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ग्वालियर। अपनी जेब का पैसा लगाकर लोकायुक्त के जरिए रिश्वतखोरों को पकड़वाने वाले खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। रिश्वत में दिया पैसा लोकायुक्त ने जब्त कर मामला कोर्ट में भेज दिया, जहां पैसा अदालती प्रक्रिया में उलझ गया और फरियादी के काम भी नहीं हुए। अदालत में अभी तक रिश्वतखोरी के करीब 659 मामले विचाराधीन हैं, इसके चलते लगभग 79 लाख रुपए फिलहाल फंसे हुए हैं। एसपी लोकायुक्त अमित सिंह ने बताया कि यह सही है कि भ्रष्टाचार के किसी मामले में ट्रैप कराने के लिए रिश्वत की रकम फरियादी को ही लानी पड़ती है। ऐसा नियम भी है। कोर्ट में जब तक मामला रहता है रिश्वत का पैसा जमा रहता है। 4 साल में ट्रैप हुए 1408 केस प्रदेश में लोकायुक्त पुलिस ने साल 2013 से लेकर सितंबर 2016 के बीच 1408 अफसरों, कर्मचारियों को रिश्वत लेते ट्रैप किया है। इसमें रिश्वत के रूप में करीब 1.50 करोड़ रुपए खर्च हुए। कई मामलों में कोर्ट से फैसला होने के बाद रिश्वत के रूप में दी गई रकम वापस मिल गई। ऐसे फंसी रकम रायसेन के मंडीदीप निवासी कनकमल जैन की मेटल कंपनी है। उन्हें एफआईपीएफ रजिस्ट्रेशन लेना था। इसके लिए रायसेन मंडीदीप एसआई डिपार्टमेंट में प्रबंधक स्तर के अधिकारी ने 50 हजार रुपए मांगे। 30 हजार में डील हुई। रुपए देकर लोकायुक्त से ट्रैप करवाया। मामला अब कोर्ट में है। फरियादी के 30 हजार रुपए फंसे हुए हैं और रजिस्ट्रेशन अभी तक नहीं हुआ। 30 हजार मांगे इटारसी निवासी उमेश सिंह, सत्यम कैटर्स रेलवे स्टेशन बैतूल के मैनेजर हैं। रेलवे में सप्लाई का ठेका लेने के लिए एक अधिकारी राजेश कुमार लगातार उन्हें परेशान कर रहे थे। साल 2016 में 30 हजार रुपए की रिश्वत मांगी। फरियादी ने लोकायुक्त से मिलकर मई 2016 में आरोपी को ट्रैप कराया। पर अब उनके रुपए भी फंसे हैं काम भी नहीं हुआ है।

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