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भ्रष्टाचार के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की कोई आवश्यकता नहीं : माननीय सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया |
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भ्रष्टाचार के मामले में प्रारंभिक जांच जरूरी नहीं :- माननीय सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
(भ्रष्टाचार में लिप्त लोक सेवकों के विरुद्ध तेजी से होगी कार्रवाई लगेगी भ्रष्टाचार पर लगाम)
शक्ति उजाला
SUPREME COURT OF INDIA
विनोद कुमार गौत्रा
SUPREME COURT OF INDIA
CRIMINAL APPELLATE JURISDICTION
CRIMINAL APPEAL
NO(S) 5001 OF2024
(ARISING OUT OF SLP(CRIMINAL)NO(S) 13264 OF 2024
केस टाइटल स्टेट ऑफ कर्नाटक सरकार, टी एन सुधाकर रेड्डी
नई दिल्ली। भ्रष्टाचार के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की कोई आवश्यकता नहीं, भ्रष्टाचार के मामले में किसी लोक सेवक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारभिक जाँच जरूरी नहीं न सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश न दीपांकर दत्ता और संदीप मेहता की खंडपीठ ने कर्नाटक सरकार बनाम टी एन सुधाकर रेड्डी पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। इसके साथ सिर्फ अदालत ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में एफआईआर दर्ज करने से पहले किसी आरोपी के पास प्रारंभिक जांच का दावा करने का कोई कानूनी अधिकार भी नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश उन सभी कर्मचारियों के लिए एक बड़ा झटका है जो भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच करने का बहाना बनाकर अपने खिलाफ कार्रवाई से बचा करते थे। हालाकि PC Act के तहत आने वाले मामलों सहित कुछ श्रेणियां के मामलों में प्रारंभिक जाँच वांछनीय है लेकिन यह न तो आरोपी का निहित अधिकार है और न ही आपराधिक मामला दर्ज करने के लिए अनिवार्य शर्त है, अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम सहित कुछ मामलों में प्रारंभिक जाँच वांछनीय है, लेकिन आपराधिक मामला दर्ज करने की है कोई शर्त अनिवार्य नहीं है। भ्रष्टाचारः इसके अलावा भ्रष्टाचार के मामलों में एफआईआर दर्ज करने से पहले और आरोपी को प्रारभिक जांच का दावा करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम सहित कुछमामलों में प्रारंभिकजांच में
उस घटित हैलेकिन आपराधिक मामला दर्ज करने की है तो कोई शर्त अनिवार्य नहीं है न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि प्रारंभिक जांच का उद्देश्य प्राप्त सूचना की सत्यता की पुष्टिकरना नहीं है बल्कि केवल यह पता लगाना है कि क्या सूचना से किसी संज्ञेय अपराध के होने का पता चलता है पीठ ने 17 फरवरी को अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी केद्वारा पास विस्तृत एवं तर्कपूर्ण सूचना और इसके बारे में कोई भी विवेकशील व्यक्ति यह विचार कर सकता है की प्रथम दृष्टि यह संज्ञेय अपराध का खुलासा करती है तो प्रारंभिक जांच से बचा नहीं जा सकता है।
कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PCAct) के तहत विशेष रूप से धारा 13 (1) (बी) और धारा 12 के साथ धारा 13 (2) के तहत उनके खिलाफ FIR दर्ज की। कर्नाटक हाईकोर्ट ने ऋकफ खारिज की, जिसके कारण कर्नाटक राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। पिछले कुछ निर्णय का हवाला दियाः शीर्ष अदालत ने कर्नाटक सरकार की याचिका पर अपना फैसला सुनाया याचिका 04 मार्च 2024 हाईकोर्ट कर्नाटका AT BANGALURU, CRIMINAL PETITION NO. 13460 OF 2023 के फैसले को चुनौती दी गई थी, हाई कोर्ट ने कर्नाटक लोकायुक्त पुलिस थाने के एक अफसर के खिलाफ भ्रष्टाचार के तहत दर्ज प्राथमिकी को खारिज कर दिया था, लोकायुक्त पुलिस थाने के अफसर पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का आरोप था। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि इन सिद्धांतों को इस मामले के लागू करने पर यह स्पष्ट है कि
भ्रष्टाचार के आरोपी अफसर के खिलाफ मामला दर्ज करने के लिए प्रारंभिक जांच करना अनिवार्य नहीं है। हाईकोर्ट के निर्णय को निरस्त करते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखित निर्णय ने केन्द्रीय जांच ब्यूरो बनाम थोम्मांडू हन्ना विजयलक्ष्मी के निर्णय में निर्धारित कानून को दोहराया, जिसमें कहा गया कि जब ऋकफ रजिस्ट्रेशन के लिए सूचना के स्रोत से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है तो आरोपी प्रारंभिक जांच को अधिकार के रूप में नहीं मान सकता।
न्यायालय ने प्रतिवादी द्वारा ललिता कुमारी के मामले पर भरोसा करना गलत पाया, क्योंकि ललिता कुमारी के मामले में भ्रष्टाचार सेसंबंधित मामलों में प्रारंभिक जांच अनिवार्य नहीं थी, बल्कि मामले के तथ्यों या परिस्थितियों के आधार पर जांच एजेंसी के विवेक पर छोड़ दिया गया, जब सूचना के स्रोत से संज्ञेय मामले का खुलासा नहीं होता।
ललिता कुमारी के मामले पर भरोसा करते हुए अदालत ने टिप्पणी की, यह माना गया कि यदि पुलिस अधिकारी/जांच एजेंसी द्वारा प्राप्त सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है तो प्रारंभिक जांच अनिवार्य नहीं है। हालांकि, अगर प्रारंभिक जांच की जाती है तो इसका दायरा यह निर्धारित करने तक सीमित होता है कि क्या सूचना प्रथम दृष्टया किसी संज्ञेय अपराध के होने का खुलासा करती है। इसकी सत्यता की पुष्टि तक विस्तारित नहीं होती है। प्रारंभिक जांच की आवश्यकता प्रत्येक मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, भ्रष्टाचार के मामले ऐसी श्रेणी में आते हैं, जहां प्रारंभिक जांच 'की जा सकती है'।
इसके अलावा, इस बात की पुष्टि करते हुए कि स्रोत सूचना रिपोर्ट प्रारंभिक जांच का विकल्प हो सकती है, अदालत ने स्रोत सूचना रिपोर्ट का अध्ययन करने पर पाया कि यह प्रारंभिक जांच के रूप में काम करने के लिए पर्याप्त विस्तृत थी, क्योंकि इसमें प्रतिवादी की संपत्ति और आय विसंगतियों का व्यापक विवरण दिया गया।
उपर्युक्त के संदर्भमें, अदालत ने राज्य की अपील को स्वीकार कर लिया और प्रतिवादी के खिलाफ ऋकफ बहाल की, जिसे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। राष्ट्रीय शक्ति उजाला समाचार पत्र का विशेष प्रकाशन आमजन मानस को जानकारी एवं जनता में प्रचार प्रसार करना है


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