दबे पांव नहीं, खुलेआम घुसाया घरों में पोर्न
लीना

और ऐसा करके पत्रिका ने जिस कहानी को परोसा है उसे ही पुरजोर बढ़ावा दे रहा है। यानी खासकर बच्चों में पोर्न के प्रति उत्कंठा जगाना। यही नहीं पत्रिका ने कहां कहां चीजें उपलब्ध हैं सारी जानकारी भी जुटा दी है।
वैसे यह सर्वविदित तथ्य है कि हमेशा से ही व्यस्क लोगों का पोर्न के प्रति रुझान रहा है और वे इसे देखते रहे हैं। घरों में एक परिवार में हर माता पिता अपने बहू- बेटे या फिर घर में रहने वाले किसी भी दम्तत्ति या (इसके उलट) के बारे में जानते हैं कि बंद कमरे में क्या होता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे इसकी सार्वजनिक चर्चा करते हों ? खबर के नाम पर पत्र-पत्रिकाएं और इस बार इंडिया टुडे ने जो किया है वह कुछ ऐसा ही है।
पत्रिका के लिए वैसे यह कोई नई बात नहीं है। खबर या सर्वे के नाम पर अश्लीलता परोसने का काम वह अक्सर ही करता रहा है। सर्वेक्षणों के बहाने अश्लीलता परोसने का कोई मौका नहीं चूके देश के कई प्रतिष्ठित, लोकप्रिय और आमजनों की पत्रिका। वैसे भी पत्रिका ने ‘पोर्न बाजार की काली कहानी’ शीर्षक से इस इंडस्ट्री की वही पुरानी और बार बार दोहराने वाली कहानी छाप कर यह साबित कर दिया है कि वह नई बोतल में पुरानी शराब ही पेश कर रही है। इसे क्या कहें ? खबरों का अभाव, वैचारिक दारिद्र्यता, विचारों-विश्लेषणों का अभाव, या फिर प्रकाशकों- संपादकों की संकीर्ण होती यह सोच कि पाठकों को सिर्फ और सिर्फ अश्लीलता के माध्यम से ही खींचा जा सकता है। या फिर बाजारवाद इतना हावी है और आपको ऐसा लगता है कि सिर्फ अश्लीलता से ही पत्रिकाएं बिकेंगी। और आपको सिर्फ बेचने से ही मतलब है तो फिर क्यों न ‘केवल व्यस्कों के लिए’ पत्रिकाएं निकाली- छापी जाएं ? एक पारिवारिक पत्रिका नहीं। इंडिया टूडे, आउटलुक जैसी पत्रिकाएं पारिवारिक हैं। (अब तक तो लोग यही मानते हैं ।) लेकिन पिछले कई वर्षों के कई अंक किसी भी मायनों में सबके बीच घर की मेज या विद्यार्थियों के स्टडी टेबल पर रखने लायक नहीं थे। शहरी पुरुषों की नजर में कैटरीना कैफ की सेक्स अपील का प्रतिशत बताने के लिए पेड़ों के पीछे जोड़े को प्रेमरत दिखाने का क्या मतलब ? या फिर यौन सर्वेक्षण विशेषांक के आवरण पर लगभग पोर्नग्राफी वाली तस्वीर जरूरी है। यानि जान बूझकर बेमतलब ही परोसी गई अश्ललीता। चर्चा में आने के लिए! माना चर्चा में आए भी। लेकिन क्या यह जरूरी- उचित है ? या पाठकों को सचमुच खींचने में सफल रहे आप- यह तो पत्रों को सोचना ही पड़ेगा।
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लीना,
संपादक, मीडियामोरचा
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