TOC NEWS // गंगा पाठक
जनसंपर्क विभाग हैं कहां साहब! अब तो जनसंपर्क के नाम पर कथित महत्वपूर्ण लोगों की चापलूसी करने वाला एक गिरोह चल रहा है। इस गिरोह के मन में जो आता है, वही किया जाता है। जहां तक पत्रकारों की बात है तो मध्यप्रदेश में जनसंपर्क विभाग ने पत्रकारों को जाने कब का हाशिये में रख दिया है। पत्रकारों की परिभाषा बदल दी गई है, वरिष्ठता के मापदण्ड विसर्जित कर दिये गये हैं, अधिमान्यता की बोली लगाई जा रही है। इस सबके बावजूद सब खामोश हैं।
सरकार खामोश है, सूचना मंत्री और उनका मंत्रालय खामोश है, पत्रकारों के कथित संगठन खामोश हैं। इन लोगों की खामोशी तो एक हद तक बर्दाश्त की जा सकती है। लेकिन सबसे बड़ी विडम्बना यह कि मध्यप्रदेश का पत्रकार खामोश है, कलम की धार खामोश है, श्रमजीवी खामोश है। इस खामोशी को तोडऩा होगा, कलम की धार बिचौलियों के आगे कमजोर पड़ गई है, इस मिथक को तोडऩा होगा।
जनसंपर्क विभाग बुरी तरह बीमार है, उसकी सोच फालिज का शिकार है, उसकी कार्यशैली में चापलूसी और दलाली की गंध आती है, उसकी नीतियों में पत्रकारों को छोड़कर सब कुछ नजर आता है। ये मध्यप्रदेश है हुजूर, जहां पत्रकारों को छोड़कर चाहे जिसको अधिमान्यता की रेवड़ी दी जाती है, जहां आधे से ज्यादा अधिमान्यताएं उन चेहरों पर चिपकाई गई हैं, जो या तो अवांछित गतिविधियों में संलिप्त है, या फिर जिनका पत्रकारिता से दूर-दूर तक सरोकार नहीं रहा।
ये खेल लगातार जारी है। ईमानदारी से काम करने वाले श्रमजीवी पत्रकार न तो अच्छा पारिश्रमिक प्राप्त कर पाते हैं और न अधिमान्यता! दूसरी ओर चापलूसी और दलाली की भरपूर कीमत वसूलने वाले अधिमान्यता का तमगा मुफ्त में पा जाते हैं। इसी वजह से अखबार के संचालकों को अपनी जेब में रखने की दम्भोक्ति का उद््घोष करने वाले जनसंपर्क विभाग को पत्रकारिता में पत्रकार छोड़ सब दिखता है।
जब अधिमान्यता के लिये यह गोरखधंधा चल रहा हो तो अधिमान्यता देने के लिये गठित समितियों के गठन और उसके वजूद पर सवाल उठाना बेमानी है। अधिमान्यता ही जब एप्रोच और चाललूसी की कसौटी पर परख कर दी जा रही है तो इन कमेटियों में स्थान देने की नीति इससे परे नहीं हो सकती। सब कुछ हो रहा है, बेखटके हो रहा है। ऐसा नहीं है कि सही मायनों में पत्रकारिता करने वाले पत्रकार अधिमान्य पत्रकारों की सूची में नहीं हैं, ऐसा नहीं कि मध्यप्रदेश में तमाम पत्रकार जनसंपर्क विभाग की आरती गा रहे हैं और ऐसा भी नहीं है कि मध्यप्रदेश की पत्रकारिता की धार के आगे जनसंपर्क विभाग का कोई अस्तित्व है।
दरअसल मध्यप्रदेश के पत्रकारों ने मध्यप्रदेश जनसंपर्क की अधिमान्यता की मान्यता को ही नकार दिया है। साफ लफ्जों में मध्यप्रदेश में अधिमान्यता की मान्यता पत्रकारों ने निरस्त कर दी है। अब पत्रकारों से ज्यादा चिन्ता सूचना मंत्रालय और मध्यप्रदेश सरकार को होना चाहिये कि वे सरकारी अधिमान्यता को पुन: मान्यता किस तरह दिलवायें, अधिमान्यता का सम्मान उठाने के लिये कौन से कदम उठाये जाएं। हम पत्रकारों को चाहिये कि जनसंपर्क में चल रहे तथाकथित गुटों को बेनकाब कर दें, हम पत्रकारों को चाहिये कि अंदर से काले चेहरों पर डली सफेद नकाबों को नोंच लिया जाये। और पत्रकारों को चाहिये कि पत्रकारों के नाम पर हर साल खर्च होने वाली भारी भरकम राशि को डकारने वाले इस विभाग से हमेशा-हमेशा के लिये खदेड़ दिये जाएं।
अब यही होगा। हम सबको मिलकर यही करना चाहिये। जिसके पास जो अधिकृत जानकारी हो, उसे वह सार्वजनिक करे, घोटाले सप्रमाण सामने लाये जायें, अपने पत्रकार संगठनों को उन पर ज्ञापन सौंपने को कहा जाये और जब तक 'दे दनादनÓ वाली कार्रवाई न हो, कोई खामोश न बैठे। यदि हमने ऐसा नहीं किया तो हम भी 'कथित पत्रकारोंÓ की सूची में शामिल माने जायेंगे और सरकार पत्रकारों पर होने वाले भारी भरकम खर्च की बदौलत हमें भी 'चोर चोर मौसेरे भाईÓ वाली कहावत में शामिल कर लेगी।

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