अवधेश पुरोहित // TOC NEWS
भोपाल । यूँ तो प्रदेश कांग्रेस विभिन्न गुटों में बंटी हुई है तो वहीं इसके नेताओं की रणनीति के चलते इस प्रदेश की कांग्रेस की जो दुर्गति हुई है अब उस दुर्गति को संवारने में राज्य के पूर्व केन्द्रीय मंत्री और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया इस प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने का सपना पाले कांग्रेस में जान फूंकने की जुगत में लगे हुए हैं लेकिन यदि कांग्रेस के नेताओं की पुरानी कार्यप्रणाली पर नजर डालें तो इन्हीं नेताओं की कार्यप्रणाली के चलते इस प्रदेश में कांग्रेस की यह दुर्गति हुई है तो वहीं प्रदेश के अपने कांग्रेस का बड़ा जननेता मानने वाले नेताओं की स्थिति यह है कि जो नेता एक वार्ड पार्षद का चुनाव नहीं जीत सकता वह अपने आपको राष्ट्रीय स्तर का नेता मानने का अहम पाले हुए है और ऐसे ही नेताओं के चलते वर्ष २००८ में यह भी आरोप सुर्खियों में थे कि पार्टी ने भाजपा से मिलीभगत कर टिकटों का वितरण किया तो वहीं टिकट वितरण के एवज में पैसे की भी वसूली की गई, खैर पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं ने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी के ऊपर लगे इन आरोपों को गंभीरता से नहीं लिया यह उनका अपना मामला है,
लेकिन उसके बाद पार्टी की जो दुर्गति शुरू हुई और उसके चलते पार्टी में बिखराव का सिलसिला शुरू हुआ जो आज तक नहीं थम सका है, २०१३ के विधानसभा चुनाव के दौरान जिन ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी ही पार्टी के प्रत्याशियों को चुनावी समर में मात देने के भी आरोप लगे तो वहीं दतिया जिले के सेंवढ़ा विधानसभा के कांग्रेसी उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने तो यहां तक आरोप लगाया था कि सिंधिया ने अपने पीए को भेजकर उन्हें हराया, जहां तक बात घनश्याम सिंह की करें तो घनश्याम सिंह भी ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह पूर्व राजघराने से आते हैं और उनके व्यवहार और सहजता के कारण वह आम जन में अति लोकप्रिय हैं और जिस विधानसभा सेंवढ़ा से कांग्रेस ने उन्हें चुनावी समर में उतारा था वह उनकी रियासत का एक अंग था और यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में वह काफी लोकप्रिय थे लेकिन चूँकि उस समय सिंधिया के पाले से दामन झाड़ उन्होंने दिग्विजय सिंह के पाले में वह चले गये थे शायद यही वजह थी कि सिंधिया ने उन्हें चुनावी समर में भाजपा की तरह पराजित करने की ठान ली थी।
यही नहीं जो ज्योतिरादित्य सिंधिया इन दिनों प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने का सपना पाले हुए हैं और इस राज्य में कांग्रेस में दोबारा जान फूंकने की कोशिश में लगे हुए हैं उन्हीं सिंधिया के वह सिपहसालार भी जिन्हें उन्होंने हर समय टिकट दिलाने की कोशिश की वह सिपहसालार जो आज पार्टी के डॉ. गोविंद सिंह पर कई तरह के आरोप लगा रहे हैं और उन्हें पार्टी से बाहर करने की मांग तक कर रहे हैं वह सिपहसालार अपने क्षेत्र में कितने लोकप्रिय हैं इस बात का अंदाजा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह डॉ. गोविंद सिंह की तरह २०१३ के चुनाव में यदि लोकप्रिय होते तो उन्हें जनता पराजय का स्वाद क्यों चखाती, लेकिन कांग्रेस में यह परम्परा है कि जो नेता एक वार्ड पार्षद का चुनाव तक नहीं जीत