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Sunday, February 15, 2026

IAS अवि प्रसाद ने 10 वर्षों में रचाई 3 शादियां : दो पत्नियां जिले में कलेक्टर, तीन शादियां चर्चा का विषय


IAS अवि प्रसाद ने 10 वर्षों में रचाई 3 शादियां : दो पत्नियां जिले में कलेक्टर, तीन शादियां चर्चा का विषय 


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एमपी के एक IAS अफसर ने 10 वर्षों में रचाई 3 शादियां, तीनों पत्नियां भी मप्र में है IAS, दो अलग-अलग जिले में कलेक्टर, 10 वर्षों में हुई तीन शादियां चर्चा का विषय बनी। 

मध्य प्रदेश के एक आईएएस अफसर एक नहीं बल्कि 3 शादियां रचाई हैं। हालांकि आईएएस अफसर ने तलाक के बाद दूसरी और फिर तीसरी शादी रचाई है। लेकिन इसमें हैरत और खास बात यह है कि उनकी तीनों पत्नियां भी मध्य प्रदेश में ही IAS हैं जिसमें से दो अलग-अलग जिले में कलेक्टर है। 

मध्य प्रदेश कैडर के 2014 बैच के आईएएस अधिकारी अवि प्रसाद ने 11 फरवरी  को कूनो (Kuno) के एक रिसॉर्ट में अंकिता धाकरे के साथ विवाह किया. अंकिता 2017 बैच की आईएएस अधिकारी है और वर्तमान में मंत्रालय में डिप्टी सेक्रेटरी के पद पर तैनात है.  यह विवाह समारोह बेहद निजी रखा गया था.

यहां पर सूत्रों से जो जानकारी मिल रही है उसमें यह बताया गया कि कटनी जिले के कलेक्टर रह चुके अवि प्रसाद जिन्होंने 10 वर्षों के भीतर तीन शादियां रचाई है। तीसरी शादी अभी 2 दिन पहले शिवपुरी में रचाई गई। 

आईएएस अवि प्रसाद पहली शादी 2014 बैच की आईएएस रिजु बाफना से हुई थी, जो वर्तमान में शाजापुर की कलेक्टर है. हालांकि, यह रिश्ता ज्यादा समय तक नहीं चला और दोनों का तलाक हो गया.

इसके बाद आईएएस अवि प्रसाद की मुलाकात 2016 बैच की महिला आईएएस मिशा सिंह से हो गई, इसके बाद दोनों ने विवाह कर लिया। इस बार भी उन दोनों के बीच विवाह का बंधन ज्यादा दिन नहीं टिक सका और कुछ ही सालों में तलाक हो गया।आईएएस मिशा सिंह वर्तमान में रतलाम जिले की कलेक्टर है इसके पूर्व में वह उमरिया और जबलपुर जिले में अपर कलेक्टर रही। मिशा सिंह के साथ उनका रिश्ता लगभग चार साल तक रहा, जिसके बाद वे अलग हो गए.

इसके बाद जो जानकारी फिलहाल अभी मिल रही है वह यह कि आईएएस अवि प्रसाद ने 11 फरवरी, 2026 को कूनो नेशनल पार्क में 2017 बैच की आईएएस अधिकारी है और वर्तमान में मंत्रालय में डिप्टी सेक्रेटरी के पद पर तैनात है.
IAS अंकिता धाकरे से विवाह किया। इसके पूर्व वह उज्जैन में जिला पंचायत की सीईओ रही है। इस तरह से आईएएस अवि प्रसाद ने बीते 10 वर्षों में तीन शादियां रचाई है जो प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारे में चर्चा का विषय बनी हुई है।

Saturday, February 14, 2026

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से आज नवपदस्थ आयुक्त (जनसम्पर्क) एवं प्रबंध संचालक, मध्यप्रदेश माध्यम श्री मनीष सिंह ने मुख्यमंत्री निवास पर सौजन्य भेंट की

 


मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से आज नवपदस्थ आयुक्त (जनसम्पर्क) एवं प्रबंध संचालक, मध्यप्रदेश माध्यम श्री मनीष सिंह ने मुख्यमंत्री निवास पर सौजन्य भेंट की





Friday, February 13, 2026

ईसाई महासंघ में समाजसेवी अतुल जोसफ को ईसाई महासंघ का राष्ट्रीय सचिव नियुक्त किया, नियुक्ति से संगठन में हर्ष का माहौल


ईसाई महासंघ में समाजसेवी अतुल जोसफ को ईसाई महासंघ का राष्ट्रीय सचिव नियुक्त  किया, नियुक्ति से संगठन में हर्ष का माहौल

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ईसाई महासंघ में अतुल जोसफ को ईसाई महासंघ का राष्ट्रीय सचिव नियुक्त  किया, नियुक्ति से संगठन में हर्ष का माहौल

अतुल जोसफ की नियुक्ति से संगठन में हर्ष का माहौल

जबलपुर. ईसाई महासंघ के राष्ट्रीय महासचिव (प्रशासन) रंजन नायर एवं संगठन की कोर कमेटी की सर्वसम्मत सहमति से अतुल जोसफ को ईसाई महासंघ का राष्ट्रीय सचिव नियुक्त किया गया है। उनकी नियुक्ति की घोषणा के साथ ही संगठन एवं मसीह समाज में खुशी की लहर दौड़ गई है।

नवनियुक्त राष्ट्रीय सचिव अतुल जोसफ को संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों, धर्मगुरुओं एवं समाजसेवियों ने शुभकामनाएँ देते हुए संगठन को और अधिक सशक्त, सक्रिय एवं एकजुट बनाने की अपील की है।

