Tuesday, February 10, 2026

राजपाल यादव की कर्ज चुकाने में मदद करेंगे सोनू सूद, तिहाड़ में बंद एक्‍टर के लिए कहा- दान नहीं, सम्मान

 


राजपाल यादव की कर्ज चुकाने में मदद करेंगे सोनू सूद, तिहाड़ में बंद एक्‍टर के लिए कहा- दान नहीं, सम्मान

चेक बाउंस मामले में फंसे बॉलीवुड एक्टर राजपाल यादव ने तिहाड़ जेल में सरेंडर करने से पहले भावुक होते हुए कहा- क्या करूं? मेरे पास पैसे नहीं हैं। कोई और रास्ता नहीं दिख रहा, यहां सब अकेले हैं, कोई दोस्त नहीं होता। अब सोनू सूद ने उनके लिए मदद का हाथ बढ़ाया है।

Sonu Sood spoke about Rajpal Yadav
तिहाड़ जेल में सरेंडर करने वाले राजपाल यादव के लिए बोले सोनू सूद
एक पुराने चेक बाउंस मामले में फंसे बॉलीवुड एक्टर राजपाल यादव को हाल ही में दिल्ली के तिहाड़ जेल में सरेंडर करना पड़ा। सरेंडर से पहले वो काफी इमोशनल हुए और साफ कहा कि उनके पास पैसे नहीं हैं। बॉलीवुड में रियल हीरो के तौर पर जाने जानेवाले सोनू सूद एक बार फिर सामने हैं और इस मामले में राजपाल यादव की मदद के लिए उन्होंने आवाज उठाई है।

साल 2010 के चेक बाउंस मामले में 5 करोड़ रुपये का कर्ज चुका पाने में असमर्थ एक्टर राजपाल ने आखिरकार सरेंडर कर दिया। सरेंडर करने से ठीक पहले वो काफी भावुक हो गए और अधिकारियों से कहा, 'सर, क्या करूं? मेरे पास पैसे नहीं हैं। कोई और रास्ता नहीं दिख रहा, यहां सब अकेले हैं, कोई दोस्त नहीं होता। इस मुश्किल से मुझे खुद ही गुजरना होगा।'


राजपाल यादव की मदद के लिए सोनू सूद ने उठाई आवाज

उन्होंने एक्टर की मदद के लिए एक दमदार आवाज उठाते हुए कहा है, 'एक छोटी सी अमाउंट राशि, जिसे भविष्य के काम के बदले दिया जा सकता है, ये दान नहीं, बल्कि सम्मान है। जब हमारी ही इंडस्ट्री का कोई सदस्य कठिन दौर से गुजर रहा हो तो हमें उन्हें ये यह याद दिलाना चाहिए कि वह अकेला नहीं है। इसी तरह हम यह साबित करते हैं कि हम सिर्फ एक इंडस्ट्री से कहीं बढ़कर हैं।'

ये दान नहीं, बल्कि सम्मान है। जब हमारी ही इंडस्ट्री का कोई सदस्य कठिन दौर से गुजर रहा हो तो हमें उन्हें ये यह याद दिलाना चाहिए कि वह अकेला नहीं है।
सोनू सूद

लोगों ने सोनू सूद के इस कदम पर जताया आभार

सोशल मीडिया पर उनके इस ट्वीट पर लोगों ने भी रिएक्ट किया है। एक ने कहा, 'यही सच्ची मानवता है। गलती तो हर कोई कर सकता है, लेकिन उस गलती की वजह से किसी का जीवन और करियर बर्बाद करना गलत है! आपने सही फैसला लिया है और मैं भगवान गणेश से प्रार्थना करता हूं कि आपकी ये कोशिश सफल हों।' एक और ने कहा- सोनू के इस बड़े कदम के लिए उन्हें सलाम, राजपाल यादव इस उद्योग जगत से मिलने वाले प्यार और समर्थन के हकदार हैं।

क्या है राजपाल यादव से जुड़ा ये पूरा मामला

एक्टर से जुड़ा ये मामला 16 साल पुराना है। ये साल 2010 की बात है जब राजपाल यादव ने बतौर डायरेक्टर फिल्म 'अता पता लापता' बनाई थी। इसे बनाने के लिए उन्होंने मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (M/s Murali Projects) नाम की कंपनी से 5 करोड़ रुपये उधार लिए थे। हालांकि फिल्म बन गई और रिलीज भी हुई लेकिन पूरी तरह से पिट गई। इस वजह से राजपाल यादव को तगड़ा आर्थिक चोट पहुंचा और जिस कंपनी से 5 करोड़ रुपये का कर्ज लिए वो भी डूब गया। एक्टर वो रकम आज तक लौटा नहीं पाए और इसके बाद कंपनी ने फिर राजपाल यादव के खिलाफ केस कर दिया । एक्टर पर आरोप लगाया गया कि राजपाल ने जो भी चेक दिए, वो बाउंस हो गए।

इससे पहले भी राजपाल यादव जा चुके हैं जेल

इसी मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने राजपाल यादव को कई बार नोटिस भेजे, लेकिन वे लंबे समय तक कोर्ट में पेश नहीं हुए, जिसके बाद साल 2013 में उन्हें 10 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। वे 3 से 6 दिसंबर 2013 तक चार दिनों तक जेल में रहे। बाद में दिल्ली हाई कोर्ट की खंडपीठ ने उनकी अपील पर सजा निलंबित कर दी थी। इसके बाद निचली अदालत ने राजपाल यादव और उनकी पत्नी को छह महीने की साधारण कैद की सजा सुनाई थी, जिसे उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी। जून 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट ने यह कहते हुए सजा पर अस्थायी रोक लगा दी कि एक्टर कोई आदतन अपराधी नहीं हैं। इसी आधार पर कोर्ट ने दोनों पक्षों को आपसी समझौते की संभावनाएं तलाशने की सलाह दी थी।

