Thursday, August 27, 2020

TOC NEWS @ www.tocnews.org ♦ विजया पाठक हाल ही में पत्रकारिता पेशे से जुड़े लोगों के लिए उत्‍तर प्रदेश से एक बड़ी राहत देनी वाली खबर प्रकाश में आयी है। यह खबर उन मीडिया संस्‍थानों को झकझोर करने वाली है, जिसमें वह अपने संस्‍थान में काम करने वाले वर्कर्स को बिना किसी कारण के बाहर निकाल देते है। ऐसे संस्‍थानों को आईना दिखाते हुए न्‍यायालय ने एक मामले में पत्रकार के हित में फैसला सुनाया है। दरअसल बनारस के अख़बार ''गांडीव'' के मीडियाकर्मी सुशील मिश्र ने मजीढिया वेज बोर्ड मामले में लड़ाई जीत ली है। वाराणासी श्रम न्‍यायालय ने काशी पत्रकार संघ के सदस्‍य सुशील मिश्र के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनको सेवा में पुन: बहाल करने के साथ ही उन्‍हें बेकारी अवधि (लगभग 6 वर्ष) के संपूर्ण वेतन व अन्‍य भत्‍ते व सारे इंसेंटिव का भुगतान करने का आदेश दिया है। निश्चित तौर पर कोर्ट के इस फैसले से देश के समस्‍त मीडिया संस्‍थानों में काम करने वाले मीडियाकर्मियों को संबल मिलेगा। वही मीडिया संस्‍थान भी कर्मचारियों के हितों के बारे में सोचने पर मजबूर होंगे। हम देख सकते हैं कि कोरोना के इस संक्रमण काल में तमाम मीडिया संस्‍थानों ने अपने कर्मचारियों की छंटनी कर दी है या उनका वेतन कम कर दिया है। ऐसे हालातों में हजारों की संख्‍या में मीडियाकर्मी बेरोजगार हो गए हैं। मीडिया के व्‍यवहार ने उन्‍हें सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है। हम समझ सकते हैं कि एक मीडियाकर्मी का जीवन क्‍या होता है? दिन-रात भाग-दौड़ी कर अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करते है। अपने जीवन की समस्‍त ऊर्जा वह मीडिया संस्‍थान में झोंक देते है। बदले में उसे क्‍या मिला है? तिरस्‍कार और जॉब की असुरक्षा जो पत्रकार संस्‍थान को जिंदगी भर कमा कर देता है क्‍या इन संस्‍थानों का फर्ज नहीं बनता कि वह भी कुछ समय इन कर्मचारियों के साथ सुख-दु:ख में खड़ा हो। लेकिन ऐसा बिल्‍कुल नही हो रहा है। निश्चित तौर पर बनारस के इस मामले से देश के लाखों मीडियाकर्मियों को एक शक्ति मिलेगी और किसी के साथ हुए अन्‍याय के खिलाफ वह कोर्ट का दरवाजा खटखटायेगा। मेरा भी मानना है कि कोई भी मीडिया संस्‍थान अपने कर्मचारियों के साथ ऐसा व्‍यवहार कभी नही करें जिससे उसकी आजीविका ही संकट में आ जाए। बगैर किसी ठोस कारण के नौकरी से निकालना अनुचित है। अगर निकालना ही है तो कुछ समय जरूर देना चाहिए। वैसे भी पत्रकारिता पेशा कई उतार-चढ़ाव से घिरा रहता है। बहरहाल पत्रकार के हित में जो फैसला आया है वह मीडिया कर्मियों के लिए एक बहुत बड़ी राहत की सांस जरूर देगा। सुशील मिश्र की इस जीत पर जगत विज़न मासिक पत्रिका के परिवार की ओर से बहुत-बहुत बधाई देते है।



TOC NEWS @ www.tocnews.org

♦ विजया पाठक      

हाल ही में पत्रकारिता पेशे से जुड़े लोगों के लिए उत्‍तर प्रदेश से एक बड़ी राहत देनी वाली खबर प्रकाश में आयी है। यह खबर उन मीडिया संस्‍थानों को झकझोर करने वाली है, जिसमें वह अपने संस्‍थान में काम करने वाले वर्कर्स को बिना किसी कारण के बाहर निकाल देते है।

ऐसे संस्‍थानों को आईना दिखाते हुए न्‍यायालय ने एक मामले में पत्रकार के हित में फैसला सुनाया है। दरअसल बनारस के अख़बार ''गांडीव'' के मीडियाकर्मी सुशील मिश्र ने मजीढिया वेज बोर्ड मामले में लड़ाई जीत ली है। वाराणासी श्रम न्‍यायालय ने काशी पत्रकार संघ के सदस्‍य सुशील मिश्र के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनको सेवा में पुन: बहाल करने के साथ ही उन्‍हें बेकारी अवधि (लगभग 6 वर्ष) के संपूर्ण वेतन व अन्‍य भत्‍ते व सारे इंसेंटिव का भुगतान करने का आदेश दिया है।             

निश्चित तौर पर कोर्ट के इस फैसले से देश के समस्‍त मीडिया संस्‍थानों में काम करने वाले मीडियाकर्मियों को संबल मिलेगा। वही मीडिया संस्‍थान भी कर्मचारियों के हितों के बारे में सोचने पर मजबूर होंगे। हम देख सकते हैं कि कोरोना के इस संक्रमण काल में तमाम मीडिया संस्‍थानों ने अपने कर्मचारियों की छंटनी कर दी है या उनका वेतन कम कर दिया है। ऐसे हालातों में हजारों की संख्‍या में मीडियाकर्मी बेरोजगार हो गए हैं।

मीडिया के व्‍यवहार ने उन्‍हें सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया है। हम समझ सकते हैं कि एक मीडियाकर्मी का जीवन क्‍या होता है? दिन-रात भाग-दौड़ी कर अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करते है। अपने जीवन की समस्‍त ऊर्जा वह मीडिया संस्‍थान में झोंक देते है। बदले में उसे क्‍या मिला है?

तिरस्‍कार और जॉब की असुरक्षा जो पत्रकार संस्‍थान को जिंदगी भर कमा कर देता है क्‍या इन संस्‍थानों का फर्ज नहीं बनता कि वह भी कुछ समय इन कर्मचारियों के साथ सुख-दु:ख में खड़ा हो। लेकिन ऐसा बिल्‍कुल नही हो रहा है। निश्चित तौर पर बनारस के इस मामले से देश के लाखों मीडियाकर्मियों को एक शक्ति मिलेगी और किसी के साथ हुए अन्‍याय के खिलाफ वह कोर्ट का दरवाजा खटखटायेगा।                 

मेरा भी मानना है कि कोई भी मीडिया संस्‍थान अपने कर्मचारियों के साथ ऐसा व्‍यवहार कभी नही करें जिससे उसकी आजीविका ही संकट में आ जाए। बगैर किसी ठोस कारण के नौकरी से निकालना अनुचित है। अगर निकालना ही है तो कुछ समय जरूर देना चाहिए। वैसे भी पत्रकारिता पेशा कई उतार-चढ़ाव से घिरा रहता है।

बहरहाल पत्रकार के हित में जो फैसला आया है वह मीडिया कर्मियों के लिए एक बहुत बड़ी राहत की सांस जरूर देगा। सुशील मिश्र की इस जीत पर जगत विज़न मासिक पत्रिका के परिवार की ओर से बहुत-बहुत बधाई देते है।

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