इस अवसर पर ईसाई महासंघ के प्रभाकर तिर्की, हनी जॉन, राजेश सेल्वराज, फादर आनंद मुतुंगल, बिशप राजेश चौधरी, एडवोकेट मंजू पिल्लै, एडवोकेट अल्बर्ट एंथोनी, सैम्युएल जेम्स, विनय जी. डेविड सहित अनेक मसीह समाज के प्रबुद्धजनों ने बधाई संदेश प्रेषित किए।

सभी ने आशा व्यक्त की कि अतुल जोसफ के नेतृत्व में ईसाई महासंघ संगठनात्मक मजबूती, सामाजिक समरसता एवं अल्पसंख्यक हितों की रक्षा के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों को प्राप्त करेगा।


आरटीआई एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले लोक सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कानूनी कार्यवाही


आरटीआई एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले लोक सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कानूनी कार्यवाही 

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RTI मे भी FIR दर्ज हो सकती है अगर सही कानूनी प्रकिया अपनाये तो।

* FIR / शिकायत – RTI उल्लंघन और धमकी -

प्रेषक / शिकायतकर्ता :

नाम : [आपका नाम]

पता : [आपका पूरा पता]

संपर्क : [मोबाइल / ईमेल]

प्रति,

थाना अधिकारी,

[पुलिस स्टेशन का नाम],

[शहर / जिला], [राज्य]

विषय : लोक सूचना अधिकारी / प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा RTI अधिनियम का उल्लंघन एवं धमकी के संबंध में शिकायत।

महोदय,

मैं, [आपका नाम], यह शिकायत/एफआईआर लोक सूचना अधिकारी / प्रथम अपीलीय अधिकारी के खिलाफ प्रस्तुत कर रहा हूँ। विवरण निम्नानुसार है :

1. सूचना न देने का उल्लंघन

दिनांक [DD/MM/YYYY] को RTI आवेदन संख्या [RTI नंबर] प्रस्तुत किया गया।

लोक सूचना अधिकारी ने समय पर या उचित जानकारी नहीं दी।

यह RTI Act धारा 7(2) का उल्लंघन है।

संबंधित BNS धारा 198 (Public servant disobeying law) के तहत एफआईआर दर्ज की जाए।

2. झूठी / भ्रामक जानकारी देने की स्थिति -

लोक सूचना अधिकारी ने जानबूझकर झूठी / अधूरी जानकारी प्रदान की।

इसके लिए BNS धाराएँ 199, 201, 318, 336, 340 लागू की जाएँ।

3. प्रथम अपीलीय अधिकारी का निर्णय न करना :

दिनांक [DD/MM/YYYY] को प्रथम अपीलीय अपील दायर की गई।

अधिकारी ने समय पर निर्णय नहीं दिया।

BNS धारा 198 के तहत एफआईआर दर्ज करवाई जाए।

4. गैरहाजिरी / सूचना देने से मना करना :

सुनवाई के दौरान या बाद में प्रथम अपीलीय अधिकारी ने सूचना उपलब्ध नहीं कराई।

इसके लिए BNS धारा 198 / 199 लागू हो।

5. निर्णय के बावजूद सूचना न देना :

निर्णय के बाद भी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।

BNS धारा 198 / 318 के तहत कार्रवाई की जाए।

6. धमकी / उत्पीड़न :

लोक सूचना अधिकारी / प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा आवेदक को धमकाया गया।

संबंधित अपराध के लिए BNS Threat / Intimidation clauses के तहत एफआईआर दर्ज कराई जाए।

7. न्यायिक प्रमाण और हवाले -

* मुंबई हाई कोर्ट विवेक विष्णु पेंट कुलकर्णी बनाम महाराष्ट्र राज्य – RTI जवाब न देने पर FIR दर्ज करने के निर्देश।

* मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग :

सूचना न देने वाले अधिकारी पर ₹15,000 जुर्माना।

RTI में मांगी जानकारी न देना खेल अधिकारी आशीष पांडे को पड़ा महंगा, राज्‍य सूचना आयुक्‍त ने लगाया 10 हजार का जुर्माना

इसे भी पढ़ें :- सूचना के अधिकार की धज्जियां उड़ने वाले जबलपुर के खेल और लोक सूचना अधिकारी पर ₹10,000 का जुर्माना, म.प्र. राज्य सूचना आयोग द्वारा पारित आदेश की प्रति

* उत्तर प्रदेश का केस : तहसीलदार पर ₹25,000 जुर्माना।

* दिल्ली हाई कोर्ट :

RTI दंडात्मक कार्रवाई केवल सूचना आयोग द्वारा।

सुप्रीमकोर्ट : सूचना आयोगों में रिक्त पद भरना अनिवार्य।

• संलग्नक -

RTI आवेदन की प्रतिलिपि,

प्रथम अपीलीय अपील की प्रतिलिपि,

प्राप्त / नहीं मिली जानकारी का प्रमाण,

धमकी / नोटिस का कोई भी साक्ष्य।

दिनांक : [DD/MM/YYYY]

स्थान : [शहर / जिला]

शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर : _

और नाम : [आपका नाम]।

साभार : आत्मदीप आरटीआई इन्फो

Thursday, February 12, 2026

जबलपुर कलेक्टर राघवेंद्र सिंह के निर्देशानुसार जिले में अवैध रेत खनन और परिवहन पर नियंत्रण के लिए अभियान , खनिज माफिया कलेक्टर राघवेंद्र सिंह को दिखा रहे ठेंगा


जबलपुर कलेक्टर राघवेंद्र सिंह के निर्देशानुसार जिले में अवैध रेत खनन और परिवहन पर नियंत्रण के लिए अभियान , खनिज माफिया कलेक्टर राघवेंद्र सिंह को दिखा रहे ठेंगा

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जबलपुर जिले में अवैध रेत खनन और परिवहन पर नियंत्रण के लिए अभियान