राजपाल यादव ने कोर्ट को ये भरोसा दिलाया था

दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता को लेकर राजपाल यादव ने कोर्ट को ये भरोसा दिलाया था कि वे शिकायतकर्ता कंपनी को कुल 2.5 करोड़ रुपए का भुगतान करेंगे। इसमें 40 लाख रुपए की पहली किश्त थी और 2.10 करोड़ रुपए की दूसरी किश्त शामिल थी। हालांकि, वो ऐसा कर नहीं पाए।

जनवरी में कोर्ट ने दिया था राजपाल को अंतिम मौका

इसी साल जनवरी 2026 में कोर्ट ने राजपाल यादव को अंतिम मौका दिया था। एक्टर के वकील ने कोर्ट को बताया था कि एक्टर ने 50 लाख रुपये का इंतजाम कर लिया है और भुगतान करने के लिए एक हफ्ते का और समय मांगा था। हालांकि, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने सरेंडर करने के लिए समय बढ़ाने की राजपाल यादव की अर्जी खारिज कर दी। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि चेक बाउंस मामलों में बार-बार किए गए वादों का उल्लंघन बेहद गंभीर है। कोर्ट ने कहा कि एक्टर को कई अवसर दिए गए, लेकिन हर बार उन्होंने अदालत के भरोसे को तोड़ा है। इसके बाद उन्हें 4 फरवरी को शाम 4 बजे तक आत्मसमर्पण करने की मोहलत दी गई थी।

Monday, February 9, 2026

बैतूल SP की बड़ी कार्यवाही SI निलंबित, चार केस डायरी गायब, न्यायालय में पेश नहीं हुए चालान, सात दिन में जांच के निर्देश

 


बैतूल SP की बड़ी कार्यवाही SI निलंबित, चार केस डायरी गायब, न्यायालय में पेश नहीं हुए चालान, सात दिन में जांच के निर्देश

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पुलिस अधीक्षक की सख्त कार्रवाई, चार चालान गायब एसआई सस्पेंड

बैतूल. मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करने वाले एक गंभीर मामले में पुलिस अधीक्षक वीरेंद्र जैन ने सख्त कार्रवाई करते हुए उप निरीक्षक पवन कुमार को निलंबित कर दिया है। 

आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान कोतवाली थाना क्षेत्र से जुड़े चार आपराधिक मामलों की केस डायरी (चालान) न्यायालय में पेश नहीं की गईं ओर वे अब तक लापता है। जानकारी के अनुसार जिन मामलों के चालान गायब हुए हैं, उनमें जबरन वसूली, शासकीय कार्य में बाधा, मारपीट और धमकी जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं। 

समय पर चालान प्रस्तुत नहीं होने से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई, जिसे पुलिस प्रशासन ने गंभीर लापरवाही और अनुशासनहीनता की श्रेणी में माना है। पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी आदेश में बताया गया है कि पवन कुमार वर्तमान में थाना गंज, बैतूल में पदस्थ थे। निलंबन के बाद उन्हें तत्काल प्रभाव से रक्षित केंद्र बेतूल से संबद्ध कर दिया गया है। निलंबन अवधि के दौरान उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता मिलेगा। 

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक ने अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुनील लाटा को सात दिवस के भीतर प्रारंभिक जांच पूर्ण कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए है। जांच में यह भी स्पष्ट किया जाएगा कि चालान किन परिस्थितियों में गायब हुए और इसमें किसी अन्य अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका रही या नहीं। 

पुलिस प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि इस प्रकार की लापरवाही से न केवल न्यायिक प्रक्रिया बाधित होती है, बल्कि आम जनता का विश्वास भी प्रभावित होता है। भविष्य में इस तरह की चूक किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह कार्रवाई पुलिस विभाग में जवाबदेही और पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

यदि पुलिस अधिकारी FIR दर्ज करने से मना "करें तो क्या करें" अपनाएं ये कानूनी कदम...

 


यदि पुलिस अधिकारी FIR दर्ज करने से मना "करें तो क्या करें" अपनाएं ये कानूनी कदम...

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यदि पुलिस अधिकारी FIR दर्ज करने से मना करे (BNSS 2023 के तहत विस्तृत विश्लेषण)

भारत में अपराधों की रिपोर्टिंग और न्याय पाने का पहला कदम एफआईआर (FIR – First Information Report) दर्ज करना है। किसी भी नागरिक के लिए यह महत्वपूर्ण अधिकार है, विशेषकर जब मामला संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) का हो। संज्ञेय अपराध ऐसे अपराध होते हैं जिनमें पुलिस बिना कोर्ट की अनुमति के सीधे जांच शुरू कर सकती है। हालाँकि, कई बार पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करने से मना कर देते हैं। ऐसे में नए भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNSS 2023) ने स्पष्ट प्रक्रियाएँ और अधिकार दिए हैं ताकि नागरिक को न्याय मिल सके और पुलिस जवाबदेह रहे। नीचे इसका विस्तृत विवरण दिया गया है।


✅ 1. FIR दर्ज करने का कर्तव्य (Duty to Register FIR – Sec 173(1) BNSS)

BNSS 2023 के अनुसार, यदि कोई संज्ञेय अपराध घटित होता है तो पुलिस अधिकारी पर FIR दर्ज करना अनिवार्य है। यह पुलिस का प्राथमिक दायित्व है। यदि कोई नागरिक अपराध की जानकारी देता है, तो पुलिस जांच प्रारंभ करने के लिए FIR दर्ज करने से मना नहीं कर सकती।

महत्त्वपूर्ण बिंदु:

प्रारंभिक जांच (Preliminary Enquiry) केवल तब की जा सकती है जब अपराध की सज़ा 3 से 7 वर्ष के बीच हो और उसके लिए DSP (Deputy Superintendent of Police) की अनुमति आवश्यक हो।

सामान्य संज्ञेय अपराधों में किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है, और सीधे FIR दर्ज की जानी चाहिए।

FIR दर्ज करने से इनकार करना कानून का उल्लंघन है।

✅ 2. शून्य FIR (Zero FIR – Sec 173(2) BNSS)

