Thursday, January 5, 2017

शिवराज की जेलों में चंदा उगाही का नारकीय आतंक


TOC NEWS // BY ALOK SINGHAI

भोपाल. दुनिया भर में सुधारगृह कही जाने वाली जेलें शिवराज सिंह चौहान की सरकार के कार्यकाल में चंदा उगाही के नारकीय आतंक का घर बन गईं हैं। इस त्रासदी को भोगने वाले बताते हैं कि वे किसी डॉन की तुलना में जेल के वसूली जल्लादों से ज्यादा भयभीत रहते हैं। ये स्थिति इसलिए बनी है कि शिवराज सिंह सरकार का चंदा वसूली कोटा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसकी पूर्ति के लिए पुलिस विभाग के अफसरों ने जेल विभाग के अफसरों को किनारे बिठाकर वसूली की कमान अपने हाथों में ले ली है।
गृह विभाग से प्रतिनियुक्ति पर जेल महकमें में भेजे गए पुलिस अफसरों ने अपने गुर्गों के हाथों में ये वसूली की कमान थमा दी है। उन्होंने जेल विभाग के अफसरों को तो पद पर बिठा रखा है पर वसूली का ठेका किसी डिप्टी जेलर, चक्कर अधिकारी जैसे कर्मचारी को थमा दिया है। खुद जेल महकमे के अफसर हताश हैं क्योंकि उनके महकमे में पुलिस का दखल बढ़ता जा रहा है। हालत ये है कि पुलिस के अफसर जेल मंत्री तक की बात नहीं सुनते। इसकी जगह गृहमंत्री यदि कुछ कहे तो वो आदेश तत्काल लागू हो जाता है। हालत ये है कि आपराधिक रिकार्ड वाले अफसरों को जेलों की कमान थमा दी गई है, जो अफसर चापलूसी में और नजराना पेश करने में हाजिरी नहीं देते उन्हें किनारे बिठा दिया जाता है।
जस्टिस मुल्ला कमेटी की सिफारिशों में साफ कहा गया है कि जो व्यक्ति आपराधिक प्रकरणों की जांच करेगा वो अपराधी को दंडित नहीं कर सकता। इसीलिए ये जवाबदारी अदालतों को दी गई है। इसके बाद कैदी को जेल विभाग के निर्देशन में सुधार की प्रक्रिया से गुजारा जाता है। जबकि पुलिस के बढ़ते दखल से राजनैतिक विरोधियों को निपटाने का रास्ता सुलभ बना दिया गया है। जेलों में बढ़ते पुलिस के दखल ने जेलों को सुधार गृह के बजाए प्रताड़ना घर बना दिया है जो किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरे का सबब कहा जा सकता है।
भोपाल जेल ब्रेक कांड के बाद जारी हो रहे तुगलकी आदेशों ने भी जेल महकमे की दुर्दशा कर दी है। भोपाल केन्द्रीय जेल से सिमी के आतंकी जब मुठभेड़ में मारे गए तो वे मंहगे जूते पहने हुए थे। पुलिस विभाग के लालबुझक्कड़ी विवेचना कर्ताओं ने कहा कि जूते पहने होने के कारण वे आसानी भाग सके। इस पर कैदियों को जूते के बजाए चप्पल पहनने के आदेश जारी कर दिए गए। अब कड़ाके की ठंड में जब कैदियों के पैरों में बिवाई फट रहीं हैं और उनसे खून रिस रहा है तब भी जेल प्रशासन अपने उसी आदेश पर अटका हुआ है।
मध्यप्रदेश की 39 जिला जेलों और 72 उपजेलों में इस समय सजा याफ्ता 17 हजार 58 कैदी बंद हैं, इसकी तुलना में 21 हजार 300 कैदी महज विचाराधीन का तमगा लिए बंद हैं। यही विचाराधीन कैदी जेल के जल्लाद नुमा वसूली अफसरों की कमाई का बड़ा स्रोत बने हुए हैं। जो विचाराधीन कैदी छोटे अपराध में बंद होता है और जिसे जल्दी जमानत मिलने उम्मीद होती है उससे वसूली का काम जल्दी से जल्दी निपटाया जाता है। कैदी की माली हालत की खबर लाने में वकील और अदालत में तैनात पुलिस विभाग के कर्मचारी बड़ी भूमिका निभाते हैं। जैसा कैदी हो उससे वसूली की इबारत भी उसी तरह लिखी जाती है। प्रदेश में एक भी महिला जेल नहीं है। जेलों में इन दिनों 603 सजायाफ्ता महिला कैदी बंद हैं। जबकि 718 विचाराधीन महिला कैदी भी हैं। ये दैहिक शोषण का साधन तो हैं ही साथ में इनसे वसूली भी की जाती है। अब चूंकि कानून की नजर में वे अपराधी हैं या उन्हें मालूम है कि उनसे अपराध हो गया है तो उनके शोषण का रास्ता आसान हो जाता है।
जेल महकमे में प्रतिनियुक्ति पर आए महानिदेशक संजय चौधरी खुद भोपाल की केन्द्रीय जेल में आए दिन दौरा करते रहते हैं इसके बावजूद इस जेल में जो प्रताड़ना का तंत्र चल रहा है उन्हें वो नजर नहीं आता है। जेल ब्रेक कांड के बाद ब खंड से थोड़े दिनों के लिए चक्कर अधिकारी पद से हटा दिए गए अफसर को वसूली कांड का तजुर्बेकार माना जाता है। एक कैदी मुकेश उर्फ मुक्कू उनका इशारा अच्छी तरह समझता है। अफसर का इशारा मिलते ही मुक्कू जेल में नए नए आने वाले विचारधीन या सजायाफ्ता कैदी से भिड़ जाता है।