जबलपुर. कलेक्टर श्री राघवेंद्र सिंह के निर्देशानुसार संपूर्ण जिला अंतर्गत खनिज रेत के अवैध उत्खनन एवं परिवहन पर नियंत्रण की दृष्टि से एक साथ नर्मदा नदी एवं हिरन नदी के घाटों पर एसडीएम के नेतृत्व में राजस्व, पुलिस एवं खनिज अमले की टीम द्वारा छापामार कार्यवाही कराई गई। जिले में यह अभियान विगत 03 दिवस तक लगातार चलाया गया।
कार्यवाही के दौरान तहसील सिहोरा अंतर्गत ग्राम देवरी, खिरहेनी, घोराकोनी एवं मढ़ा क्षेत्र में नदी से रेत की अवैध निकासी न हो इसके लिए घाटों को जाने वाले रास्तों को अवरुद्ध किया गया एवं नदी के किनारे पड़ी रेत के ढेरों को नदी में समावेश किया गया।
इसी प्रकार तहसील कुंडम क्षेत्र में ग्राम कल्याणपुर एवं रानीपुर घाटों में जांच कर रास्ते को अवरुद्ध किया गया। तहसील शहपुरा क्षेत्र में ग्राम भड़पुरा, शीतलपुर क्षेत्र में जांच कर लगभग 4000 घनमीटर रेत अनाधिकृत रूप से अज्ञात व्यक्तियों द्वारा विभिन्न स्थलों पर एकत्र किया गया, उसे नदी में जेसीबी मशीनों द्वारा गिराया गया।
राजस्व, पुलिस एवं खनिज अमले द्वारा ग्राम सगड़ा झपनी में छापामार कार्यवाही कर 150 घनमीटर रेत एकत्रित किया गया को नर्मदा नदी में गिराया गया। तहसील पाटन क्षेत्र अंतर्गत हिरन नदी के घाट महुआखेड़ा, जूरीकला, पौड़ीकला, गाड़ाघाट, मडवा, कैमारी घाट का औचक निरीक्षण किया गया।
निरीक्षण के दौरान गाड़ाघाट से लगे कोनीकला घाट में लगभग 200 घनमीटर रेत एकत्रित पाई गई, जिसे नदी के जल प्रवाह में डालकर विनिष्ट किया गया। इन घाटों पर बने रास्ते एवं रेम्प को भी नष्ट किया गया। तहसील सिहोरा क्षेत्र में जांच के दौरान 03 ट्रैक्टर ट्रॉली रेत अवैध परिवहन करते जप्त किया गया, जिनके विरुद्ध खनिज अधिनियम के तहत कार्यवाही करने हेतु प्रकरण कलेक्टर न्यायालय में खनिज विभाग द्वारा प्रस्तुत किए गए।

Tuesday, February 10, 2026

राजपाल यादव की कर्ज चुकाने में मदद करेंगे सोनू सूद, तिहाड़ में बंद एक्‍टर के लिए कहा- दान नहीं, सम्मान

 


राजपाल यादव की कर्ज चुकाने में मदद करेंगे सोनू सूद, तिहाड़ में बंद एक्‍टर के लिए कहा- दान नहीं, सम्मान

चेक बाउंस मामले में फंसे बॉलीवुड एक्टर राजपाल यादव ने तिहाड़ जेल में सरेंडर करने से पहले भावुक होते हुए कहा- क्या करूं? मेरे पास पैसे नहीं हैं। कोई और रास्ता नहीं दिख रहा, यहां सब अकेले हैं, कोई दोस्त नहीं होता। अब सोनू सूद ने उनके लिए मदद का हाथ बढ़ाया है।

Sonu Sood spoke about Rajpal Yadav
तिहाड़ जेल में सरेंडर करने वाले राजपाल यादव के लिए बोले सोनू सूद
एक पुराने चेक बाउंस मामले में फंसे बॉलीवुड एक्टर राजपाल यादव को हाल ही में दिल्ली के तिहाड़ जेल में सरेंडर करना पड़ा। सरेंडर से पहले वो काफी इमोशनल हुए और साफ कहा कि उनके पास पैसे नहीं हैं। बॉलीवुड में रियल हीरो के तौर पर जाने जानेवाले सोनू सूद एक बार फिर सामने हैं और इस मामले में राजपाल यादव की मदद के लिए उन्होंने आवाज उठाई है।

साल 2010 के चेक बाउंस मामले में 5 करोड़ रुपये का कर्ज चुका पाने में असमर्थ एक्टर राजपाल ने आखिरकार सरेंडर कर दिया। सरेंडर करने से ठीक पहले वो काफी भावुक हो गए और अधिकारियों से कहा, 'सर, क्या करूं? मेरे पास पैसे नहीं हैं। कोई और रास्ता नहीं दिख रहा, यहां सब अकेले हैं, कोई दोस्त नहीं होता। इस मुश्किल से मुझे खुद ही गुजरना होगा।'


राजपाल यादव की मदद के लिए सोनू सूद ने उठाई आवाज

उन्होंने एक्टर की मदद के लिए एक दमदार आवाज उठाते हुए कहा है, 'एक छोटी सी अमाउंट राशि, जिसे भविष्य के काम के बदले दिया जा सकता है, ये दान नहीं, बल्कि सम्मान है। जब हमारी ही इंडस्ट्री का कोई सदस्य कठिन दौर से गुजर रहा हो तो हमें उन्हें ये यह याद दिलाना चाहिए कि वह अकेला नहीं है। इसी तरह हम यह साबित करते हैं कि हम सिर्फ एक इंडस्ट्री से कहीं बढ़कर हैं।'

ये दान नहीं, बल्कि सम्मान है। जब हमारी ही इंडस्ट्री का कोई सदस्य कठिन दौर से गुजर रहा हो तो हमें उन्हें ये यह याद दिलाना चाहिए कि वह अकेला नहीं है।
सोनू सूद

