेंस की अवधि खत्म होने के बाद लागू नहीं रह सकता और इसे रिन्यू किए गए लाइसेंसों पर लागू नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि पुराने लाइसेंसों की अवधि खत्म होते ही 'कारण बताओ नोटिस' बेअसर हो गया। इसे अगले सालों के लिए रिन्यू किए गए लाइसेंसों पर लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे यह भी कहा कि चूंकि आपराधिक मामलों में अपील दायर की जा चुकी है और सज़ाओं पर रोक लगा दी गई, इसलिए 'कारण बताओ नोटिस' का मूल आधार ही खत्म हो गया।

वकील ने आगे तर्क दिया कि इसमें 'प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों' का उल्लंघन हुआ। इसमें सुनवाई का उचित मौका न मिलना और दो अलग-अलग संस्थाओं के खिलाफ एक ही (संयुक्त) 'कारण बताओ नोटिस' जारी करना शामिल है।

इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि कर्मचारियों को मिली सज़ाओं के लिए कंपनियों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह कि संबंधित कानूनी प्रावधानों का गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया।

राज्य सरकार के वकील ने तर्क दिया कि लाइसेंसों का सालाना रिन्यूअल इस शर्त पर होता है कि कानूनी प्रावधानों का पालन किया जाएगा। इसलिए पहले किए गए उल्लंघनों के कानूनी परिणाम अभी भी लागू रहेंगे। उन्होंने आगे यह भी तर्क दिया कि आपराधिक सज़ा पर कोई रोक (Stay) नहीं लगी है। सिर्फ सज़ा को सस्पेंड कर देने से यह साबित नहीं हो जाता कि वे दोषी नहीं हैं।

अदालत ने याचिकाकर्ता के तर्कों को खारिज कर दिया, यह मानते हुए कि लाइसेंस नए सिरे से दिए गए अनुदान नहीं थे, बल्कि अधिनियम और नियमों के पालन की शर्त पर उनका नवीनीकरण किया गया। इसलिए नवीनीकरण होने पर पिछली अनियमितताओं का महत्व समाप्त नहीं हो गया।

इसके अलावा, अदालत ने स्पष्ट किया कि सज़ा का निलंबन दोषसिद्धि (Conviction) पर रोक के बराबर नहीं होता; अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा कोई भी साक्ष्य पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि दोषसिद्धि पर ही रोक लगा दी गई।

नैसर्गिक न्याय के मुद्दे पर अदालत ने पाया कि धारा 31(1-A) के तहत वैधानिक आवश्यकताओं का विधिवत पालन किया गया, क्योंकि कारण बताओ नोटिस में कारणों का उल्लेख था, आवश्यक विवरण दिए गए और जवाब देने का अवसर भी प्रदान किया गया। अदालत ने आगे यह भी कहा कि याचिकाकर्ता अपने जवाबों में जाली परमिट का उपयोग करके शराब की ढुलाई करने के मुख्य आरोप से इनकार करने में विफल रहे, जो उनके खिलाफ गया।

अदालत ने फैसला सुनाया,

"यहां तक ​​कि लाइसेंस के खंड V में भी शर्तों के उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान है। इसलिए इस कसौटी पर भी आबकारी आयुक्त के कार्य में कोई दोष नहीं निकाला जा सकता।"

अदालत ने आगे यह भी कहा कि आबकारी अधिनियम की धारा 31(1)(c) और 44 के तहत कर्मचारियों, एजेंटों और लाइसेंस धारक की ओर से कार्य करने वाले व्यक्तियों के कार्यों के लिए लाइसेंस धारक को ही जिम्मेदार माना जाता है। इस प्रकार, ड्राइवर, क्लीनर और अन्य संबंधित व्यक्तियों की दोषसिद्धि ही वैधानिक परिणामों को लागू करने के लिए पर्याप्त थी।

पीठ ने कहा,

"इस प्रकार, 'कोई भी व्यक्ति जो उसकी (लाइसेंस धारक की) ओर से उसकी स्पष्ट या निहित अनुमति से कार्य कर रहा हो' - इस वाक्यांश में उस ट्रक का ड्राइवर और क्लीनर भी शामिल होगा, जिसमें सामग्री की ढुलाई की गई। इसलिए मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत उनकी दोषसिद्धि, आबकारी अधिनियम की धारा 31 की उप-धारा (1) के खंड (c) की भाषा के अनुसार, लाइसेंस धारक पर भी बाध्यकारी होगी।"

आनुपातिकता के सिद्धांत (Doctrine of Proportionality) को लागू करते हुए अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि उल्लंघन की गंभीरता को देखते हुए - जिसमें जाली परमिट का उपयोग और आबकारी राजस्व की हानि शामिल थी - राज्य द्वारा की गई कार्रवाई उचित और न्यायसंगत थी।

पीठ ने टिप्पणी की,

"इसलिए विदेशी शराब की ढुलाई के लिए जाली परमिट का उपयोग करके की गई धोखाधड़ी के संदर्भ में प्रतिवादियों के विवादित कार्यों को जब आनुपातिकता के सिद्धांत की कसौटी पर परखा जाता है, तो उनमें कोई दोष नहीं निकाला जा सकता।"

इस प्रकार, अदालत ने रिट याचिका खारिज की।

Case Title: Som Distilleries v State of Madhya Pradesh [WP-4915-2026]


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