| शिवराज सिंह चौहान |
अवधेश पुरोहित // TOC NEWS
भोपाल । जिस मध्यप्रदेश को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने सपनों का स्वर्णिम मध्यप्रदेश बनाने की भरपूर तैयारी में लगे हुए हों उसी प्रदेश में जहाँ चालीस फीसदी गांवों में पिछड़ी जातियों और दलित वर्ग के लोगों को मंदिर में प्रवेश में भेदभाव का सामना करना पड़ता हो, यही नहीं इसी मुख्यमंत्री के स्वर्णिम मध्यप्रदेश में ३० फ ीसदी गांवों में दलितों और पिछड़ी जातियों को पानी भरने से रोका जाता हो, तो वहीं ३५ फीसदी गांवों में रहने वाले दलितों को शमशान के उपयोग पर पाबंदी का सामना करना पड़ता हो, तो वहीं प्रदेश के अति लोकप्रिय मुख्यमंत्री के स्वर्णिम मध्यप्रदेश में जहाँ सरकार की हर वह योजना मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लाड़लियों के लिये चलाई जा रही हों, इसके बावजूद भी इस प्रदेश में दतिया जिले के बीकर गांव में दस-दस हजार में कंजर के डेरों में अपनी दो लाड़लियों को एक पिता द्वारा बेचे जाने की घटना भी सामने आई है।
इस घटना का खुलासा होने के बाद मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री की लाड़लियों की प्रगति और उनके उज्जवल भविष्य के लिये चलाई जा रही योजनाओं पर प्रश्नचिन्ह तो उठता ही है, तो वहीं मुख्यमंत्री की लाड़लियों से संबंधित योजनाओं को संचालित करने वाले अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े होते हैं। बुंदेलखण्ड के दतिया जिले के बीकर की जो शर्मनाक घटना सामने आई उसके अनुसार माँ की मौत क्या हुई गरीबी ने भी अपना शिकंजा कस लिया और मजबूर बाप ने अपनी दो बेटियों को बेच दिया। मामला दतिया जिला मुख्यालय से १५ किलोमीटर दूर बीकर गांव का है जहां रमेश अहिरवार ने गरीबी से तंग आकर अपनी १३ और छ: साल की दो बेटियों को कंजरों के डेरे में दस-दस हजार रुपए में बेच दिया।
अब रमेश गांव से गायब है और पुलिस उसको खोजने के साथ-साथ लड़कियां बेचने की सम्पूर्ण जानकारी जुटाने में लगी हुई है, जिस प्रदेश में गरीबों, दलितों और बेसहारा लोगों के लिए तमाम जनकल्याणकारी योजनाएं संचालित की जाती हों, उसी प्रदेश के दतिया जिले के बीकर के दलित रमेश अरिहवार के पास कोई स्थाई कामधंधा न होना भी प्रदेश में चल रही दलितों और कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए संचालित की जाने वाली योजनाओं पर भी तमाम सवालिया निशान भी खड़े हो रहे हैं। अपनी लाड़लियों को कंजरों के डेरे में दस-दस हजार रुपये में बेचने वाले रमेश के बारे में बताया जाता है कि काम धंधा न होने के कारण उसकी पत्नी किसी तरह मेहनत मजदूरी कर अपने तीन बच्चों को पाल रहे थे।
इसी रोजी-रोटी के संघर्ष के चलते एक साल पहले रमेश की बीमार पत्नी की मौत हो गई थी इसके बाद रमेश के लिये अपनी दो बेटियों और एक बेटे को पालना मुश्किल हो गया, यही नहीं इसी दौरान रमेश को गांव में भी मजदूरी मिलना बंद हो गई और वह अपना गांव छोड़कर झडिय़ा गांव में कंजरों के डेरे के पास काम करने लगा। गांव में ही रमेश के दो भाई रहते हैं लेकिन वो भी उसकी मदद के लिए आगे नहीं आए। इन्हीं सब समस्याओं से जूझते हुए रमेश ने अपनी दोनों बेटियों को अलग-अलग कंजरों के डेरे में बेच दिया और गांव छोड़कर रफूचक्कर हो गया। रमेश के गायब होने के बाद उसका दस साल का बेटा अब भी कंजरों के डेरे में रहता है।
इस सारी घटना का खुलासा होने के बाद दतिया जनपद पंचायत के सीईओ अजय सिंह कहते हैं कि रमेश अहिरवार के बारे में कोई जानकारी नहीं है पता करके कुछ बता पाएंगे, तो वहीं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के स्वर्णिम मध्यप्रदेश में राज्य के दलितों, गरीबों और बेसहारा वर्ग के लोगों के लिये तमाम जनकल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन मजे की बात यह है कि जिन अफसरों पर इन वर्गों के उत्थान की जिम्मेदारी है, तो वहीं यह सवाल भी उठता है कि जिस बीकर गांव में रमेश अहिरवार निवास करता था उससे संबंधित पंचायत के सरपंच और सचिव के साथ-साथ अन्य सरकारी अमले का ध्यान रमेश अहिरवार की तंगी हालत पर क्यों नहीं गया यह जांच का विषय है।
रमेश अहिरवार के द्वारा गरीबी से तंग आकर अपनी दो लाड़लियों को दस-दस हजार रुपये में कंजरों के डेरों में बेचने की यह घटना कई सवाल खड़े करती है तो वहीं राज्य में चलाई जा रही इन वर्गों के लिये योजनाओं को क्रियान्वयन करने वाले अधिकारियों की गैर जिम्मेदाराना कार्यप्रणाली को लेकर उनकी कर्तव्यनिष्ठा उजागर होती है और यह भी संकेत मिलते हैं कि जिस सरकार में गरीबों के उत्थान के लिये तमाम योजनायें चल रही हों और ऐसी स्थिति में रमेश को इन सरकारी योजनाओं का लाभ क्यों और किस स्थिति में पंच सरपंच और पंचायत सचिवों से लेकर गरीबों के उत्थान से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन में लापरवाही बरतने का भी मामला उजागर होता है।

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