लोगों ने सोनू सूद के इस कदम पर जताया आभार

सोशल मीडिया पर उनके इस ट्वीट पर लोगों ने भी रिएक्ट किया है। एक ने कहा, 'यही सच्ची मानवता है। गलती तो हर कोई कर सकता है, लेकिन उस गलती की वजह से किसी का जीवन और करियर बर्बाद करना गलत है! आपने सही फैसला लिया है और मैं भगवान गणेश से प्रार्थना करता हूं कि आपकी ये कोशिश सफल हों।' एक और ने कहा- सोनू के इस बड़े कदम के लिए उन्हें सलाम, राजपाल यादव इस उद्योग जगत से मिलने वाले प्यार और समर्थन के हकदार हैं।

क्या है राजपाल यादव से जुड़ा ये पूरा मामला

एक्टर से जुड़ा ये मामला 16 साल पुराना है। ये साल 2010 की बात है जब राजपाल यादव ने बतौर डायरेक्टर फिल्म 'अता पता लापता' बनाई थी। इसे बनाने के लिए उन्होंने मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (M/s Murali Projects) नाम की कंपनी से 5 करोड़ रुपये उधार लिए थे। हालांकि फिल्म बन गई और रिलीज भी हुई लेकिन पूरी तरह से पिट गई। इस वजह से राजपाल यादव को तगड़ा आर्थिक चोट पहुंचा और जिस कंपनी से 5 करोड़ रुपये का कर्ज लिए वो भी डूब गया। एक्टर वो रकम आज तक लौटा नहीं पाए और इसके बाद कंपनी ने फिर राजपाल यादव के खिलाफ केस कर दिया । एक्टर पर आरोप लगाया गया कि राजपाल ने जो भी चेक दिए, वो बाउंस हो गए।

इससे पहले भी राजपाल यादव जा चुके हैं जेल

इसी मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने राजपाल यादव को कई बार नोटिस भेजे, लेकिन वे लंबे समय तक कोर्ट में पेश नहीं हुए, जिसके बाद साल 2013 में उन्हें 10 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। वे 3 से 6 दिसंबर 2013 तक चार दिनों तक जेल में रहे। बाद में दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ ने उनकी अपील पर सजा निलंबित कर दी थी। इसके बाद निचली अदालत ने राजपाल यादव और उनकी पत्नी को छह महीने की साधारण कैद की सजा सुनाई थी, जिसे उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी। जून 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट ने यह कहते हुए सजा पर अस्थायी रोक लगा दी कि एक्टर कोई आदतन अपराधी नहीं हैं। इसी आधार पर कोर्ट ने दोनों पक्षों को आपसी समझौते की संभावनाएं तलाशने की सलाह दी थी।

राजपाल यादव ने कोर्ट को ये भरोसा दिलाया था

दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता को लेकर राजपाल यादव ने कोर्ट को ये भरोसा दिलाया था कि वे शिकायतकर्ता कंपनी को कुल 2.5 करोड़ रुपए का भुगतान करेंगे। इसमें 40 लाख रुपए की पहली किश्त थी और 2.10 करोड़ रुपए की दूसरी किश्त शामिल थी। हालांकि, वो ऐसा कर नहीं पाए।

जनवरी में कोर्ट ने दिया था राजपाल को अंतिम मौका

इसी साल जनवरी 2026 में कोर्ट ने राजपाल यादव को अंतिम मौका दिया था। एक्टर के वकील ने कोर्ट को बताया था कि एक्टर ने 50 लाख रुपये का इंतजाम कर लिया है और भुगतान करने के लिए एक हफ्ते का और समय मांगा था। हालांकि, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने सरेंडर करने के लिए समय बढ़ाने की राजपाल यादव की अर्जी खारिज कर दी। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि चेक बाउंस मामलों में बार-बार किए गए वादों का उल्लंघन बेहद गंभीर है। कोर्ट ने कहा कि एक्टर को कई अवसर दिए गए, लेकिन हर बार उन्होंने अदालत के भरोसे को तोड़ा है। इसके बाद उन्हें 4 फरवरी को शाम 4 बजे तक आत्मसमर्पण करने की मोहलत दी गई थी।

Monday, February 9, 2026

बैतूल SP की बड़ी कार्यवाही SI निलंबित, चार केस डायरी गायब, न्यायालय में पेश नहीं हुए चालान, सात दिन में जांच के निर्देश

 


बैतूल SP की बड़ी कार्यवाही SI निलंबित, चार केस डायरी गायब, न्यायालय में पेश नहीं हुए चालान, सात दिन में जांच के निर्देश

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पुलिस अधीक्षक की सख्त कार्रवाई, चार चालान गायब एसआई सस्पेंड

बैतूल. मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करने वाले एक गंभीर मामले में पुलिस अधीक्षक वीरेंद्र जैन ने सख्त कार्रवाई करते हुए उप निरीक्षक पवन कुमार को निलंबित कर दिया है। 

आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान कोतवाली थाना क्षेत्र से जुड़े चार आपराधिक मामलों की केस डायरी (चालान) न्यायालय में पेश नहीं की गईं ओर वे अब तक लापता है। जानकारी के अनुसार जिन मामलों के चालान गायब हुए हैं, उनमें जबरन वसूली, शासकीय कार्य में बाधा, मारपीट और धमकी जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं। 

समय पर चालान प्रस्तुत नहीं होने से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई, जिसे पुलिस प्रशासन ने गंभीर लापरवाही और अनुशासनहीनता की श्रेणी में माना है। पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी आदेश में बताया गया है कि पवन कुमार वर्तमान में थाना गंज, बैतूल में पदस्थ थे। निलंबन के बाद उन्हें तत्काल प्रभाव से रक्षित केंद्र बेतूल से संबद्ध कर दिया गया है। निलंबन अवधि के दौरान उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता मिलेगा। 

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुनील लाटा को सात दिवस के भीतर प्रारंभिक जांच पूर्ण कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए है। जांच में यह भी स्पष्ट किया जाएगा कि चालान किन परिस्थितियों में गायब हुए और इसमें किसी अन्य अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका रही या नहीं। 

पुलिस प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि इस प्रकार की लापरवाही से न केवल न्यायिक प्रक्रिया बाधित होती है, बल्कि आम जनता का विश्वास भी प्रभावित होता है। भविष्य में इस तरह की चूक किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह कार्रवाई पुलिस विभाग में जवाबदेही और पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

यदि पुलिस अधिकारी FIR दर्ज करने से मना "करें तो क्या करें" अपनाएं ये कानूनी कदम...

