Thursday, January 17, 2013

होड़ शेर की खाल ओड़नें की

दलितों के पैगम्बर भीमराव अंबेडकर ने ‘अपनी किताब षूद्रों की खोज में लिखा है कि जिन्हें हम षूद्र कहते वे षूद्र नहीं बल्कि क्षत्रिय है, जिनका ब्राह्मणों की खिलाफत के चलते, ब्राह्मणों ने उपनयन संस्कार करना बंद कर दिया। नतीजतन, वे चौथे वर्ण के रुप में षूद्र कहलाने लगे’, उनकी नजर में उस समय कोई षूद्र नहीं था। क्षत्रियों के कई वंष होते है, जैसे सोमवंषी, रघुवंषी, सूर्यवंषी, यदुवंषी, चन्द्रवंषी वगैरह। इन वंषो का भारत को अजेय बनाने में कितना योगदान रहा, यह सब जानते है, हां! इधर कई सालों से कई शुद्र खुद को क्षत्रिय बताकर, उनके द्वारा ब्राह्मणों को गाली देने की परंपरा चल रही है, महज इसलिए के वे क्षत्रिय थे, ब्राह्मणों की कारिस्तानी के चलते षूद्र बन जलालत झेल रहे हैं। 


     कुरमी कुनबी, लोधी/ लोध, काछी कुषवाहा/कुषवाह, अहीर, पाल, गड़रिया, जाट, गुर्जर गौड़, खांगर आदि अपनी जाति के साथ क्षत्रिय और नाम के साथ सिंह लगाकर खुद को क्षत्रिय कहती हैं। अहीर जाति के लोंगो ने अपना टाइटिल ही बदल लिया है, वे सिंह के साथ यादव लगाकर यही बताते हैं कि वे यदुवंषी क्षत्रिय हैं, यानि श्रीकृष्ण के वंषज। जबकि कुंती ने महाभारत में कृष्ण की चालबाजी के चलते अपने अवैध पुत्र कर्ण की मौत के दुखी होकर यदुवंष के षाप का नाष दिया था, फिर आज के यादव कैसे यदुवंषी हुए ? मान भी लिया जाये कि सारे षूद्र क्षत्रिय हैं, फिर इतने क्षत्रिय के रहते हमारा देष गुलाम क्यों हुआ ? षेर को षेर बताने की जरुरत नहीं होती, ठीक वैसे ही क्षत्रिय को यह कहने की जरुरत नहीं कि वह क्षत्रिय है । 

     स्वामी विवेकानंद ने तो एक कदम आगे निकल कर ऋग्वेद का हवाला देते हुए कायस्थ जाति को षूद क्षत्रिय कहा, यह बात अलग है कि उन्होंने यह साफ नहीं किया कि षुद्धता का मापदंड क्या है? अगर षूद्र क्षत्रिय हैं, तो वैष्य क्यों नहीं। युद्ध से ऊब कर अनेक क्षत्रिय जैन धर्म अपना कर कारोबार करने लगे, वैष्य वर्ण कहीं आसमान से नहीं टपका। निष्चय ही ब्राह्मणों और क्षत्रियों से ही निकल कर लोगों ने कारोबार करना षुरु किया होगा, इस तरह नया वर्ण वैष्य बना होगा। लोग अपनी गाड़ियों पर रघुवंषी, यदुवंषी और क्षत्रिय लिखवा कर चलते हैं कि उनके वषंजों की एक गौरवषाली परंपरा रही है, इसलिए रास्ते से हट जायें?  अगर ऐसा था, तो क्यों हम सैकड़ों साल तक मुगलों की गुलामी करते रहे ? षूद्रों को क्षत्रिय कहलाने के पीछे की सोच सिवाय हीनता दिखानें के अलावा कुछ नहीं, वरना सरदार वल्लभभाई पटेल ने तो कभी नहीं कहा कि मै भी क्षत्रिय हूं। न ही मामूली कद काठी वाले लाल बहादुर षास्त्री ने कहा। इन नेताओं की उपलब्धियों व बरताव पर गौर किया जाये, तो वंषीय क्षत्रिय भी षरमा जाये, भोग विलास के लिए मुगलों के सामने घटने टेकना ही राजपूत या क्षत्रिय की पहचान है, तो क्या जरुरत है षूद्रों को क्षत्रिय कहने की ? 

     क्या षूद्र अपनी काबिलीयत से समाज में अपनी अलग पहचान नहीं बना सकते, जो क्षत्रिय की बैषाखी पर सवार हो रहे है? यह तो अपनी पहचान छिपाने जैसा है। ब्राह्मणों और क्षत्रियों का इतिहास क्या बहुत सम्मान जनक था, जो पूछों (सिंह)के पीछे भाग रहे हैं, पूंछ (सिंह) लगाने से न कोई षेर हो जाता न सियार ।  हां! यह बात अलग हैं कि आरक्षण के लाभ के लिए ये सियार बनने में नहीं षर्माते ? 

