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स्वदेश के स्टूडियो में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सुनाई निजी बातें, चाय-पोहे बेचे, परिवार को लेकर भावुक हैं मोहन यादव |
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स्वदेश के स्टूडियो में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सुनाई निजी बातें, चाय-पोहे बेचे, परिवार को लेकर भावुक हैं मोहन यादव
पिता के कहने से चाय-पोहे बेचे, परिवार को लेकर भावुक हैं मोहन यादव
भोपाल। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव धुरंधर मुख्यमंत्री होने के साथ एक धुरंधर स्वयंसेवक भी है। वे आसानी से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंचे हैं। एक समय अपने पिता की सलाह पर उन्होंने चाप पोहे बेचे, होटल चलाया और मकान बनाकर भी बेचे। लेकिन अब उन्होंने प्रदेश को ही अपना परिवार मान लिया है। वे मुख्यमंत्री हैं। वे काम में हमेशा इतने व्यस्त रहे कि उनको मह भी नहीं पता था कि निवास में भी अकेले राते उनकी छोटी सी बिटिया कब बैठना और चलना सीख गई। वे ऐसे पहले मुख्यमंत्री है जिन्होंने अपने बच्चों तक से कहा कि किसी को बोलना नहीं कि तुम्हारे पित्ता मुख्यमंत्री हैं। परिवार के किस्सों को लेकर अब वे बहुत भावुक हो जाते हैं।
अवसर था स्वदेश के स्टूडियो के उद्घाटन का। स्वयंसेवक से मुख्यमंत्री बने डॉ. मोहन यादव कुछ सवालों पर भावनाओं में बहते हुए भी दिखाई दिए। उन्होंने अपने जीवन के कुछ ऐसे पहलुओं को उजागर किया जो उनके मन मस्तिष्क में तैरते रहते हैं। मंत्री और मुख्यमंत्री बनने के बाद उनहोंने अपने परिवार को कुछ हिदायते भी दी और कुछ स्वनियमन का पालन भी किया।
परिवार की चर्चा पर मुख्यमंत्री की भायुक्ता उन्हें एक अलग दुनिया में ले जाती है। मुख्यमंत्री बताते है जब मेरा विवाह किया तो सबसे पहले संथ का परिवार वावा साहब नातू ने देखा। वहां मेरी पत्नी सीमा के पिठाली महलय मेरे
राजनीति और अध्यात्म दो ही रास्ते
80 के दशक में डॉ. मोहन गादा ने अखिल भारतीय विद्यायों परिषद के कार्यों में खुद को व्यस्त कर लिया था। ऐसे में उनके पिताजी की जायज चिंता थी कि मोहन कैसे कमाएमा और अपना घर कैसे चलाएगा? तब एक ज्योतिषी से उनके परिवार ने विमर्श किया तो पता चला मोहन यादव या तो धुरंधर राजनेता बनेंगे या अध्यात्म की राह पकड़ लेंगे। वया ये वाक्या सही है? इस पर ये कहते हैं कि उनकी अपनी कैलकुलेशन थी। उनहोंने कहा था कि जीवन में परमात्मा ने थोड़ा सा जिस प्रकार का सबका भाग्य बना दिया है तो तुम्हाने दो मार्ग हैं। या तो राजनीति के क्षेत्र में तुम अच्छे स्थान पर पहुंचोगे और अगर अध्यात्म की वृति रही ती एक अवस्था के बाद वहां अवसर है।
होटल चलाया, मकान
मुख्यमंत्री बताते हैं इस बीच बाहूजी का आग्रह था कि थोड़ा बांध के भी रखी, ये पुराने लोगों की अच्छी पद्धति रहती है। नौकरी मिल जाए तब भी अपना काम बंधा करी। बहूजी का भी था कि अगर आप कॉलेज जा रहे हो तो आप कोई अपना काम शुरू करो। एक दुकान जरूर चलाओ। उसके पीछे भाव रहता था कि पढ़ी तो पढ़ो या मत पढ़ो, लेकिन अपने काम धंधे से जीवन आप अच्छे से चलाओ। बाबूजी की बात का पालन मैंने तो फर्स्ट ईयर से ही किया। उन्नीस सी बयासी में मैंने चाय-पोहे की होटल खोली और तीन सखाल उसे चलाया। उसके बाद मुझे लगा कि समय बोड़ा कम पड़ रहा है. मैं पीएमटी में भी सिलेक्ट हो गया। लेकिन परिषद ने कहा कि चुनाव लड़ना है तो तुम बीएससी करों, फिर बीएससी सेकंड ईयर में प्रेसिडेंट लड गया, बहां जीत गया। दुकान भी चल रही थी। बाबूजी सब देख रहे थे। बोले- तुमको बिजनेस तो करने हैं तो ऐसा कनी। तुम्हें सुबह से लेकर रात तक चाय की दुकान में टाइम लगता है। तुम खाने का होटल बोल तो। होटल में फायदा है कि सुबह ग्यारह बजे से दोपहर दो बजे तक चलेगा, फिर तुम्हें गैध मिल जाएगा। इसके बाद शाम को सात बजे बाद होटल चालू होगी। दस म्यारह बजे तक चलेगी। फिर दो तीन साल होटल चली. पर तब तक में प्रदेश मंत्री बन गया। मेरे प्रवास होने लगे, समय नहीं था तब चाबूजी ने कहा ये छोड़ी प्राइवेट मकान बनाकर बेचों। तो फिर हमने प्राइवेट मकान बनाए और बेचे। उसमें एक फायदा मकान रोज नहीं बेचना पड़ता, रोज ग्राहक नहीं करना पड़ता ती सब काम जम गया। बाबूजी के कारण में आर्थिक रूप से स्वावलंबी रहा। उनका कहना था किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना।