कई बार पीड़ित को यह स्पष्ट नहीं होता कि अपराध किस थाने के क्षेत्र में हुआ है। ऐसी स्थिति में BNSS 2023 ने ‘Zero FIR’ का प्रावधान किया है। इसका अर्थ है कि पीड़ित किसी भी पुलिस स्टेशन में जाकर अपराध की रिपोर्ट दर्ज कर सकता है।

Zero FIR की विशेषताएँ:

थाना क्षेत्र की परवाह किए बिना FIR दर्ज की जाएगी।

बाद में इसे संबंधित क्षेत्र के थाना में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।

शिकायतकर्ता को FIR की मुफ्त प्रति उपलब्ध कराई जाएगी।


यह प्रावधान विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों, वंचित वर्गों, और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वालों के लिए अत्यंत उपयोगी है।


✅ 3. एसपी के पास शिकायत (Escalation to Superintendent of Police – Sec 173(4) BNSS)

यदि थाना प्रभारी (SHO) FIR दर्ज करने से मना करता है, तो नागरिक लिखित शिकायत एसपी (Superintendent of Police) को कर सकता है। एसपी को कानूनन अधिकार है कि:

FIR दर्ज करने का आदेश दे।

मामले की जांच का आदेश दे।

थाना प्रभारी की लापरवाही पर कार्यवाही करे।


यह प्रक्रिया नागरिक को न्याय पाने की अगली वैधानिक राह देती है।


✅ 4. मजिस्ट्रेट से राहत (Magistrate Intervention – Sec 175 BNSS जैसे प्रावधान)

यदि एसपी भी कार्यवाही नहीं करता है, तो नागरिक मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर सकता है। मजिस्ट्रेट शिकायत पर संज्ञान लेकर पुलिस को FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने का आदेश दे सकता है। यद्यपि BNSS 2023 में स्पष्ट रूप से धारा 175 का उल्लेख नहीं मिलता, यह अधिकार पुराने CrPC की धारा 156(3) के समान है।


यह उपाय न्याय प्रणाली का तीसरा स्तर है, जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।


✅ 5. उच्च न्यायालय में रिट याचिका (High Court Remedy – Article 226 of the Constitution)

यदि थाना और एसपी दोनों FIR दर्ज करने से मना करें, और मजिस्ट्रेट भी राहत न दे, तो नागरिक सीधे उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर सकता है।


संभावित राहतें:

FIR दर्ज करने का निर्देश।

जांच की निगरानी का आदेश।

पीड़ित को मुआवजा प्रदान करने का निर्देश।

पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई का आदेश।


उच्च न्यायालय नागरिकों के अधिकारों की अंतिम सुरक्षा प्रदान करता है।


✅ 6. FIR दर्ज न करने पर पुलिस अधिकारी पर दंड (Penalties for Police Refusal – Sec 199(c) BNSS)

BNSS 2023 में पुलिस अधिकारियों के लिए दंड का प्रावधान भी किया गया है। यदि कोई पुलिस अधिकारी जानबूझकर FIR दर्ज करने से इनकार करता है, तो:


उसे 6 महीने से 2 वर्ष तक की कैद की सजा हो सकती है।

साथ में आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है।


यह प्रावधान पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित करता है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।


✅ 7. पुलिस अधिकारी के विरुद्ध अपराध (Offences Against Police – Sec 121 BNSS)


पुलिस के कार्य में बाधा डालने या उन्हें घायल करने वाले अपराधों के लिए भी BNSS ने कठोर दंड का प्रावधान किया है। यदि कोई व्यक्ति पुलिस को उनकी ड्यूटी निभाने से रोकने के लिए चोट पहुँचाता है, तो:


उसे 5 से 10 वर्ष तक की सजा हो सकती है।

साथ में जुर्माना भी लगाया जाएगा।


यह प्रावधान पुलिस के सम्मान और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।


🔑 व्यावहारिक पहलू और सुझाव

FIR दर्ज न होने पर:

तुरंत उच्च अधिकारी से संपर्क करें, लिखित शिकायत दें, और शिकायत की रसीद या कॉपी लें।

Zero FIR का प्रयोग करें:

क्षेत्रीय अस्पष्टता की स्थिति में किसी भी थाना में जाकर शिकायत करें।

डिजिटल प्लेटफॉर्म:

कई राज्यों में ऑनलाइन FIR सुविधा भी उपलब्ध है। इसका उपयोग करें।

कानूनी सहायता लें:

वकील या विधिक सेवा प्राधिकरण से मदद लेकर उच्च न्यायालय या मजिस्ट्रेट से राहत लें।

FIR की कॉपी:

FIR की मुफ्त कॉपी अवश्य लें, जो भविष्य में सबूत के रूप में उपयोगी होगी।

✅ निष्कर्ष


BNSS 2023 ने नागरिकों को FIR दर्ज कराने का स्पष्ट और प्रभावी अधिकार दिया है। पुलिस का दायित्व है कि संज्ञेय अपराधों की रिपोर्ट तुरंत दर्ज करे। Zero FIR जैसे प्रावधान नागरिकों के लिए राहत का रास्ता खोलते हैं। SHO द्वारा मना करने पर एसपी, मजिस्ट्रेट और उच्च न्यायालय तक शिकायत का अधिकार है। साथ ही पुलिस अधिकारियों की लापरवाही पर दंड का प्रावधान न्याय प्रणाली को मजबूत बनाता है।


यह कानून न केवल अपराध की रिपोर्टिंग में मदद करता है बल्कि पुलिस की जवाबदेही, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और न्याय की उपलब्धता को सुनिश्चित करता है। नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए और कानून द्वारा प्रदत्त सभी राहत उपायों का उपयोग करना चाहिए।


✅ 1. FIR क्या है?


FIR (First Information Report) अपराध की प्राथमिक जानकारी है जिसे पुलिस संज्ञेय अपराध की स्थिति में दर्ज करती है।


✅ 2. पुलिस पर FIR दर्ज करने का क्या दायित्व है?