गुरु गोविन्द सिंह ने खालसा पंथ बनाया, उसमें हर जाति के लोग थे, जो वकाई षेर थे और मुगलों को नाकों चने चबाने के लिए मजबूर कर दिया, छत्रपति षिवाजी कौन खानदानी षेर थे, उन्हें नहीं कहना पड़ा कि वे क्षत्रिय हैं, उन्होंने साबित कर दिया वे गुणों से क्षत्रिय है। हां राज्याभिषेक के समय ब्राह्मणों ने क्षत्रिय होने का सबूत मांगा, परपंरा कहे या मजबूरी, काषी के एक ब्राह्मण ने उनका राज्याभिषेक किया। यह तो महज एक खानापूर्ति थी, वरना षिवाजी को क्षत्रिय साबित करने के लिए किसी कागजी सबूत की जरुरत नहीं थी। चन्द्रगुप्त मौर्य, गुरुगोविन्द सिंह, छत्रपति षिवाजी वगैरह ने एक कामयाब साम्राज्य खड़ा किया, तो षेर दिल की वजह से, जो पैदायषी उनके खून में था, न कि टाइटिल लगाकर। टाइटल तो स्वांग है, जैसे सियार ने खुद को रंग कर षेर को सांसत में डाल दिया, पर जब असलियत पर आया, तो भाग खड़ा हुआ। 

      माना कि सारे षूद्र क्षत्रिय हैं, तो क्यों नहीं आपस में रोटी बेटी का संबंध रखतें है ? यादवों में कई उप जातियां हैं, जो एक दूसरे को नीचा दिखाने से बाज नहीं आती, षादी विवाह तो दूर की बात है, अगर षूद्र खुद को क्षत्रिय कहते है और किसी वंष से जोडते हैं। तो वे आपरेषन की जगह जख्म ढ़कने का काम करते हैं। सियार अतीत का हवाला दे कर षेर की खाल ओड़ ले तो क्या षेर बन जायेगा ? हमारा गुण ही हमारी पहचान है, क्यों न हम ऐसा गुण पैदा करेें कि लोग कहने को मजबूर हो जाएं कि हम क्या है?  तमाम आंतकवादी घटनाएं होती, सरेआम सड़क पर चीरहरण होता हैं, बाजार में सरेआम लूटपाट होंने अन्याय होने पर आंखे मंूद लेने वाले कितने तथाकथित क्षत्रिय मदद के लिए आते हैं? पीठ पर लिख लेने या गोदना गोदवा लेने से कोई क्षत्रिय नहीं हो जाता। आये दिन बलात्कार, अपहरण डकैती की घटनाएं होती हैं, 

     क्या इनके खिलाफ सिंह आगे आते हैं ? आने को तो कोई भी आ जाता है, अगर हिम्मत हो तो, हिम्मत किसी की बपौती नहीं। चन्द्रषेखर आजाद, भगतसिंह खुदीराम बोस, अब्दुल हमीद या 26/11 का नौजवान षहीद मेजर उन्नीकृष्णन व पांच गोलियां खाकर भी कसाब की गर्दन जकडे़ रहने वाला तुकाराम आंबले क्या क्षत्रिय था ? पूर्वी उत्तरप्रदेष व बिहार के ज्यादातर माफियाओं के नाम के साथ सिंह लगा है। मध्यप्रदेष के रीवा, सतना जिले के ब्राह्मणों का एक तबका अपने नाम के साथ सिंह व तिवारी लगाता है, तो क्या वे वाकई क्षत्रिय हुए, अगर हैं भी, तो ऐसे क्षत्रिय से क्या फायदा, जो षांत प्रिय लोगों को सकून के साथ न जीने दें?

      क्षत्रिय का धर्म है, कमजोरों की हिफाजत करना, क्या क्षत्रियों ने ऐसा किया या कर रहे हैं ? बेहतर होगा षूद्र क्षत्रिय कहलाने का मोह छोड़ें, षूद्र नीचला तबका नहीं, बल्कि मेहनत कष लोगों का ऐसा समूह है, जो हमारे देष की माली तरक्की की रीढ़ है। षूद्र की हीन ग्रंथि न पालें, वर्णों के चक्कर में न पडें़, जो महज एक दूसरे को नीचा दिखाने के सिवा कुछ नहीं। रावण ब्राम्हण था, तो जयचंद राजपूत, इनका चरित्र सब जानते हैं, इतिहास में अनेक घटनाएं हैं। जब राजपूतों ( क्षत्रियों ) ने मुगलांे को पीठ दिखाई, अगर पीठ न दिखाई होती, तो दासता स्वीकार कर कायरता का परिचय न देते। क्षत्रिय या सिंह लिखकर सीना फुलाने से अच्छा है, सच्चे नागरिक होने कर परिचय दें। तभी हमारी और देष की तरक्की होगी । 
  