 


यदि पुलिस अधिकारी FIR दर्ज करने से मना "करें तो क्या करें" अपनाएं ये कानूनी कदम...

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यदि पुलिस अधिकारी FIR दर्ज करने से मना करे (BNSS 2023 के तहत विस्तृत विश्लेषण)

भारत में अपराधों की रिपोर्टिंग और न्याय पाने का पहला कदम एफआईआर (FIR – First Information Report) दर्ज करना है। किसी भी नागरिक के लिए यह महत्वपूर्ण अधिकार है, विशेषकर जब मामला संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) का हो। संज्ञेय अपराध ऐसे अपराध होते हैं जिनमें पुलिस बिना कोर्ट की अनुमति के सीधे जांच शुरू कर सकती है। हालाँकि, कई बार पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करने से मना कर देते हैं। ऐसे में नए भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNSS 2023) ने स्पष्ट प्रक्रियाएँ और अधिकार दिए हैं ताकि नागरिक को न्याय मिल सके और पुलिस जवाबदेह रहे। नीचे इसका विस्तृत विवरण दिया गया है।


✅ 1. FIR दर्ज करने का कर्तव्य (Duty to Register FIR – Sec 173(1) BNSS)

BNSS 2023 के अनुसार, यदि कोई संज्ञेय अपराध घटित होता है तो पुलिस अधिकारी पर FIR दर्ज करना अनिवार्य है। यह पुलिस का प्राथमिक दायित्व है। यदि कोई नागरिक अपराध की जानकारी देता है, तो पुलिस जांच प्रारंभ करने के लिए FIR दर्ज करने से मना नहीं कर सकती।

महत्त्वपूर्ण बिंदु:

प्रारंभिक जांच (Preliminary Enquiry) केवल तब की जा सकती है जब अपराध की सज़ा 3 से 7 वर्ष के बीच हो और उसके लिए DSP (Deputy Superintendent of Police) की अनुमति आवश्यक हो।

सामान्य संज्ञेय अपराधों में किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है, और सीधे FIR दर्ज की जानी चाहिए।

FIR दर्ज करने से इनकार करना कानून का उल्लंघन है।

✅ 2. शून्य FIR (Zero FIR – Sec 173(2) BNSS)

कई बार पीड़ित को यह स्पष्ट नहीं होता कि अपराध किस थाने के क्षेत्र में हुआ है। ऐसी स्थिति में BNSS 2023 ने ‘Zero FIR’ का प्रावधान किया है। इसका अर्थ है कि पीड़ित किसी भी पुलिस स्टेशन में जाकर अपराध की रिपोर्ट दर्ज कर सकता है।

Zero FIR की विशेषताएँ:

थाना क्षेत्र की परवाह किए बिना FIR दर्ज की जाएगी।

बाद में इसे संबंधित क्षेत्र के थाना में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।

शिकायतकर्ता को FIR की मुफ्त प्रति उपलब्ध कराई जाएगी।


यह प्रावधान विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों, वंचित वर्गों, और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वालों के लिए अत्यंत उपयोगी है।


✅ 3. एसपी के पास शिकायत (Escalation to Superintendent of Police – Sec 173(4) BNSS)

यदि थाना प्रभारी (SHO) FIR दर्ज करने से मना करता है, तो नागरिक लिखित शिकायत एसपी (Superintendent of Police) को कर सकता है। एसपी को कानूनन अधिकार है कि:

FIR दर्ज करने का आदेश दे।

मामले की जांच का आदेश दे।

थाना प्रभारी की लापरवाही पर कार्यवाही करे।


यह प्रक्रिया नागरिक को न्याय पाने की अगली वैधानिक राह देती है।


✅ 4. मजिस्ट्रेट से राहत (Magistrate Intervention – Sec 175 BNSS जैसे प्रावधान)

यदि एसपी भी कार्यवाही नहीं करता है, तो नागरिक मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर सकता है। मजिस्ट्रेट शिकायत पर संज्ञान लेकर पुलिस को FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने का आदेश दे सकता है। यद्यपि BNSS 2023 में स्पष्ट रूप से धारा 175 का उल्लेख नहीं मिलता, यह अधिकार पुराने CrPC की धारा 156(3) के समान है।


यह उपाय न्याय प्रणाली का तीसरा स्तर है, जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।


✅ 5. उच्च न्यायालय में रिट याचिका (High Court Remedy – Article 226 of the Constitution)

यदि थाना और एसपी दोनों FIR दर्ज करने से मना करें, और मजिस्ट्रेट भी राहत न दे, तो नागरिक सीधे उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर सकता है।


संभावित राहतें:

FIR दर्ज करने का निर्देश।

जांच की निगरानी का आदेश।

पीड़ित को मुआवजा प्रदान करने का निर्देश।

पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई का आदेश।


उच्च न्यायालय नागरिकों के अधिकारों की अंतिम सुरक्षा प्रदान करता है।


✅ 6. FIR दर्ज न करने पर पुलिस अधिकारी पर दंड (Penalties for Police Refusal – Sec 199(c) BNSS)