सकता लेकिन वह अपने वरिष्ठ नेताओं की गणेश परिक्रमा करके राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होने का भ्रम जरूर पाले रहता है। बात यदि हाल ही में डॉ. गोविंद सिंह द्वारा सिंधिया पर तंज कसने को लेकर जो विवाद पार्टी में चल रहा है उन्हीं डॉ. गोविंद सिंह को मुरैना से लड़े लोकसभा चुनाव में उनकी ही पार्टी के उन नेताओं द्वारा जो सिंधिया के इर्द-गिर्द नजर आते हैं उन्होंने ही लोकसभा चुनाव में डॉ. गोविंद सिंह को हराने की कोशिश की, ऐसी क्षेत्र में चर्चा है।
यही नहीं भाजपा के निशने पर रहने वाले डॉ. गोविंद सिंह की लोकप्रियता उन कांग्रेस की ही पार्टी के सिंधिया के समर्थक जो डॉ. गोविंद सिंह का इन दिनों विरोध कर रहे हैं यदि उनकी और डॉ. गोङ्क्षवद सिंह की तुलना की जाए तो यह साफ हो जाता है कि डॉ. गोविंद सिंह को पार्टी से बाहर निकालने वाले नेताओं से डॉ. सिंह अपने क्षेत्र में काफी लोकप्रिय हैं, तभी तो उनके विधानसभा क्षेत्र की जनता ने भाजपा के लाख विरोध और घेराबंदी करने के बावजूद भी उनका विजयरथ आगे बढ़़ाने का काम किया, लेकिन जो उनकी ही कांग्रेस पार्टी के नेता और ज्योतिरादित्य सिंधिया के अपने आपको प्रबल समर्थक मानने वाले नेता आज डॉ. गोविंद सिंह का विरोध कर रहे हैं उनकी क्षेत्र में क्या स्थिति है
यह तो क्षेत्र की जनता द्वारा उन्हें पराजित करके साबित कर दिया, लेकिन लोकतंत्र में आज भी अपने नेताओं के समर्थन में किसी तरह की मांग कर देना एक आम चलन हो गया है, फिर चाहे पार्टी को कितना ही नुकसान हो उन्हें इसकी चिंता नहीं, यदि चिंता है तो अपने नेता की, बात जहां तक इन दिनों सिंधिया को लेकर प्रदेश की राजनीति में तमाम चर्चाओं के दौर जारी हैं जो सिंधिया आज प्रदेश में कांग्रेस की वापसी के साथ ही मुख्यमंत्री बनने का सपना पालकर सक्रिय होते दिखाई दे रहे हैं क्या वह सिंधिया पूरे प्रदेश में कांग्रेस के सर्वमान्य नेता हैं, तो सवाल यह उठ रहा है कि क्या सिंधिया के समर्थकों का जाल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की तरह पूरे प्रदेश में फैला हुआ है और यही नहीं क्या सिंधिया कांग्रेस के सर्वमान्य की छवि बनी हुई है।
इन सब प्रश्नों के साथ-साथ कांग्रेस में सिंधिया को लेकर इन दिनों जिस तरह की चर्चाओं का दौर चल रहा है उससे तो यही नजर आता है कि ना तो सिंधिया आज इस प्रदेश के सर्वमान्य नेता हैं और न ही इतने लोकप्रिय हैं कि उन पर दांव लगाकर कांग्रेस इस प्रदेश में उनके नेतृत्व में चुनाव तो लड़े क्योंकि २०१३ के विधानसभा चुनाव में उन्हें महत्वपूर्ण पद देकर उनको परख चुकी है, जहाँ तक सिंधिया के कार्यकर्ताओं के साथ मेलमिलाप का सवाल है तो कार्यकर्ताओं के साथ जब वह भेंट करते हैं तो उनके भेंट का तरीका क्या होता है, भेंट के समय उनकी कार्यकर्ताओं से दूरी इस बात को साबित करती है कि सिंधिया का कार्यकर्ताओं से कितना लगाव है और इन कार्यकर्ताओं से चल रही भेंट के दौरान उनका जो बर्ताव कार्यकर्ताओं के साथ रहता है और किस चतुराई से दूरी बनाकर कार्यकर्ताओं से भेंट की जाती है इन सबको लेकर पार्टी में चर्चाओं का दौर जारी है, देखना अब यह है कि अभी तक अपनी ही पार्टी के प्रत्याशियों के हार के मुहाने पर पहुंचाने वाले सिंधिया अब सर्वमान्य नेता कैसे बनते हैं इस पर सभी की निगाहें लगी हुई हैं।

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