पुलिस को संज्ञेय अपराध की शिकायत मिलते ही FIR दर्ज करनी होती है, बिना किसी अनुमति के।


✅ 3. Preliminary Enquiry कब की जा सकती है?


Preliminary enquiry केवल तब की जा सकती है जब अपराध की सजा 3 से 7 वर्षों के बीच हो और DSP की अनुमति ली जाए।


✅ 4. Zero FIR क्या है?


Zero FIR वह प्रक्रिया है जिसमें पीड़ित किसी भी थाने में जाकर FIR दर्ज करा सकता है, भले ही अपराध का क्षेत्र अस्पष्ट हो।


✅ 5. SHO FIR दर्ज न करे तो क्या करें?


SHO के मना करने पर शिकायत लिखित रूप में एसपी (Superintendent of Police) को दी जा सकती है।


✅ 6. यदि एसपी भी कार्यवाही न करे तो क्या उपाय है?


मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर FIR दर्ज कराने का आदेश लिया जा सकता है।


✅ 7. उच्च न्यायालय से क्या राहत मिल सकती है?


उच्च न्यायालय FIR दर्ज कराने का आदेश, जांच की निगरानी और मुआवजे का निर्देश दे सकता है।


✅ 8. FIR दर्ज न करने पर पुलिस अधिकारी को क्या सजा हो सकती है?


पुलिस अधिकारी को 6 महीने से 2 वर्ष तक की कैद और जुर्माना हो सकता है।


✅ 9. पुलिस की ड्यूटी में बाधा डालने पर क्या दंड है?


जो व्यक्ति पुलिस को ड्यूटी से रोकने के लिए चोट पहुँचाता है, उसे 5 से 10 वर्ष तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।


✅ 10. FIR की कॉपी लेने का क्या लाभ है?


FIR की कॉपी भविष्य में सबूत के रूप में काम आती है और शिकायत की पुष्टि करती है।


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गरुड़ दल की कार्यवाही : बड़कुल रेस्टारेंट एवं बिट्टू दा ढाबा पर जुर्माना, अवैध रूप से संचालित बार किया सील


गरुड़ दल की कार्यवाही : बड़कुल रेस्टारेंट एवं बिट्टू दा ढाबा पर जुर्माना, अवैध रूप से संचालित बार किया सील

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जिला प्रशासन द्वारा गठित गरुड़ दल ने कल रविवार की रात दीनदयाल चौक बस स्टैंड स्थित बड़कुल रेस्टोरेंट, बिट्टू दा ढाबा एवं मदिरा बार का आकस्मिक निरीक्षण किया।अनुविभागीय अधिकारी राजस्व कुंडेश्वर धाम प्रगति गनवीर के नेतृत्व में किये गए निरीक्षण में तहसीलदार वीर बहादुर सिंह धुर्वे, खाद्य सुरक्षा अधिकारी विनोद धुर्वे, आबकारी निरीक्षक अंकित जैन एवं माढ़ोताल थाने का पुलिस बल शामिल था।

बड़कुल रेस्टोरेंट एवं बिट्टू के ढाबे में बिना ग्लब्स के किचन में खाना बनाने एवं साफ सफाई का अभाव होने के कारण 5-5 हजार का और कुल 10 हजार रुपये का अर्थदंड नगर निगम की टीम द्वारा वसूल किया गया तथा बड़कुल रेस्टोरेंट के किचन से पनीर, पापड़ आदि के सैंपलिंग लेकर परीक्षण के लिये भेजे गए।

बिट्टू दा ढाबे के ऊपर संचालित मदिरा बार एवं पब में बिना लाइसेंस एवं सक्षम अनुमति के संचालित बार को सील कर विदेशी एल्कोहल जब्त कर आबकारी विभाग के सुपर्द किया गया। सालाना टर्नओवर 40 लाख होने के बाद भीं मदिरा बार के पास एफएसएसएआई का लाइसेंस नहीं था।

Sunday, February 8, 2026

माध्यमिक शिक्षा मण्डल की हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी परीक्षाओं के लिये फ्लाइंग स्क्वाड गठित : कलेक्टर राघवेंद्र सिंह द्वारा आदेश जारी

माध्यमिक शिक्षा मण्डल की हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी परीक्षाओं के लिये फ्लाइंग स्क्वाड गठित : कलेक्टर राघवेंद्र सिंह द्वारा आदेश जारी
जबलपुर . माध्यमिक शिक्षा मंडल की हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी परीक्षाओं में अनुचित साधनों का उपयोग रोकने कलेक्टर राघवेंद्र सिंह ने अनुभाग स्तर, जिला स्तर तथा विकासखण्ड स्तर पर निरीक्षण दलों (फ्लाइंग स्क्वाड) का गठन किया है।.

अनुभाग स्तर पर गठित फ्लाइंग स्क्वाड की कमान संबंधित अनुभाग के एसडीएम को सौंपी गई है। वहीं, जिले में स्थित सभी परीक्षा केंद्रों के आकस्मिक निरीक्षण के लिये जिला शिक्षा अधिकारी के नेतृत्व में जिला स्तरीय निरीक्षण दल का गठन किया है। इसके अलावा विकासखण्ड शिक्षा अधिकारियों के नेतृत्व में विकासखण्ड स्तर पर निरीक्षण दल (फ्लाइंग स्क्वाड) भी गठित किये गये हैं।

माध्यमिक शिक्षा मण्डल की हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी परीक्षाओं के लिये  फ्लाइंग स्क्वाड गठित : कलेक्टर राघवेंद्र सिंह द्वारा आदेश जारी