BNSS 2023 में पुलिस अधिकारियों के लिए दंड का प्रावधान भी किया गया है। यदि कोई पुलिस अधिकारी जानबूझकर FIR दर्ज करने से इनकार करता है, तो:


उसे 6 महीने से 2 वर्ष तक की कैद की सजा हो सकती है।

साथ में आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है।


यह प्रावधान पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित करता है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।


✅ 7. पुलिस अधिकारी के विरुद्ध अपराध (Offences Against Police – Sec 121 BNSS)


पुलिस के कार्य में बाधा डालने या उन्हें घायल करने वाले अपराधों के लिए भी BNSS ने कठोर दंड का प्रावधान किया है। यदि कोई व्यक्ति पुलिस को उनकी ड्यूटी निभाने से रोकने के लिए चोट पहुँचाता है, तो:


उसे 5 से 10 वर्ष तक की सजा हो सकती है।

साथ में जुर्माना भी लगाया जाएगा।


यह प्रावधान पुलिस के सम्मान और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।


🔑 व्यावहारिक पहलू और सुझाव

FIR दर्ज न होने पर:

तुरंत उच्च अधिकारी से संपर्क करें, लिखित शिकायत दें, और शिकायत की रसीद या कॉपी लें।

Zero FIR का प्रयोग करें:

क्षेत्रीय अस्पष्टता की स्थिति में किसी भी थाना में जाकर शिकायत करें।

डिजिटल प्लेटफॉर्म:

कई राज्यों में ऑनलाइन FIR सुविधा भी उपलब्ध है। इसका उपयोग करें।

कानूनी सहायता लें:

वकील या विधिक सेवा प्राधिकरण से मदद लेकर उच्च न्यायालय या मजिस्ट्रेट से राहत लें।

FIR की कॉपी:

FIR की मुफ्त कॉपी अवश्य लें, जो भविष्य में सबूत के रूप में उपयोगी होगी।

✅ निष्कर्ष


BNSS 2023 ने नागरिकों को FIR दर्ज कराने का स्पष्ट और प्रभावी अधिकार दिया है। पुलिस का दायित्व है कि संज्ञेय अपराधों की रिपोर्ट तुरंत दर्ज करे। Zero FIR जैसे प्रावधान नागरिकों के लिए राहत का रास्ता खोलते हैं। SHO द्वारा मना करने पर एसपी, मजिस्ट्रेट और उच्च न्यायालय तक शिकायत का अधिकार है। साथ ही पुलिस अधिकारियों की लापरवाही पर दंड का प्रावधान न्याय प्रणाली को मजबूत बनाता है।


यह कानून न केवल अपराध की रिपोर्टिंग में मदद करता है बल्कि पुलिस की जवाबदेही, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और न्याय की उपलब्धता को सुनिश्चित करता है। नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए और कानून द्वारा प्रदत्त सभी राहत उपायों का उपयोग करना चाहिए।


✅ 1. FIR क्या है?


FIR (First Information Report) अपराध की प्राथमिक जानकारी है जिसे पुलिस संज्ञेय अपराध की स्थिति में दर्ज करती है।


✅ 2. पुलिस पर FIR दर्ज करने का क्या दायित्व है?


पुलिस को संज्ञेय अपराध की शिकायत मिलते ही FIR दर्ज करनी होती है, बिना किसी अनुमति के।


✅ 3. Preliminary Enquiry कब की जा सकती है?


Preliminary enquiry केवल तब की जा सकती है जब अपराध की सजा 3 से 7 वर्षों के बीच हो और DSP की अनुमति ली जाए।


✅ 4. Zero FIR क्या है?


Zero FIR वह प्रक्रिया है जिसमें पीड़ित किसी भी थाने में जाकर FIR दर्ज करा सकता है, भले ही अपराध का क्षेत्र अस्पष्ट हो।


✅ 5. SHO FIR दर्ज न करे तो क्या करें?


SHO के मना करने पर शिकायत लिखित रूप में एसपी (Superintendent of Police) को दी जा सकती है।


✅ 6. यदि एसपी भी कार्यवाही न करे तो क्या उपाय है?


मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर FIR दर्ज कराने का आदेश लिया जा सकता है।


✅ 7. उच्च न्यायालय से क्या राहत मिल सकती है?


उच्च न्यायालय FIR दर्ज कराने का आदेश, जांच की निगरानी और मुआवजे का निर्देश दे सकता है।


✅ 8. FIR दर्ज न करने पर पुलिस अधिकारी को क्या सजा हो सकती है?


पुलिस अधिकारी को 6 महीने से 2 वर्ष तक की कैद और जुर्माना हो सकता है।


✅ 9. पुलिस की ड्यूटी में बाधा डालने पर क्या दंड है?


जो व्यक्ति पुलिस को ड्यूटी से रोकने के लिए चोट पहुँचाता है, उसे 5 से 10 वर्ष तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।


✅ 10. FIR की कॉपी लेने का क्या लाभ है?


FIR की कॉपी भविष्य में सबूत के रूप में काम आती है और शिकायत की पुष्टि करती है।


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Saturday, February 7, 2026

RTI का उल्लंघन : न्यायिक और अर्ध न्यायिक निर्णयों के आलोक में सूचना के अधिकार के विधिक पहलू, अब IPC नहीं, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की मदद ले

 
RTI का उल्लंघन : न्यायिक और अर्ध न्यायिक निर्णयों के आलोक में सूचना के अधिकार के विधिक पहलू, अब IPC नहीं, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की मदद ले

सभी जिले एवं तहसीलों में ब्यूरो संवाददाताओं की आवश्यकता है हमसे  (https://timesofcrime.com/ ) जुड़ने के लिए संपर्क करें : 9893221036 

 RTI का उल्लंघन :