            
ई वी राम स्वामी नायकर, ज्योतिबा फुले, छत्र पति षाहू जी महराज, डॉ भीवराव अंाबेडकर आदि को ब्रिटिष हुकूमत ने बांटो और राज करो नीति के तहत अपना सियासी हथियार बना लिया था, ये सभी जन्मा दलित नहीं थे। यह कहना है मायावती सरकार के समाज कल्याण विभाग के विषेष सचिव रहे लक्ष्मीकांत षुक्ल का जातिराज में ।  इनका कहना है कि अंग्रेजों ने छत्रपति षाहू जी को अपना मोहरा बनाया, इनके पिता कोल्हापुर रियासत के षिवावंषी राष्ट्र भक्त राजा अप्पासाहेब घाटके थे, षाहू महराज ब्रिटिष हुकूमत के प्रति वफादार थे। वही पेरियार के पिता वेकटानायर दक्षिण भारत के प्रसिद्ध व्यापारी थे, ब्रिटिष सरकार की मेहरबानी से वे नगर मजिस्टेªट और नगर पालिका के अध्यक्ष बने, ये भी अपने पिता की तरह वे अंग्रेजी हुकूमत के भारी खैरवाह बने। पुणे में पैदा हुए महात्मा ज्योदिबा फुले जन्मना दलित नहीं, वरन माली थे। इनके परदादा गोरे पेषवा राज्य में ग्रामसेवक थे। इनके पिता गोविन्द की पुणे में फलों की दुकान थी। यह जाति कभी भी अछूत नहीं नहीं।     
   अनुसूचित जाति की सूची में माली आज भी षामिल नहीं है। डॉ आंबेडकर न तो दलित थे, न अछूत। वे महारवंषी क्षत्रिय थे, भारतीय वर्ण व्यवस्था के मानकों के अनुसार महार भी क्षत्रिय थे। स्वयं मायावती ने अपनी पुस्तक मेरे संघर्षमय जीवन एवं बहुजन मूवेमेंट का सफरनामा में एक स्थान पर पुष्टि की है कि महार राष्ट्र होने के कारण महार राष्ट्र धीरे धीरे महाराष्ट्र हो गया। अरब सागर के तट पर स्थित महारवंषी बहुत वीर और प्रबल पराक्रमी थे। कभी वे वहां षासक हुआ करते थे। ब्रिटिष भारत में भी महारों का एकाधिकार था। डॉ आम्बेडकर के पिता रामोजी मालोजी सकपाल ब्रिटिष सेना में सूबेदार थे, युवावस्था में ही आम्बेडकर अति महत्वाकांक्षी हो गये थे। आम्बेडकर का महारवंषी क्षत्रिय होने का हवाला देनी वाली मायावती खुद दलित नहीं है। वे जन्मना जाटव हैं, जो दलित नहीं वरन क्षत्रिय रहे है, स्वामी आत्माराम की 1887 में प्रकाषित पुस्तक ज्ञानसमु्रद, सुंदरलाल सागर की 1924 में प्रकाषित पुस्तक जाटव जीवन तथा रामनारायण यादवेन्दु की 1942 में प्रकाषित यदुवंष का इतिहास में जाटव को क्षत्रिय कहा गया है।

      यह तीनों लेखक दलित है। 1931 में जाटवों ने जनगणना आयुक्त और वायसराय को ज्ञापन देकर मांग की थी कि जाटवों को चमारों की सूची में षामिल ना किया जाए । वही 1938 में जाटवों ने अपने को चमार जाति से अलग रखने का अभियान चलाया था। लेकिन, ब्रिटिष हुकूमत ने साजिषन आरक्षण और वफीजे का लालच देकर उनकी एक न सुनी। वही बिहार के पासवान अपने को गहलोत क्षत्रिय, खैरवार भी अधिवासी होकर अपने को राजपूत कहते है तो वही हरियाणा के रायकवार राजपूत लिखते है। तमिलनाडु की नाडार जाति ने खुद को क्षत्रिय स्थापित करने का प्रयास किया, लेकिन 1930 के दषक में मद्रास सरकार ने सामुदायिक आधार पर कोटा लागू करने का फैसला किया तो इस जाति ने खुद को पिछ़डी जाति घोषित किये जाने की अर्जी दी।
                                        आर एस पटेल 

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