अनुभाग स्तर पर एसडीएम के नेतृत्व में गठित फ्लाइंग स्क्वाड अपने अनुभाग में स्थित परीक्षा केंद्रों का आकस्मिक निरीक्षण करेगी। जबकि जिला शिक्षा अधिकारी के नेतृत्व में गठित फ्लाइंग स्क्वाड जिले के सभी परीक्षा केंद्रों का तथा विकासखण्ड स्तर पर गठित फ्लाइंग स्क्वाड अपने विकासखण्ड के परीक्षा केंद्रों का आकस्मिक निरीक्षण कर सकेगी।
प्रत्येक निरीक्षण दल (फ्लाइंग स्क्वाड) में तीन से चार अधिकारियों- कर्मचारियों को भी शामिल किया गया है। फ्लाइंग स्क्वाड के प्रभारियों को परीक्षा केंद्रों के निरीक्षण की रिपोर्ट प्रतिदिन जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय को सौपने के निर्देश कलेक्टर द्वारा दिये गये हैं।

Saturday, February 7, 2026

RTI का उल्लंघन : न्यायिक और अर्ध न्यायिक निर्णयों के आलोक में सूचना के अधिकार के विधिक पहलू, अब IPC नहीं, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की मदद ले

 
RTI का उल्लंघन : न्यायिक और अर्ध न्यायिक निर्णयों के आलोक में सूचना के अधिकार के विधिक पहलू, अब IPC नहीं, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की मदद ले

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 RTI का उल्लंघन :

जब सूचना रोकी जाती है, तो कानून आवेदक के साथ खड़ा होता है। सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के आवेदक-पक्षीय न्यायिक निर्देशों के आलोक में सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 किसी अधिकारी की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि नागरिक को सशक्त बनाने के लिए लागू किया गया कानून है।
इसके बावजूद आज भी लोक सूचना अधिकारी सूचना को रोकना, टालना या भ्रामक उत्तर देना अपना विशेषाधिकार समझ बैठे हैं।
परंतु न्यायपालिका का रुख इस विषय में लगातार और स्पष्ट रहा है—
जहाँ सूचना रोकी जाती है, वहाँ कानून आवेदक के साथ खड़ा होता है।

Supreme Court -

नागरिक का जानने का अधिकार सर्वोपरि है।
सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह दोहराया है कि RTI किसी विभागीय कृपा का विषय नहीं है।
🔹
State of U.P. v. Raj Narain (1975) मामले में
SC ने ऐतिहासिक रूप से कहा —
“लोकतंत्र में जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकार क्या कर रही है।”
यह निर्णय आज भी RTI कानून की रीढ़ माना जाता है और पूर्णतः नागरिक-पक्षीय है।
🔹
S.P. Gupta v. Union of India (1981) केस में
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि खुली शासन व्यवस्था (open government) लोकतंत्र का मूल तत्व है और
गोपनीयता अपवाद है,
नियम नहीं।
🔹
Manohar Lal Sharma v. Union of India मामले में RTI से जुड़े अवलोकन कर
SC ने कहा कि सूचना से इनकार तभी संभव है,
जब वह कानूनन अपवाद में स्पष्ट रूप से आती हो।
अन्यथा सूचना देना बाध्यकारी है।
➡️

सुप्रीम कोर्ट का सिद्धांत :

RTI में देरी या अस्वीकार।
✔
बिना उचित आधार के सूचना न देना नागरिक के मौलिक अधिकार का उल्लंघन : केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) का आवेदक को केंद्र में रख कर दिया गया निर्णय।
CIC के अधिकांश निर्णायक आदेश यह स्थापित करते हैं कि —
🔹
Bhagat Singh v. CIC & Ors. (CIC में उद्धृत, बाद में HC द्वारा अनुमोदित सिद्धांत)
“सूचना रोकने का तर्कसंगत आधार बताने का भार लोक सूचना अधिकारी/ लोक प्राधिकार पर है,
न कि सूचना माँगने वाले नागरिक पर।”
🔹
CIC के निरंतर निर्णय (2023–2025) -
“रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं” कहना तब तक स्वीकार्य नहीं,
जब तक रिकॉर्ड के नष्ट होने/अस्तित्वहीन होने का विधिवत प्रमाण न हो।
अधूरी या भ्रामक सूचना देना, सूचना न देने के समान है
🔹
CIC का स्थापित सिद्धांत
यदि मामला प्रथम व द्वितीय अपील तक पहुँचा—
• यह स्वयं में PIO की विफलता का प्रमाण है
और दंडात्मक कार्रवाई का आधार बनता है।
• CIC का झुकाव स्पष्ट रूप से आवेदक-पक्षीय है,
न कि प्रशासन-संरक्षक।
• High Court : RTI नागरिक का औज़ार है, अधिकारी की ढाल नहीं।
उच्च न्यायालयों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि RTI अधिनियम को कमजोर करने की कोई भी कोशिश अस्वीकार्य है।
🔹
Delhi High Court – J.P. Agrawal v. Union of India (2011) मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा —
देने योग्य उपलब्ध सूचना देने के लिए PIO व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी है।
यह तर्क स्वीकार्य नहीं कि “विभाग ने सूचना नहीं दी।”
यह निर्णय स्पष्ट रूप से RTI आवेदक के अधिकारों की रक्षा करता है।
🔹
Bombay High Court : मुंबई हाईकोर्ट ने माना कि
RTI अधिनियम का पालन न करना गंभीर कदाचरण
(serious misconduct) है
और नागरिक को न्याय पाने का अधिकार है।
🔹
Rajasthan High Court के निर्णयों का स्थापित रुझान -
यदि प्रथम अपीलीय अधिकारी लोक सूचना अधिकारी की गलती को ढंकने का प्रयास करता है,
तो वह भी समान रूप से दोषी माना जाएगा।

अब IPC नहीं, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की मदद ले :

आवेदक के अधिकार को आपराधिक कानून कानून के अंतर्गत संरक्षण ;
RTI उल्लंघन अब केवल जुर्माने का विषय नहीं रहा।

BNS लागू होने के बाद आवेदक का कानूनी संरक्षण और मजबूत हुआ है।
IPC 166 → BNS धारा 198 लागू होती है
लोक सेवक/लोक सूचना अधिकारी द्वारा जानबूझ कर कर्तव्य उल्लंघन कर
आवेदक को मानसिक/आर्थिक क्षति पहुँचाने पर।