जब सूचना रोकी जाती है, तो कानून आवेदक के साथ खड़ा होता है। सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के आवेदक-पक्षीय न्यायिक निर्देशों के आलोक में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 किसी अधिकारी की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि नागरिक को सशक्त बनाने के लिए लागू किया गया कानून है।
इसके बावजूद आज भी लोक सूचना अधिकारी सूचना को रोकना, टालना या भ्रामक उत्तर देना अपना विशेषाधिकार समझ बैठे हैं।
परंतु न्यायपालिका का रुख इस विषय में लगातार और स्पष्ट रहा है—
जहाँ सूचना रोकी जाती है, वहाँ कानून आवेदक के साथ खड़ा होता है।

Supreme Court -

नागरिक का जानने का अधिकार सर्वोपरि है।
सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह दोहराया है कि RTI किसी विभागीय कृपा का विषय नहीं है।
🔹
State of U.P. v. Raj Narain (1975) मामले में
SC ने ऐतिहासिक रूप से कहा —
“लोकतंत्र में जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकार क्या कर रही है।”
यह निर्णय आज भी RTI कानून की रीढ़ माना जाता है और पूर्णतः नागरिक-पक्षीय है।
🔹
S.P. Gupta v. Union of India (1981) केस में
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि खुली शासन व्यवस्था (open government) लोकतंत्र का मूल तत्व है और
गोपनीयता अपवाद है,
नियम नहीं।
🔹
Manohar Lal Sharma v. Union of India मामले में RTI से जुड़े अवलोकन कर
SC ने कहा कि सूचना से इनकार तभी संभव है,
जब वह कानूनन अपवाद में स्पष्ट रूप से आती हो।
अन्यथा सूचना देना बाध्यकारी है।
➡️

सुप्रीम कोर्ट का सिद्धांत :

RTI में देरी या अस्वीकार।
✔
बिना उचित आधार के सूचना न देना नागरिक के मौलिक अधिकार का उल्लंघन : केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) का आवेदक को केंद्र में रख कर दिया गया निर्णय।
CIC के अधिकांश निर्णायक आदेश यह स्थापित करते हैं कि —
🔹
Bhagat Singh v. CIC & Ors. (CIC में उद्धृत, बाद में HC द्वारा अनुमोदित सिद्धांत)
“सूचना रोकने का तर्कसंगत आधार बताने का भार लोक सूचना अधिकारी/ लोक प्राधिकार पर है,
न कि सूचना माँगने वाले नागरिक पर।”
🔹
CIC के निरंतर निर्णय (2023–2025) -
“रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं” कहना तब तक स्वीकार्य नहीं,
जब तक रिकॉर्ड के नष्ट होने/अस्तित्वहीन होने का विधिवत प्रमाण न हो।
अधूरी या भ्रामक सूचना देना, सूचना न देने के समान है
🔹
CIC का स्थापित सिद्धांत
यदि मामला प्रथम व द्वितीय अपील तक पहुँचा—
• यह स्वयं में PIO की विफलता का प्रमाण है
और दंडात्मक कार्रवाई का आधार बनता है।
• CIC का झुकाव स्पष्ट रूप से आवेदक-पक्षीय है,
न कि प्रशासन-संरक्षक।
• High Court : RTI नागरिक का औज़ार है, अधिकारी की ढाल नहीं।
उच्च न्यायालयों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि RTI अधिनियम को कमजोर करने की कोई भी कोशिश अस्वीकार्य है।
🔹
Delhi High Court – J.P. Agrawal v. Union of India (2011) मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा —
देने योग्य उपलब्ध सूचना देने के लिए PIO व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी है।
यह तर्क स्वीकार्य नहीं कि “विभाग ने सूचना नहीं दी।”
यह निर्णय स्पष्ट रूप से RTI आवेदक के अधिकारों की रक्षा करता है।
🔹
Bombay High Court : मुंबई हाईकोर्ट ने माना कि
RTI अधिनियम का पालन न करना गंभीर कदाचरण
(serious misconduct) है
और नागरिक को न्याय पाने का अधिकार है।
🔹
Rajasthan High Court के निर्णयों का स्थापित रुझान -
यदि प्रथम अपीलीय अधिकारी लोक सूचना अधिकारी की गलती को ढंकने का प्रयास करता है,
तो वह भी समान रूप से दोषी माना जाएगा।

अब IPC नहीं, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की मदद ले :

आवेदक के अधिकार को आपराधिक कानून कानून के अंतर्गत संरक्षण ;
RTI उल्लंघन अब केवल जुर्माने का विषय नहीं रहा।

BNS लागू होने के बाद आवेदक का कानूनी संरक्षण और मजबूत हुआ है।
IPC 166 → BNS धारा 198 लागू होती है
लोक सेवक/लोक सूचना अधिकारी द्वारा जानबूझ कर कर्तव्य उल्लंघन कर
आवेदक को मानसिक/आर्थिक क्षति पहुँचाने पर।

IPC 166A → BNS धारा 199 लागू होती है
कानूनन आवश्यक कार्य (RTI सूचना देना) को नहीं करने पर।

IPC 175 → BNS धारा 221 लागू होगी
सूचना/दस्तावेज जानबूझ कर न देने पर।

IPC 188 → BNS धारा 223 लागू होती है प्रथम अपीलीय अधिकारी या केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग
(FAA / CIC / SIC) के आदेशों की अवहेलना करने पर।

निष्कर्ष : अब तराजू एक तरफ़ा नहीं

सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट और केंद्रीय सूचना आयोग (CIC, High Court, Supreme Court) — तीनों का संयुक्त संदेश स्पष्ट है :

