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| एपस्टीन फाइल : अमेरिकी यौन अपराधी और मानव तस्कर जेफ़री एपस्टीन से जुड़ी फ़ाइल्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी नाम आया |
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जेफरी एपस्टीन फाइल्स का हालिया खुलासा, जो अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा 30 जनवरी 2026 को जारी किया गया, वैश्विक स्तर पर हलचल मचा रहा है। इनमें 30 लाख से अधिक पेज, हजारों वीडियो और लाखों इमेज शामिल हैं, जो एपस्टीन की 2019 में मौत के बाद जांच से जुड़े हैं। भारत में विवाद इसलिए बढ़ा क्योंकि एक ईमेल (डॉक्यूमेंट ID: EFTA02645381.pdf, DOJ वेबसाइट पर उपलब्ध) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जिक्र है।
यह ईमेल 9 जुलाई 2017 का है, जिसमें एपस्टीन ने "Jabor Y" को लिखा: "The Indian Prime Minister Modi took advice and danced and sang in Israel for the benefit of the US president. They had met a few weeks ago. IT WORKED!" यह मोदी की 4-6 जुलाई 2017 की इजराइल यात्रा से ठीक तीन दिन बाद का है, जब उन्होंने ट्रंप से 25-26 जून 2017 में अमेरिका में मुलाकात की थी। विपक्षी दल कांग्रेस ने इसे "राष्ट्रीय शर्म" करार दिया, और सवाल उठाया कि क्या मोदी ने वाकई एक दोषी यौन अपराधी से सलाह ली? मोदी की चुप्पी इस मामले को और संदिग्ध बनाती है, क्योंकि कोई स्पष्ट खंडन या जांच की मांग नहीं की गई, जो उनकी पारदर्शिता पर सवाल उठाती है।
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 'एपस्टीन फ़ाइल्स' के एक ईमेल मैसेज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जेफ़री एपस्टीन की मुलाक़ात के दावों को ख़ारिज किया है.
एपस्टीन की यह ईमेल मोदी को उसके नेटवर्क से जोड़ती प्रतीत होती है, भले ही कोई फ्लाइट लॉग, फोटो या प्रत्यक्ष संचार का सबूत न हो। ईमेल में "सलाह" का जिक्र मोदी की इजराइल यात्रा से जुड़ा है, जो भारत-इजराइल संबंधों को मजबूत करने वाली थी, लेकिन एपस्टीन के दावे से यह संदिग्ध लगती है। मोदी ने वहां सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया, लेकिन क्या यह ट्रंप के फायदे के लिए था? एपस्टीन की "IT WORKED!" वाली टिप्पणी सौदेबाजी का संकेत देती है, जो मोदी की कूटनीति को संदेहास्पद बनाती है। अमेरिकी मीडिया में यह उल्लेख असत्यापित है, लेकिन एपस्टीन की अतिरंजित बातों के बावजूद, मोदी का नाम आने से भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर असर पड़ता है। 2019 का एक और संदर्भ है जहां एपस्टीन ने स्टीव बैनन को मोदी से मिलवाने की पेशकश की (24 मई 2019, मोदी के चुनाव जीतने के बाद), और "Modi on board" लिखा, यह मोदी की ट्रंप-बैनन जैसे संदिग्ध लोगों से निकटता पर सवाल उठाता है, जो एलीट इंप्युनिटी की मिसाल है।

भारत सरकार की प्रतिक्रिया कमजोर और बचाव वाली रही। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने 31 जनवरी 2026 को इसे "एक दोषी अपराधी की घटिया कल्पनाएं" कहा, लेकिन कोई गहन जांच या पारदर्शी स्पष्टीकरण नहीं दिया। MEA ने सिर्फ इजराइल यात्रा को तथ्य माना और बाकी को खारिज किया, लेकिन "सलाह" और "IT WORKED!" जैसे शब्दों पर चुप्पी सवालों को बढ़ाती है। एपस्टीन फाइल्स में ट्रंप, क्लिंटन, मस्क जैसे नामों के ठोस संपर्क हैं, जबकि मोदी का उल्लेख "ट्रैशी" कहकर टालना मोदी की छवि प्रबंधन की रणनीति लगती है। कांग्रेस के पोस्ट और मीडिया रिपोर्ट्स में उठाए गए सवालों का कोई जवाब नहीं आया, जो मोदी की जवाबदेही की कमी दर्शाता है। यह रुख देश की गरिमा को जोखिम में डालता है, क्योंकि वैश्विक स्तर पर ऐसे उल्लेखों से भारत की कूटनीतिक विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