IPC 166A → BNS धारा 199 लागू होती है
कानूनन आवश्यक कार्य (RTI सूचना देना) को नहीं करने पर।

IPC 175 → BNS धारा 221 लागू होगी
सूचना/दस्तावेज जानबूझ कर न देने पर।

IPC 188 → BNS धारा 223 लागू होती है प्रथम अपीलीय अधिकारी या केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग
(FAA / CIC / SIC) के आदेशों की अवहेलना करने पर।

निष्कर्ष : अब तराजू एक तरफ़ा नहीं

सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट और केंद्रीय सूचना आयोग (CIC, High Court, Supreme Court) — तीनों का संयुक्त संदेश स्पष्ट है :

  1. RTI आवेदक याचक नहीं, अधिकार-धारक है।
  2. सूचना रोकना अब प्रशासनिक गलती नहीं,
  3. बल्कि संवैधानिक और आपराधिक उल्लंघन है।
* Legal Ambit का स्पष्ट मत है कि अब अपीलों में उलझाने की संस्कृति समाप्त होनी चाहिए और
जहाँ आवश्यक हो, आवेदकों को सीधी विधिक कार्यवाही करना चाहिए।
#Legal Ambit एप आरटीआई उपयोग कर्ताओं की निशुल्क कानूनी मार्गदर्शन/ सहायता करता है। आरटीआई के क्षेत्र में सक्रिय वकीलों के समूह द्वारा संचालित है यह एप। आरटीआई संबंधी मामलों में विधिक कार्यवाही के लिए आप इस ऐप से सलाह ले सकते हैं।

- भाई विनोद कुमार की पोस्ट

Friday, February 6, 2026

पैसों के संदिग्ध लेनदेन : होटल कारोबारी से लेनदेन के मामले में महिला डीएसपी कल्पना वर्मा निलंबित, आदेश जारी,

 


पैसों के संदिग्ध लेनदेन : होटल कारोबारी से लेनदेन के मामले में महिला डीएसपी कल्पना वर्मा निलंबित, आदेश जारी

#DSP कल्पना वर्मा निलंबित, आदेश जारी

छत्तीसगढ़ के गृह विभाग ने दंतेवाड़ा में पदस्थ डीएसपी कल्पना वर्मा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई एक होटल कारोबारी के साथ पैसों के संदिग्ध लेनदेन का वीडियो सामने आने और प्राथमिक जांच में शिकायत सही पाए जाने के बाद की गई है।

रायपुर। छत्तीसगढ़ के गृह विभाग ने दंतेवाड़ा में पदस्थ डीएसपी कल्पना वर्मा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई एक होटल कारोबारी के साथ पैसों के संदिग्ध लेनदेन का वीडियो सामने आने के बाद की गई है। जानकारी के मुताबिक, डीएसपी कल्पना वर्मा का एक होटल व्यवसायी के साथ रुपयों के लेनदेन को लेकर वीडियो सोशल मीडिया और विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के पास पहुंचा था।

छत्तीसगढ़ शासन ने ( DSP Kalpana Verma suspend ) को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। वे अभी दंतेवाड़ा जिले में पदस्थ हैं। इस संबंध में गृह ( पुलिस) विभाग ने आदेश जारी किया है।

जारी आदेश के अनुसार, शिकायत की प्राथमिक जांच में उनके खिलाफ वित्तीय लेनदेन, जांच में दिए गए कथनों और व्हाट्सएप चैट के तथ्यों में विरोधाभासी, कर्तव्य के दौरान अवैध आर्थिक लाभ प्राप्त करना, अपने पद का दुरूपयोग करना व अनुपातहीन सम्पत्ति अर्जित करने के आरोप सामने आए हैं।
यह कृत्य छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम, 1965 के नियम-3 के विपरीत है। जिसे देखते हुए उन्हें निलंबित कर दिया गया है। निलंबन अवधि में कल्पना वर्मा का मुख्यालय पुलिस मुख्यालय, नवा रायपुर रहेगा और उन्हें नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता प्रदान किया जाएगा।
बता दें कि डीएसपी कल्पना वर्मा (DSP Kalpana Verma) और रायपुर के कारोबारी दीपक टंडन (Businessman Deepak Tandon) से जुड़े विवाद में जांच के दौरान कई गंभीर तथ्य सामने आए थे। सरकार के निर्देश पर एडिशनल एसपी स्तर पर कराई गई जांच की करीब 1475 पेज की रिपोर्ट तैयार कर शासन को सौंपी गई थी। इस रिपोर्ट में कई अहम खुलासे किए गए थे।

जांच रिपोर्ट में डीएसपी वर्मा और दीपक टंडन के बीच हुई व्हाट्सएप चैट सामने आई, जिनमें पुलिस विभाग से जुड़ी संवेदनशील और खुफिया जानकारियां साझा किए जाने का उल्लेख था, जो खुफिया जानकारी लीक करने जैसे गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
वहीं अब शासन ने एक्शन लेते हुए डीएसपी कल्पना वर्मा को निलंबित कर दिया है।

EpsteinFiles:- क्या दुनिया के सबसे क्रूर यौन अपराधी को डिजिटल इंडिया की आड़ में भारत में वीआईपी एक्सेस मिल रहा था ? इस मामले में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की क्या भूमिका थी ?


#EpsteinFiles :- 
EpsteinFiles:- क्या दुनिया के सबसे क्रूर यौन अपराधी को डिजिटल इंडिया की आड़ में भारत में वीआईपी एक्सेस मिल रहा था ? इस मामले में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की क्या भूमिका थी ?


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 केंद्रीय मंत्री #HardeepSinghPuri  हरदीप सिंह पुरी की इसमें क्या भूमिका थी?

#EpsteinFiles :- क्या #Digital_India की आड़ में दुनिया के क्रूरतम सेक्स अपराधी को मिल रही थी भारत में वीआईपी एक्सेस? 