बेटी कब बैठने लगी, पता ही नहीं चला
ससुर जी, वे संघ में कार्य करते रहे। वह घर से आठ-आठ दिन्न, दस-दस दिन प्रवास पर निकलते थे। तो उनके घर में आदत थी कि संघ कार्य में जाने में कोई आपति नहीं। यही देख मेरा विवाह हुआ कि यह घर में टाइम कम
देगा। मुझे इस बात का सरोष है कि मेरे परिवार ने कभी इसे अन्यथा नहीं लिया। एक उदाहरण दूंगा मेरी बेटी कर जी आज एक माइनोलोजिस्ट है हॉस्पिटल चलाती है। शादी के बाद में आमतौर पर संगठन के काम से सुबह
सात आठ बजे से घर से निकलता और रात ग्यारह बारह बजे घर पहुंचता। एक दिन में अपने एक दोस्त रावल के बर गया। तब मेरी बेटी छोटी थी आठ महीने की। उनकी माता जी ने मुझसे पूछा बेटा वो बेटी बैठने लगी है क्या? सी
बताना मत कि मुख्यमंत्री के बच्चे हो
डॉ. यादव बताते है कि आनंद ता आया, जब शादी के बाद बच्ची ने कहा उन्हें शादी के बाद हनीमून पर नहीं नर्मदा परिक्रमा पर जाना है। हमने कहा जाओ। तो बड़े बेटे ने कहा कि मैं भी क्या पापा नर्मदा परिक्रमा कर हूँ। मैंने कहा कर लो। तब मेरी बेटी दामाद जो डॉक्टर है, वो बोले हम भी जागने, हमने कहा तुम भी जाओ। लेकिन दी शर्त हैं। तुम जाओ, कोई दिक्कत नहीं। लेकिन तुम लोग कहीं भी यह परिचय नहीं देना कि मुख्यमंत्री वी बेटे-बेटी हो। स्थानीय विधायक, सांसद मंत्री इनको अपनी यात्रा की खबर नहीं करना। नर्मदा परिक्रमा में कोई धर्मशाला या कोई छोटा स्थान लेना और अपनी पूजा पट्टी पूरी करना। मुख्यमंत्री कहते है मुझे सतीध है सब अच्छे से हुआ और इनकी नर्मदा परिक्रमा का जब ओंकारेश्वर में समापन हुआ तब भी में ओंकारेश्वर नहीं गया। मैंने अपने आपकी इस पास से दूर रखा, क्योंकि ये उनकी आत्म याह है।
मेरे को एकदम झटका लगा। मैंने का एक मिनट, एक मिनट मामी। मैं जरा कुछ के बताऊँगा कि मैं जब सुबह निकलता हूँ तो वो सोए रहती है। रात को जब आता हूँ तो सो रही होती है। वो बैठती है. नहीं बैठती। मेरे की नहीं
सामूहिक विवाह में बेटे की शादी
मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. मोहन यादव ने अपने दोनों पुत्री का मिसाल कायम की। एक बेटे का
विवाह सामूहिक विवाह में किया। इस पर उन्होंने कहा मेरे दोनों बेटों का विवाह जब मुख्यमंत्री हूँ. तभी हुआ है। हमारे यहां जब हम संघ में सीखते हैं कि हमारे लिए काम बढ़ा है, लेकिन व्यक्तिमत जीवन में लॉक दिखादे से बचना चाहिए। में भाषण में भी कहता हूँ शादी विवाह में दिखावा मत करो।
क्योंकि बड़ा आदमी बा कार्यक्रम करता तो छोटे पर गलत असर होता है। इसलिए जब बड़े बेटे का विवाह किया तो मैंने पुष्कर में जाकर पचास लोगों के साथ किया। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल जी बोले, मैं
आऊ क्या? इस कार्यक्रम में मेरी इच्छा है। तो मैंने उनको दिनसला से हाथ जोड़कर कहा, आप मत आना, क्योंकि अगर एक मुख्यमंत्री आएंगे तो फिर लाव लश्कर सब आ जाएगा और मजा बिगड़ जाएगा। इसके बाद छोटे बेटे के विवाह की बारी आई। हमने उसे सामूहिक विवाह की
बात बताई। उसने कहा कि पापा मजाक कर रहे है। हमने पूछा तुम्हारी क्या इच्छा है? तो उसने हो की। सामूहिक विवाह करना था तो हमारी मित्र के एक होटल है. उसके वेटर के यहां विवाह होना था, उसे जोड़ा। फिर एक किसान परिवार से बात की। ऐसे करते-करते मेरे ड्राइवर ने कहा, साहब आप हमाले बच्चे का विवाह भी सम्मेलन में कर दी। ऐसे करके इक्कीस जोड़े हो गए और बाइसवां मेरा बेटा, अन्तर आनंद आया। जब यह शादी का मामला बना तो मेरे सारे मुख्यमंत्री मित्रों ने कहा, हम आए क्या? हमने सबसे कहा, भाई साहब, हमने आपको सूचना दी है। आना नहीं है. आओगे तो हमारा सब काम बिगड़ जाएगा।
मालूम। फिर जब में रात को घर गदा मैंने फनी सीमा से पूछा, सीमा ये आकाक्षा बैठने लगी है क्या? जवाब मिता दो महीने पहले से बैठने सीख गई है। यह सब सेक्रिफाइस परिवार में हो जाता है। ये अच्छी बात है।


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