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कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने एक्स पर कई पोस्ट में इसे "राष्ट्रीय शर्म" बताया और तीन सवाल उठाए: सलाह क्या थी? इजराइल में नाच-गाने से ट्रंप को क्या फायदा? "IT WORKED!" का मतलब क्या? कांग्रेस की आधिकारिक पोस्ट में समयरेखा जोड़कर "कनेक्ट द डॉट्स" किया गया, जून 2017 में ट्रंप से मिलना, जुलाई में इजराइल जाना, और एपस्टीन का ईमेल। पृथ्वीराज चव्हाण ने भी सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। यह राजनीतिक हमला नहीं, बल्कि वैध सवाल हैं, क्योंकि मोदी की चुप्पी और MEA का बचाव इसे छिपाने की कोशिश लगता है। एपस्टीन फाइल्स में अन्य भारतीय नाम जैसे हरदीप सिंह पुरी (2014 में एपस्टीन से मुलाकात) और अनिल अंबानी (2017 में ईमेल) हैं, जो मोदी सरकार के करीबियों से जुड़े हैं। AI चैटबॉट्स के गलत जवाबों से अफवाहें फैलीं, लेकिन मोदी की पारदर्शिता की कमी असली समस्या है।

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एपस्टीन फाइल्स का असली महत्व एलीट वर्ग की जवाबदेही में है, जहां बाल यौन शोषण और मानव तस्करी के नेटवर्क में बड़े नाम फंसे हैं। भारत में फोकस मोदी पर होना जरूरी है, क्योंकि उनका नाम आने से राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता है, लेकिन मोदी की सरकार ने इसे हल्के में लिया। फाइल्स में 3 मिलियन+ पेज हैं, और मोदी का उल्लेख, भले नगण्य, देश की छवि को नुकसान पहुंचाता है। मीडिया रिपोर्ट्स में AI से फैली अफवाहें हैं, लेकिन मोदी की अंतरराष्ट्रीय दोस्तियां (ट्रंप, बैनन) संदेहास्पद हैं। कांग्रेस अगर चिंतित है, तो जांच की मांग करे, लेकिन मोदी की चुप्पी से लगता है कि कुछ छिपाया जा रहा है। यह घटना दिखाती है कि कैसे वैश्विक स्कैंडल मोदी की कूटनीति पर सवाल उठाते हैं, बिना संदर्भ या फैक्ट-चेक के।

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यह पूरा विवाद मोदी की राजनीतिक कमजोरी का उदाहरण है। कांग्रेस के आरोप ठोस हैं, एपस्टीन की ईमेल में "सलाह" या "मीटिंग" का दावा उनकी कल्पना हो सकती है, लेकिन मोदी का नाम आने से जांच जरूरी है। मोदी के आलोचक इसे सही से उठा रहे हैं, क्योंकि बिना सबूत के भी चुप्पी उल्टे सवाल पैदा करती है। एपस्टीन जैसे अपराधियों की फाइल्स से सच्चाई निकालनी चाहिए, लेकिन मोदी सरकार का रवैया बचाव वाला है, जो एलीट इंप्युनिटी को बढ़ावा देता है। अगर मोदी निर्दोष हैं, तो क्यों नहीं पारदर्शी जांच? यह मोदी की छवि पर धब्बा है, जो राष्ट्रीय गरिमा को प्रभावित करता है।

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अंत में, यह "स्कैंडल" मोदी की कूटनीतिक मर्यादा पर सवाल है, एक दोषी व्यक्ति की ईमेल से जुड़ना भी शर्मनाक है। सच्ची पत्रकारिता और जांच की जरूरत है, लेकिन मोदी की चुप्पी आउटरेज को बढ़ाती है। अगर मोदी वाकई फंसे होते, तो ज्यादा सबूत होते, लेकिन मौजूदा उल्लेख भी काफी है सवाल उठाने के लिए। यह घटना डिजिटल युग में अफवाहों की तेजी दिखाती है, लेकिन मोदी की जवाबदेही की कमी सत्य की कीमत कम करती है, देश को ऐसे मुद्दों पर स्पष्टता चाहिए, न कि राजनीतिक चुप्पी।
by : Rajesh R. Singh

