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मृतकों के नाम पर राज्य की कई पंचायतों में आधे-अधूरे शौचालय निर्माण कराकर उनकी राशि को हड़पने का सिलसिला भी यहाँ जारी
भोपाल। मध्यप्रदेश में जबसे भारतीय जनता पार्टी की सरकार सत्ता पर काबिज हुई तबसे लेकर इस सरकार की सत्ता के १३ वर्षों और खासकर ११ वर्षों के शासनकाल में विकास के नाम पर यूँ तो बड़े-बड़े ढिंढोरे पीटे गए तो वहीं जो सरकार भय, भूख और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देने के वायदे के साथ सत्ता पर काबिज हुई थी उसी सरकार के कार्यकाल के इन १३ वर्षों में भ्रष्टाचार के नये-नये रिकार्ड स्थापित हुए हैं फिर चाहे वह व्यापमं या डीमेट का मामला हो जिसके चलते हजारों नौनिहालों के भविष्य पर इस सरकार की कार्यप्रणाली के चलते प्रश्नचिन्ह लग गया हो या फिर भाजपा शासन द्वारा किसानों की खेती को लाभ का धंधा बनाने के पीटे जा रहे ढिंढोरे के चलते किसानों को दलालों और प्रशासनिक क्षेत्र में बैठे अधिकारियों की मिलीभगत से विभिन्न योजनाओं में सब्सिडी के नाम पर आकर्षित कर किसानों को कर्जदार बनाने का जो गोरखधंधा बड़े ही सुनियोजित ढंग से पूरे प्रदेश में चल रहा है
जिसके चलते किसान बैंकों के कर्जे में फंसकर अपनी खेती बेचने में लगा हुआ है तो वहीं इसका लाभ सत्ताधीशों के परिजन उन कर्ज से दबे किसानों की खेती को औने-पौने दामों में खरीदने में लगे हुए हैं जिसका जीता जागता उदाहरण है रायसेन, सीहोर, विदिशा के किसान जिनकी बेशकीमती जमीनें सत्ताधीशों के परिजनों ने औने-पौने दाम पर खरीदने में लगें हुए हैं। हालांकि इस सबके साथ-साथ इस प्रदेश में भाजपा के शासनकाल के दौरान एक नारा भी गूंज रहा है, जिसमें सबका साथ सबका विकास की जो परिकल्पना सामने आ रही है
उसके चलते भाजपा के कई ऐसे नेता और कार्यकर्ता जिनके पास इस शासन के पहले टूटी साइकिल खरीदने तक की स्थिति नहीं थी आज वह आलीशान भवनों और लग्जरी कारों में फर्राटे भरते नजर आ रहे हैं तो वहीं राज्य के ऐसे कई अधिकारी और कर्मचारियों की तो बात छोड़ो राज्य के समिति सेवक भी सबका विकास सबके साथ की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए करोड़ों में खेल रहे हैं तो वहीं लग्जरी वाहन पजेरो के भी मालिक हैं, लगभग यही स्थिति राज्य के सरपंचों की भी है। लेकिन इसके बावजूद भी राज्य के मुख्यमंत्री अक्सर यह ढिंढोरा ठीक उसी तरह से पीटते हैं
जिस तरह से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु अपने कार्यकाल के दौरान यह कहा करते थे कि भ्रष्टाचारियों को खंभे से लटका दिया जाए लेकिन आजादी के बाद शायद ही देश में ऐसा कोई उदाहरण सामेन आया हो जिसमें भ्रष्टाचारी को खंभे पर लटकाने की सजा दी गई हो, ठीक इसी तरह से हमारे अति लोकप्रिय और जन-जन के हितकारी मुख्यमंत्री भी अक्सर यह ढिंढोरा पीटते हैं कि भ्रष्टाचारियों को बक्शा नहीं जाएगा लेकिन इसी भाजपा शासनकाल के दौरान नौ से अधिक ऐसे कर्मचारी और अधिकारी मिल जाएंगे जो लोकायुक्त के शिकंजे में फंस चुके हैं लेकिन मजे की बात यह है कि जो मुख्यमंत्री भ्रष्टाचारी को बक्शा नहीं जाएगा का ढिंढोरा पीटते हैं,
उन्हें के राज्य में अब लोकायुक्त का पद कई महीनों से खाली है, लेकिन उसे भरने की प्रक्रिया नहीं अपनाई जा रही है तो वहीं लोकायुक्त के द्वारा भ्रष्टाचार से घिरे अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति के लिये वर्षोंे से फाइल मंत्रालय में धूल खा रही है लेकिन शासन उनपर कार्यवाही करने की स्वीकृति नहीं दे रहा है जिस राज्य में भ्रष्टाचार के मामले में इस तरह की स्थिति हो तो उस राज्य में नरेन्द्र मोदी के द्वारा स्वच्छता अभियान के नाम पर गड़बड़झाला क्यों न हो यह कैसे संभव हो सकता है।
सबका विकास सबके साथ के परिकल्पना को आगे बढ़ाते हुए राज्य के कई ग्रामीण क्षेत्रों में सरपंच और सचिवों के साथ-साथ जिले के अधिकारियों की मिलीभगत के चलते जिन व्यक्तियों की मौत सालों पहले हो गई है उनके नाम पर भी शौचालय बनाने का इतिहास भी इस प्रदेश में रचा गया तो वहीं ऐसे लोगों के नाम पर भी इस प्रदेश में शौचालय बनाये गये जो वर्षों पहले अपना गांव छोड़कर चले गये लेकिन उनके और मृतकों के नाम पर राज्य की कई पंचायतों में आधे-अधूरे शौचालय निर्माण कराकर उनकी राशि को हड़पने का सिलसिला भी यहाँ जारी है। खैर यही सबका विकास सबके साथ की परम्परा की परिकल्पना की अवधारणा है जिसमें विकास तो ऐसे ही चल रहा है और सरकार इस प्रदेश को इसी रणनीति के चलते कर्ज दर कर्जदार बनाया जा रहा है तो वहीं राज्य के खाली खजाने से जश्न मानने का भी दौर जारी है?

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