  1. RTI आवेदक याचक नहीं, अधिकार-धारक है।
  2. सूचना रोकना अब प्रशासनिक गलती नहीं,
  3. बल्कि संवैधानिक और आपराधिक उल्लंघन है।
* Legal Ambit का स्पष्ट मत है कि अब अपीलों में उलझाने की संस्कृति समाप्त होनी चाहिए और
जहाँ आवश्यक हो, आवेदकों को सीधी विधिक कार्यवाही करना चाहिए।
#Legal Ambit एप आरटीआई उपयोग कर्ताओं की निशुल्क कानूनी मार्गदर्शन/ सहायता करता है। आरटीआई के क्षेत्र में सक्रिय वकीलों के समूह द्वारा संचालित है यह एप। आरटीआई संबंधी मामलों में विधिक कार्यवाही के लिए आप इस ऐप से सलाह ले सकते हैं।

- भाई विनोद कुमार की पोस्ट

Friday, February 6, 2026

EpsteinFiles:- क्या दुनिया के सबसे क्रूर यौन अपराधी को डिजिटल इंडिया की आड़ में भारत में वीआईपी एक्सेस मिल रहा था ? इस मामले में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की क्या भूमिका थी ?


#EpsteinFiles :- 
EpsteinFiles:- क्या दुनिया के सबसे क्रूर यौन अपराधी को डिजिटल इंडिया की आड़ में भारत में वीआईपी एक्सेस मिल रहा था ? इस मामले में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की क्या भूमिका थी ?


सभी जिले एवं तहसीलों में ब्यूरो संवाददाताओं की आवश्यकता है हमसे  (https://timesofcrime.com/ ) जुड़ने के लिए संपर्क करें : 9893221036

 केंद्रीय मंत्री #HardeepSinghPuri  हरदीप सिंह पुरी की इसमें क्या भूमिका थी?

#EpsteinFiles :- क्या #Digital_India की आड़ में दुनिया के क्रूरतम सेक्स अपराधी को मिल रही थी भारत में वीआईपी एक्सेस? 


हाल ही में सामने आए #EpsteinFiles के दस्तावेज बताते हैं कि किस तरह एक सजायाफ्ता अंतरराष्ट्रीय अपराधी को भारतीय कूटनीतिक तंत्र तक का रास्ता दिया गया.

24 अक्टूबर 2014 को #Jeffry_Epstein –जिसे 2008 में ही नाबालिगों की सेक्स ट्रैफिकिंग का दोषी ठहराया जा चुका था—उसने तत्कालीन भाजपा सदस्य और पूर्व राजनयिक हरदीप पुरी को ईमेल किया– "मेरी असिस्टेंट को भारत के लिए तुरंत वीजा चाहिए"

#EpsteinFiles :- क्या #Digital_India की आड़ में दुनिया के क्रूरतम सेक्स अपराधी को मिल रही थी भारत में वीआईपी एक्सेस? 



एक रिटायर हो चुके अधिकारी और तत्कालीन भाजपा नेता ने अपनी पूरी राजनीतिक और कूटनीतिक ताकत झोंक दी. #हरदीप_सिंह_पूरी ने रिटायर्ड राजदूत प्रमोद कुमार बजाज और न्यूयॉर्क के संपर्कों को ईमेल कर निर्देश दिए कि एपस्टीन का काम "प्रायोरिटी" पर हो.

#EpsteinFiles :- क्या #Digital_India की आड़ में दुनिया के क्रूरतम सेक्स अपराधी को मिल रही थी भारत में वीआईपी एक्सेस? 



2013 में हरदीप पुरी IFS से रिटायर होते हैं,जनवरी 2014 में वह #BJP में शामिल होते हैं और अक्टूबर 2014 में एक सजायाफ्ता अपराधी के लिए 'वीजा सर्विस' का जरिया बनते हैं.

2008 में ही एपस्टीन के 'पीडोफाइल' और 'यौन तस्कर' होने की खबर पूरी दुनिया को थी. क्या हरदीप पुरी जैसे अनुभवी पूर्व राजनयिक और भाजपा नेता के तौर पर वे नहीं जानते थे कि एपस्टीन कौन है?

#EpsteinFiles :- क्या #Digital_India की आड़ में दुनिया के क्रूरतम सेक्स अपराधी को मिल रही थी भारत में वीआईपी एक्सेस? 



राजनीति में कुछ भी मुफ्त नहीं होता. हरदीप पुरी ने एपस्टीन के लिए अपनी सारी हदें पार कीं, तो सवाल उठता है कि इसके बदले में उन्हें क्या हासिल हुआ? एपस्टीन का ऐसा कौन सा 'एहसान' था जिसे चुकाने की उन्हें इतनी बेताबी थी?

हरदीप सिंह पुरी ने बाद में सफाई दी थी कि Epstein से उनकी बातचीत 'डिजिटल इंडिया' को लेकर थी.

सवाल यह है कि एक यौन अपराधी भारत के इतने महत्वपूर्ण मिशन में किस हैसियत से सलाह दे रहा था? क्या डिजिटल इंडिया को एक अपराधी के इनपुट की जरूरत थी?

13 नवंबर 2014 को भेजे गए ईमेल में हरदीप सिंह पुरी ने #जेफरी_एपस्टीन और #Reed_Hoffman को भारत में इंटरनेट आधारित आर्थिक गतिविधियों, 'डिजिटल इंडिया' और सॉफ्टबैंक जैसे बड़े निवेशों के बारे में विस्तार से बताया था.

3 अक्टूबर 2014 को उनकी रीड हॉफमैन के साथ सिलिकॉन वैली में बातचीत हुई थी, जिसके बारे में उन्होंने एपस्टीन को जानकारी दी थी. 

एक केंद्रीय मंत्री का नाम अंतरराष्ट्रीय सेक्स स्कैंडल से जुड़े व्यक्ति के साथ जुड़ना केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि का मामला है या नहीं.फिर भी मोदी सरकार ने इस पर मुंह में दही जमा रखा है? भारत के मान,सम्मान,स्वाभिमान की प्रधानमंत्री को कोई परवाह ही नहीं?

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