हाल ही में सामने आए #EpsteinFiles के दस्तावेज बताते हैं कि किस तरह एक सजायाफ्ता अंतरराष्ट्रीय अपराधी को भारतीय कूटनीतिक तंत्र तक का रास्ता दिया गया.

24 अक्टूबर 2014 को #Jeffry_Epstein –जिसे 2008 में ही नाबालिगों की सेक्स ट्रैफिकिंग का दोषी ठहराया जा चुका था—उसने तत्कालीन भाजपा सदस्य और पूर्व राजनयिक हरदीप पुरी को ईमेल किया– "मेरी असिस्टेंट को भारत के लिए तुरंत वीजा चाहिए"

#EpsteinFiles :- क्या #Digital_India की आड़ में दुनिया के क्रूरतम सेक्स अपराधी को मिल रही थी भारत में वीआईपी एक्सेस? 



एक रिटायर हो चुके अधिकारी और तत्कालीन भाजपा नेता ने अपनी पूरी राजनीतिक और कूटनीतिक ताकत झोंक दी. #हरदीप_सिंह_पूरी ने रिटायर्ड राजदूत प्रमोद कुमार बजाज और न्यूयॉर्क के संपर्कों को ईमेल कर निर्देश दिए कि एपस्टीन का काम "प्रायोरिटी" पर हो.

#EpsteinFiles :- क्या #Digital_India की आड़ में दुनिया के क्रूरतम सेक्स अपराधी को मिल रही थी भारत में वीआईपी एक्सेस? 



2013 में हरदीप पुरी IFS से रिटायर होते हैं,जनवरी 2014 में वह #BJP में शामिल होते हैं और अक्टूबर 2014 में एक सजायाफ्ता अपराधी के लिए 'वीजा सर्विस' का जरिया बनते हैं.

2008 में ही एपस्टीन के 'पीडोफाइल' और 'यौन तस्कर' होने की खबर पूरी दुनिया को थी. क्या हरदीप पुरी जैसे अनुभवी पूर्व राजनयिक और भाजपा नेता के तौर पर वे नहीं जानते थे कि एपस्टीन कौन है?

#EpsteinFiles :- क्या #Digital_India की आड़ में दुनिया के क्रूरतम सेक्स अपराधी को मिल रही थी भारत में वीआईपी एक्सेस? 



राजनीति में कुछ भी मुफ्त नहीं होता. हरदीप पुरी ने एपस्टीन के लिए अपनी सारी हदें पार कीं, तो सवाल उठता है कि इसके बदले में उन्हें क्या हासिल हुआ? एपस्टीन का ऐसा कौन सा 'एहसान' था जिसे चुकाने की उन्हें इतनी बेताबी थी?

हरदीप सिंह पुरी ने बाद में सफाई दी थी कि Epstein से उनकी बातचीत 'डिजिटल इंडिया' को लेकर थी.

सवाल यह है कि एक यौन अपराधी भारत के इतने महत्वपूर्ण मिशन में किस हैसियत से सलाह दे रहा था? क्या डिजिटल इंडिया को एक अपराधी के इनपुट की जरूरत थी?

13 नवंबर 2014 को भेजे गए ईमेल में हरदीप सिंह पुरी ने #जेफरी_एपस्टीन और #Reed_Hoffman को भारत में इंटरनेट आधारित आर्थिक गतिविधियों, 'डिजिटल इंडिया' और सॉफ्टबैंक जैसे बड़े निवेशों के बारे में विस्तार से बताया था.

3 अक्टूबर 2014 को उनकी रीड हॉफमैन के साथ सिलिकॉन वैली में बातचीत हुई थी, जिसके बारे में उन्होंने एपस्टीन को जानकारी दी थी. 

एक केंद्रीय मंत्री का नाम अंतरराष्ट्रीय सेक्स स्कैंडल से जुड़े व्यक्ति के साथ जुड़ना केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि का मामला है या नहीं.फिर भी मोदी सरकार ने इस पर मुंह में दही जमा रखा है? भारत के मान,सम्मान,स्वाभिमान की प्रधानमंत्री को कोई परवाह ही नहीं?

Thursday, February 5, 2026

सूचना के अधिकार ( RTI ) : पति और पत्नी को है एक दूसरे की जानकारी पाने का अधिकार


सूचना के अधिकार ( RTI ) : पति और पत्नी को है एक दूसरे की जानकारी पाने का अधिकार

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सूचना के अधिकार (RTI) के तहत पति या पत्नी द्वारा एक-दूसरे की व्यक्तिगत जानकारी (जैसे आय, सर्विस रिकॉर्ड या अन्य विवरण) प्राप्त करने के संबंध में कानून काफी स्पष्ट है।विभिन्न न्यायालयों और केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के निर्णयों के आधार पर इसकी स्थिति इस प्रकार है :

​1. वेतन और आय की जानकारी (Salary Details) -

​सबसे अधिक विवाद इसी विषय पर होता है। कानून के अनुसार पति या पत्नी अपने साथी के कुल वेतन,भत्ते की जानकारी RTI के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं। 

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) और राज्य सूचना आयोगों के निर्णयों के अनुसार, लोक सेवक (Public Servant) का वेतन सार्वजनिक धन से दिया जाता है, इसलिए इसकी जानकारी मांगी जा सकती है। 

यह जानकारी कोई अन्य व्यक्ति भी मांग सकता है।

* ​कटौतियां (Deductions) : वेतन से होने वाली व्यक्तिगत कटौतियां (जैसे LIC प्रीमियम, लोन की किस्त आदि) को 'व्यक्तिगत जानकारी' माना जाता है और यह आमतौर पर साझा नहीं की जाती।

​2. व्यक्तिगत जानकारी बनाम लोक हित -

​सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(j) किसी व्यक्ति की निजी जानकारी देने से छूट देती है, बशर्ते उसमें कोई बड़ा 'जनहित' (Public Interest) न हो।

​अगर मामला भरण-पोषण (Maintenance) या घरेलू हिंसा के केस से जुड़ा है, तो न्यायालय अक्सर आय के प्रमाण के तौर पर जानकारी देने का आदेश देते हैं।

