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मध्य प्रदेश // अतुल सिन्हा
किसी अपराधी को ज़िंदा पकड़ने से कहीं ज्यादा आसान होता है उसे मार गिराना। अब आप इसे एनकाउंटर का नाम दे दीजिए और ये साबित करते रहिए कि पुलिस को मजबूरी में गोली चलानी पड़ी। अगर ऐसे भगोड़ों पर ‘आतंकवादी’ की मुहर है तब तो ये हमारे सुरक्षाबलों और सरकार के लिए बेहद ‘गौरव’ की बात हो जाती है।
भोपाल एनकाउंटर के सच-झूठ पर बहसें चल रही हैं, रोज़ नए-नए खुलासे हो रहे हैं और इस पर होने वाली सियासत शिवराज सरकार के लिए मुश्किलें पैदा कर रही है। लेकिन भला सरकार अपनी पुलिस को कैसे दोषी मान ले या फिर अपनी कार्रवाई को कैसे गलत ठहरा दे। जाहिर है इस एनकाउंटर पर सवाल उठाने वालों को ही सवालों के घेरे में ला दिया गया है।
यहां सवाल यह नहीं कि भागने वाले कैदी कौन थे, सिमी के कार्यकर्ता थे, आतंकवादी थे, तमाम आतंकी घटनाओं के आरोपी थे या फिर इससे पहले भी कई बार जेल से भागने का जुर्म कर चुके अपराधी थे… सवाल यह है कि एक साथ ये आठ कैदी भागे कैसे और सुरक्षाबल इतने चौकस और सक्रिय कैसे हो गए कि चंद ही घंटों में सभी आठों को मौत के घाट उतार दिया। सरकार शाबाशी देने के लिए पहले से तौयार थी, पूरा तंत्र पहले से इस घटना का जैसे इंतजार कर रहा था।

ऐसे में ड्यूटी पर तैनात बेचारा सिपाही रमाशंकर यादव जान गंवा बैठा, बाद में भले ही उसकी शहादत पर पूरी सरकार और पूरा तंत्र सहानुभूति के आंसू बहाता रहा, उसकी महानता के गीत गाता रहा, परिवारवालों को मदद और दिलासे देता रहा और जेल सुरक्षा में हुई चूक पर उठे सारे सवालों को जांच का विषय बताकर दरकिनार करता रहा। घटना की पड़ताल अपने-अपने तरीके से हो रही है। जेल सुरक्षा पर उठ रहे सवालों की जांच चल रही है।
तात्कालिक कार्रवाई के तहत कई अफसरों पर गाज गिरा दी गई है और इस दौरान आए एनकाउंटर के वीडियो से सामने आने वाले तथ्यों की भी जांच हो रही है। इस अहम सवाल को जरूर किनारे करने की कोशिश हो रही है कि आखिर भोपाल सेंट्रल जैसी हाई सिक्योरिटी जेल में इतनी भयानक चूक कैसे हुई। इस जेल में पहले से ही कई आतंकी बंद हैं, यहां तक कि सिमी का मुख्य सरगना माना जाने वाला अबू फैजल भी यहीं बंद है और दूसरे बैरक में आठ और सिमी से जुड़े कैदी। ये सब एक साथ भागने वाले थे लेकिन आठ ही भाग पाए।
यह भी तथ्य सामने आ रहा है कि भोपाल जेल की सुरक्षा के लिए तैनात 160 सुरक्षाकर्मियों में से आधे सुरक्षाकर्मियों को वीआईपी सुरक्षा और मुख्यमंत्री आवास की सुरक्षा में लगा दिया गया था। ये एक गंभीर मामला है और माना जा रहा है कि ये सिलसिला आज से नहीं चल रहा है। जाहिर है ऐसे में जो शातिर कैदी हैं उनके लिए अपनी योजना को अंजाम देना आसान हो जाता है। दरअसल सिमी को लेकर अपने देश में लंबे समय से राजनीति चल रही है।
यहां तक कि दिग्विजय सिंह ने भी साफ कहा है कि उन्होंने यूपीए की सरकार के दौरान भी सिमी और बजरंग दल जैसे कट्टरवादी संगठनों पर प्रतिबंध लगाने की बात कही थी। सिमी पर प्रतिबंध लग गया, लेकिन बजरंग दल जैसे संगठन अपनी मनमानी कर रहे हैं। जाहिर है भाजपा की सरकार में ऐसा नामुमकिन है। अब आने वाले चुनावी वक्त में सिमी और खासकर मुसलमानों के नाम पर चलने वाली राजनीति अभी और जोर पकड़ेगी। उसमें भोपाल एनकाउंटर का मामला गर्म रहेगा।
शिवराज सिंह के लिए यह कोई नई बात नहीं है और न ही भाजपा और संघ परिवार के लिए यह मामला कोई खास मायने रखता है कि एनकाउंटर क्यों हुआ और क्यों नहीं उन्हें ज़िंदा पकड़ने की कोशिश हुई। बेशक जेल की सुरक्षा के नाम पर कुछ चिंताएं जरूर जताई जाएंगी और जांच-वांच होकर कुछ समय में यह मामला भी ऱफा दफा हो जाएगा। लेकिन सरकार के लिए या भाजपा के लिए पीठ थपथपाने के लिए यह उपलब्धि तो ज़रूर गिनाई जाएगी कि देखिए, हमारी पुलिस ने, हमारे सुरक्षाबलों ने क्या कमाल किया, एक साथ आठ आतंकी खत्म कर दिए। अगर मौका मिले तो सभी आतंकियों का काम तमाम कर सकते हैं।
अब इस पर बहस बेमानी है कि सिमी ‘आतंकी’ क्या करने वाले थे, कहां-कहां वारदातों को अंजाम देने वाले थे, उनका पाकिस्तान कनेक्शन क्या है और उनके नाम पर कौन सी पार्टी कितना सियासी फायदा उठाएगी। यह ज़रूर है कि फिलहाल शिवराज की तमाम सभाओं में यह एनकाउंटर एक बड़ी उपलब्धि की तरह गिनाया जाने लगा है औऱ आने वाले वक्त में भाजपा शिवराज सरकार की बहादुरी के इस किस्से को तमाम मंचों पर भुनाने की कोशिश ज़रूर करेगी।

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