पीट पीटकर उसकी ये हालत कर देता है कि नवांतुक डर के मारे कांपने लगता है। इसके बाद मुक्कू के सहयोगी कैदी को बता देते हैं कि यदि तुम्हें जेल में ठीक तरह रहना है तो अपने घर से रुपए बुलाकर चक्कर अधिकारी को दे दो। इस रकम का एक हिस्सा मुक्कू और उसके सहयोगियों को भी मिलता है।घर से पैसे बुलाने के लिए जो फोन दिया जाता है उसके एक काल का चार्ज पचास रुपए होता है। हर सुविधा की कीमत अलग है। यदि जेल में रहते हुए आराम फरमाना है तो डाक्टर साहब हैं न। ये सेटिंग कंपाऊंडर करता है। मात्र दस हजार रुपए में आपको सिक प्रमाण पत्र मिल जाएगा फिर आप बिस्तर पर आराम फरमाईए। ये सुविधा भी तब तक मिलेगी जब तक कोई बड़ा अधिकारी जांच करने नहीं आ जाता। यदि जांच हुई तो सौदा पूरा। अगली सिक के लिए नई फीस फिर देना होगी।
चक्कर अधिकारी का जलवा इतना जोरदार है कि गत 13 दिसंबर को जब सभी लोग सदमें में थे तब एक जेलर ने कैदियों को चक्कर अधिकारी की तारीफ में सुनाया कि वे जेल में हर सुविधा मुहैया करा सकते हैं। बस पैसे देते जाओ तो फिल्मी हीरोईन भी आ जाएगी सेवा में। कैदियों को जेल में बिस्कुट, सिगरेट, गांजा, चरस, फोन जो भी सुविधा चाहिए आसानी से मिल जाती है। कैदियों से जो पैसा वसूला जाता है वो सभी के बीच बंटता है। आंखें मूंदे रखने के लिए जेलर या जेल अधीक्षक को भी निश्चित हिस्सा मिल जाता है। यदि जेल महकमे के आला अधिकारी ने टारगेट दे दिया है तो वो रकम भी कैदियों की पिटाई से जुटाई जाती है।
मजदूरी भी कमाई का एक नायाब स्रोत है। कैदियों को मजदूरी के नाम पर पुताई का जिम्मा दिया जाता है। खेत से सब्जी उगाने और तरह तरह के कामकाज से उसे मजदूरी दी जाती है। पर ये मजदूरी कभी लगातार नहीं मिलती। जेल के रिकार्ड में पुताई का जितना रिकार्ड दर्ज किया जाता है यदि वास्तव में उतनी पुताई कर दी जाए तो जेल की दीवारों पर इंचो में नहीं फुटों में चूने की परत चढ़ जाए।
शिवराज सिंह सरकार के बेटी बचाओ अभियान ने जेलों में बलात्कार के दोषी और विचाराधीन कैदियों की बाढ़ ला दी है। इसकी वजह है कि बलात्कार पीढ़िता तो सरकार की ओर से राहत राशि मुआवजे के रूप में दी जाती है। अक्सर मुआवजे की ये राशि भी महिला को पूरी नहीं मिल पाती । इसका भी बंटवारा हो जाता है, पर जेल को एक फोकट की कमाई का मुर्गा जरूर मिल जाता है। पहले अनुसूचित जाति प्रताड़ना में लोगों को जेल भेजा जाता था अब ये काम महिलाओं की मदद के नाम पर होने लगा है। जिसका फायदा जेलों में खूब लिया जा रहा है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कहते हैं कि उन्हें प्रेस से मिलने वाले फीडबैक की ज्यादा जरूरत नहीं होती वे तो रोज हजारों लोगों से मिलते हैं। उनकी जेलों में कैदियों को किस अमानवीय प्रताड़ना से गुजरना पड़ रहा है ये बात कैदी उनसे बता नहीं सकते और उनके रिश्तेदार उनसे कह नहीं सकते क्योंकि उनके करीबी अभी अदालतों में सुनवाई के दौर से गुजर रहे हैं या फिर उन्हें अपराधी करार दिया जा चुका है। शिवराज सिंह को शायद नहीं पता कि पुलिस किस तरह बेकसूर लोगों पर फर्जी प्रकरण लादकर उन्हें जेलों में धकेलती है। अदालतों में घसीटती है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री कहते हैं कि उन्होंने राजनीति को ढर्रे से बाहर निकालकर पटरी पर ला दिया है। उनके चापलूस मंत्री, अफसर, पत्रकार सभी इसी सुर में सुर मिलाकर उन्हें अहसास कराने की कोशिशों में जुटे हैं कि राज्य में सब अमन चैन चल रहा है। अब इसे राजा का भाग्य ही नहीं तो क्या कहेंगे कि कि उनकी पार्टी भाजपा और सहयोगी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी सब कुछ ठीक ठाक ही नजर आ रहा है। हकीकत में तस्वीर इतनी उजली नहीं है।
(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)

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