Friday, February 14, 2014

जर्नादन द्विवेदी कांग्रेस में संघ के प्रतिनिधि

जर्नादन द्विवेदी कांग्रेस में संघ के प्रतिनिधि-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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कॉंग्रेस के चोटी के नीति-निर्धारकों में जर्नादन द्विवेदी शामिल हैं। वे प्रभावशाली राष्ट्रीय महासचिव हैं। ऐसी ताकवर हैसियत रखने वाले जर्नादन द्विवेदी का सार्वजनिक रूप से यह कहना कि दलित-आदिवासियों को प्रदत्त जाति आधारित आरक्षण समाप्त करके, आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू किया जाना चाहिये, अनेक लोगों को आश्‍चर्य में डाल सकता है। जिसके चलते अनेक लोगों ने इसके पक्ष-विपक्ष में अपने-अपने तर्कों के आधार पर अनेक आलेख और सम्पादकीय भी लिखे हैं। किन्तु दु:खद आश्‍चर्य तो यह है कि इस बारे में सच को कहने की कोई भी हिम्मत क्यों नहीं जुटाता?
 
आरक्षण विरोधियों का पहला तर्क होता है कि आरक्षण का जिन लोगों को लाभ मिल रहा है, वे लोग इसके सच्चे हकदार नहीं है, वास्तविक हकदारों को आरक्षण का लाभ ही नहीं मिल रहा है। इसमें ‘‘लाभ’’ शब्द गौर करने लायक है, क्योंकि यह ‘‘लाभ’’ शब्द ही भ्रान्तियों का असली कारण है। संविधान को जिन लोगों ने पढा है, वे जानते हैं कि दलित-आदिवासियों को दिया जा रहा आरक्षण उन्हें किसी भी प्रकार का ‘‘लाभ’’ पहुँचाने के लिये दिया ही नहीं गया है। ऐसे में किसे ‘‘लाभ’’ मिला है या किसे ‘‘लाभ’’ मिलना चाहिये, ये सवाल ही अपने आप में बेमानी और असंवैधानिक है, जबकि इसी पर मीडिया में सर्वाधिक चर्चा होती है। जिसका मूल कारण है-चर्चा करने वाले दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों से ग्रसित हैं ही साथ उन्हें संवैधानिक आरक्षण अवधारणा का ज्ञान भी नहीं है। ऐसे लोग दलित-आदिवासियों के विरुद्ध लगातार विष वमन करते रहते हैं। जिन्हें ऊर्जा मिलती है-मनुवादी, संघवादी लोगों से; जिनका एकमेव लक्ष्य इस देश में फिर से मनुवाद लागू करना है।

समझने वाली बात ये है कि आरक्षण का संवैधानिक मकसद दलित और आदिवासी वर्गों को प्रत्येक सरकारी क्षेत्र में सशक्त प्रतिनिधित्व प्रदान करना है। जो तब ही सम्भव है, जबकि पीढी दर पीढी आरक्षित वर्ग के सशक्त लोग नीति-नियन्ता पदों पर पदस्थ हों। इसीलिये इन वर्गों को पदोन्नतियों में प्रदान किया जा रहा आरक्षण न मात्र संवैधानिक है, बल्कि न्यायसंगत भी है।

जहॉं तक जनार्दन द्विवेदी के बयान की बात है तो मैं बहुत पहले से इस बात को कहता और लिखता आया हूँ कि कांग्रेस पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ परोक्ष रूप से अपना कब्जा जमा चुका है। इसी कड़ी में जनार्दन द्विवेदी एक बड़ा नाम है जो कांग्रेस में रहकर संघ-प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे हैं। कांग्रेस को शीघ्रता से ऐसे छद्म संघियों को ढूंढकर बाहर करना होगा, अन्यथा कांग्रेस इस देश से बाहर हो जायेगी। हालांकि अब बहुत देर हो चुकी है।

हम पिछले एक दशक से कांग्रेस को आगाह करते रहे हैं कि कांग्रेस में संघियों का प्रवेश हो चुका है, जिनके मार्फत सत्ता के तीनों स्तम्भों पर संघ का लगातार दबदबा बढ रहा है। एक बार नहीं, बल्कि अनेकों बार सुप्रीम कोर्ट द्वारा दलित-आदिवासी उत्थान विरोधी और संघ की विचारधारा के पोषक असंवैधानिक निर्णय सुनाये गये हैं। जिन्हें संविधान संशोधन के जरिये बार-बार निरस्त करना पड़ता रहा है। इसके उपरान्त भी यदि कांग्रेस हाई कमान की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है और जनार्दन द्विवेदी जैसे लोगों के सहारे कांग्रेस सत्ता पर कायम रहना चाहती है, तो ये असम्भव है!

जहॉं तक आर्थिक आधार पर आरक्षण प्रदान करने की बात है तो दलित-आदिवासियों के सन्दर्भ में तो यह अवधारणा प्रारम्भ से ही गैर कानूनी, असंवैधानिक और अन्यायपूर्ण है, क्योंकि जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया है कि दलितों और आदिवासियों को प्रदत्त आरक्षण का संवैधानिक मकसद उन्हें किसी प्रकार ‘‘लाभ’’ पहुंचाना या उनकी उन्नति करना या उन्हें नौकरी देना मात्र नहीं है, बल्कि हर एक क्षेत्र में उनका सशक्त प्रतिनिधित्व कायम करना है। जिससे कि वे अपने वर्गों के साथ हजारों सालों से किये जाते रहे भेदभाव और अन्याय को कम से कम रोकने में तो सक्षम हो सकें।

इसके विपरीत आर्थिक रूप से विपन्न वर्ग के लोगों में कोई भावनात्मक लगाव नहीं होता है। उदाहरण के लिये गरीबी के आधार पर आरक्षण प्राप्त करने वाले परिवार का व्यक्ति जैसे कि आईएएस बनेगा वह गरीब नहीं रहेगा और ऐसे में क्रीमी लेयर के आधार पर उसे गरीब वर्ग से बाहर कर दिया जायेगा, फिर वह अनारक्षित वर्ग में शामिल हो जायेगा। जो सेवा के दौरान गरीबों के प्रति सवर्ण अनारक्षितों की ही भांति व्यवहार करेगा। जिससे पिछड़े व दमित लोगों का कभी भी उत्थान नहीं होगा। अत: सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े दलित-आदिवासी वर्गों को हर हाल में जाति आधारित आरक्षण प्रदान किया जाना संविधान सम्मत है, जो तब तक कायम रहना चाहिये, जब तक कि इन वर्गों का आनुपातिक और सशक्त प्रतिनिधित्व प्रत्येक स्तर पर कायम नहीं हो जाता है। लगता नहीं इस सदी में ऐसा होने दिया जायेगा। क्योंकि न्यायपालिका के सहयोग से मनुवादी संघियों द्वारा लगातार दलित-आदिवासी प्रतिनिधित्व को हर एक क्षेत्र में हर दिन और लगातार कुचला जा रहा है।

ऐसे में जनार्दन द्विवेदी के असंवैधानिक बयान का अर्थ और तो कुछ भी नहीं है, लेकिन यह कांग्रेस को आगाह जरूर करता है कि वह अपने संगठन में घुस आये संघियों को तत्परता से बाहर करे, अन्यथा कांग्रेस को विनिष्ट होने से बचाना सम्भव नहीं होगा।

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