​सिर्फ संदेह या आपसी झगड़े के आधार पर किसी के बैंक स्टेटमेंट, कॉल रिकॉर्ड या निजी पत्राचार की जानकारी RTI से प्राप्त नहीं की जा सकती।

​3. सर्विस रिकॉर्ड और अन्य विवरण -

पति/पत्नी किस पद पर तैनात हैं और उनकी पोस्टिंग कहाँ है, यह जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

* ​सर्विस बुक : 

पूरी सर्विस बुक की कॉपी नहीं मांगी जा सकती क्योंकि इसमें नॉमिनी, स्वास्थ्य रिकॉर्ड और परिवार के अन्य सदस्यों की निजी जानकारी होती है। इन जानकारी को छुपा कर सर्विस बुककी शेष जानकारी दी जा सकती है।

​4. तीसरे पक्ष की प्रक्रिया (Third Party Procedure)-

​जब आप पति या पत्नी की जानकारी मांगते हैं, तो जन सूचना अधिकारी (PIO) धारा 11 के तहत उस व्यक्ति को नोटिस भेजता है। यदि वह व्यक्ति (पति या पत्नी) जानकारी साझा करने से मना कर देता है, तो भी PIO जानकारी दे सकता है। यदि वह जानकारी देने से इंकार कर देता है, तो आप प्रथम और द्वितीय अपील में चुनौती दे सकते हैं।

* ​महत्वपूर्ण निर्णय :

​रहमत उल्लाह बनाम सूचना आयुक्त के मामले में न्यायपालिका द्वारा यह स्पष्ट किया गया था कि पत्नी को अपने पति का वेतन जानने का अधिकार है, ताकि वह भरण-पोषण के अपने कानूनी अधिकार का प्रयोग कर सके।

•  पति या पत्नी को एक दूसरे के कुल वेतन व संपत्ति की जानकारी न्यायालय के माध्यम से भी पाने का अधिकार है।

* राज्य सूचना आयुक्त के नाते हमने ऐसे अनेक पति-पत्नी को एक दूसरे की आय व संपत्ति और सेवा पुस्तिका (सर्विस बुक) की जानकारी दिलाई है।

ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ( आइसना ) का संभागीय सम्मान समारोह 22 फरवरी 2026 को नरसिंहपुर में


ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ( आइसना ) का संभागीय सम्मान समारोह 22 फरवरी 2026


ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ( आइसना ) का संभागीय सम्मान समारोह 22 फरवरी 2026 को नरसिंहपुर के मां नर्मदा बरमान के तट परआयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन नरसिंहपुर के बरमान घाट पर लगातार 9 बरसों से आयोजित हो रहा है। इस वर्ष फिर प्रदेश सहसचिव मनजीत छाबड़ा जी एवं नरसिंहपुर जिला इकाई के तत्वाधान में आयोजित किया जा रहा है। इस आयोजन में क्षेत्रीय स्तर के पत्रकार एवं समाज सेवी साथियों को विभिन्न विधाओं में सम्मानित किया जाएगा। 

ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ( आइसना ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री शिव शंकर त्रिपाठी जी एवं मध्य प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष विनय जी. डेविड  ने इस आयोजन की सफलता के लिए शुभकामनाएं दी हैं। आप सभी क्षेत्रीय पत्रकार साथी का इस गरिमामय आयोजन में शामिल होने का विनम्र आग्रह हैं।

विनय जी. डेविड

9893221036

प्रदेश अध्यक्ष ( मध्य प्रदेश )

ऑल इंडिया स्माल न्यूज पेपर्स एसोसिएशन ( आइसना )

ऐप्सटिन फाइल्स : “एक बंदे ने एलीट पार्टी से चिल्लाते हुए बाहर दौड़ लगा दी कि— ‘वो लोग इंसान खा रहे हैं!’


 
ऐप्सटिन फाइल्स : “एक बंदे ने एलीट पार्टी से चिल्लाते हुए बाहर दौड़ लगा दी कि- ‘वो लोग इंसान खा रहे हैं!’


 “एक बंदे ने एलीट पार्टी से चिल्लाते हुए बाहर दौड़ लगा दी कि- ‘वो लोग इंसान खा रहे हैं!’

और अब वह व्हिसलब्लोअर (भेद खोलने वाला) रहस्यमय तरीके से गायब है।”

“वो इंसान खा रहे हैं”
यह घटना 2013 की बताई जाती है। 21 साल की मॉडल गिउफ्रे रिक्की जेम्सन एक हाई-प्रोफाइल पार्टी से बदहवास हालत में बाहर निकली। उनका दावा था कि उन्होंने वहाँ कुछ अत्यंत डरावनी और असामान्य चीज़ें देखीं। इस घटना के कुछ समय बाद, वह रहस्यमय तरीके से गायब हो गईं और तब से उनका कोई पुख्ता सुराग नहीं मिला।
अब लगभग एक दशक बाद, 2026 में जेफ्री एप्सटीन जांच से जुड़े कुछ दस्तावेज़ सामने आने के बाद यह मामला फिर से चर्चा में है। हालाँकि, इन फाइलों में बड़े लोगों के शोषण नेटवर्क से जुड़ी बातें सामने आई हैं, लेकिन नरभक्षण (कैनिबलिज़्म) या इंसानी बलि जैसे दावों का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है। इनमें से ज़्यादातर बातें सुनी-सुनाई या अपुष्ट कहानियाँ हैं, जिन्हें बिना प्रमाण सच मानना ठीक नहीं माना जाता।
गिउफ्रे का मामला आज भी एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है और इंटरनेट पर इसे लेकर तरह-तरह की थ्योरियाँ चलती रहती हैं। सच्चाई यह है कि अमीर और रसूखदार लोगों के बीच शोषण और तस्करी के पैटर्न तो मिले हैं, लेकिन “इंसान खाने” जैसे भयानक दावे अब तक सिर्फ दावे ही हैं, जिनकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

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