Friday, April 7, 2017

बाबरी मस्जिद मामला : CBI ने कहा आडवाणी-जोशी पर हो ट्रायल | सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

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  • 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले में हो रही सुनवाई
  • पहले कोर्ट ने कहा था कि टेक्नीकल ग्राउंड पर इनको राहत नहीं दी जा सकती
  • मामले की सुनवाई भी दो के बजाय एक ही जगह होनी चाहिए


1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले में CBI ने आज सुप्रीम कोर्ट में कहा कि बीजेपी के वरिष्‍ठ नेता लालकृष्‍ण आडवाणी, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती समेत 13 नेताओं के खिलाफ आपराधिक साजिश का ट्रायल चलना चाहिए. सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि रायबरेली की कोर्ट में चल रहे मामले को भी लखनऊ की स्पेशल कोर्ट के साथ ज्वाइंट ट्रायल होना चाहिए. इलाहाबाद हाईकोर्ट के साजिश की धारा को हटाने के फैसले को रद्द किया जाए. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि हम इस मामले को रायबरेली से लखनऊ ट्रांसफर कर सकते है. कोर्ट ने कहा कि हम इंसाफ करना चाहते हैं.

सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की अर्जी पर सुरक्षित रखा. अब सुप्रीम कोर्ट ये तय करेगा कि आडवाणी समेत 13 नेताओं पर साजिश का मुकदमा चलेगा या नहीं. रायबरेली ट्रायल को भी लखनऊ ट्रांसफर किया जाए या नहीं इस पर फैसला किया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये मामला 25 साल से लंबित पड़ा है. अब ये मामला दो साल में पूरा होना चाहिए. हम इस मामले में ट्रायल का जजमेंट नहीं सुना रहे सिर्फ कानूनी प्रक्रिया पर फैसला दे कहे हैं.

इससे पहले पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि महज टेक्नीकल ग्राउंड पर इनको राहत नहीं दी जा सकती और उनके खिलाफ साजिश का ट्रायल चलना चाहिए. साथ ही पूछा था कि बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले दो अलग अलग अदालतों में चलने के बजाय मामले की सुनवाई एक जगह क्यों न हो? कोर्ट ने पूछा था कि रायबरेली में चल रहे मामले की सुनवाई को क्यों न लखनऊ ट्रांसफर कर दिया जाये. जहां कारसेवकों से जुड़े एक मामले की सुनवाई पहले से ही चल रही है.

वहीं लालकृष्ण आडवाणी की ओर से इसका विरोध किया गया. कहा गया कि इस मामले में 183 गवाहों को फिर से बुलाना पड़ेगा जो काफी मुश्किल है. कोर्ट को साजिश के मामले की दोबारा सुनवाई के आदेश नहीं देने चाहिए.

दरअसल आडवाणी, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी, और बीजेपी, विहिप के अन्य नेताओं पर से आपराधिक साजिश रचने के आरोप हटाए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है. इन अपीलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 20 मई 2010 के आदेश को खारिज करने का आग्रह किया गया है. हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के फैसले की पुष्टि करते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक साजिश) हटा दिया था. पिछले साल सितंबर में सीबीआई ने शीर्ष अदालत से कहा था कि उसकी नीति निर्धारण प्रक्रिया किसी से भी प्रभावित नहीं होती और वरिष्ठ भाजपा नेताओं पर से आपराधिक साजिश रचने के आरोप हटाने की कार्रवाई उसके (एजेंसी के) कहने पर नहीं हुई.

सीबीआई ने एक हलफनामे में कहा था कि सीबीआई की नीति निर्धारण प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र है. सभी फैसले मौजूदा कानून के आलोक में सही तथ्यों के आधार पर किए जाते हैं. किसी शख्स, निकाय या संस्था से सीबीआई की नीति निर्धारण प्रक्रिया के प्रभावित होने या अदालतों में मामला लड़ने के उसके तरीके के प्रभावित होने का कोई सवाल नहीं है.


क्या है मामला

-1992 में बाबरी मस्जिद गिराने को लेकर दो FIR 197 और 198 दर्ज की गई
- 197 कार सेवकों के खिलाफ दर्ज की गई
- जबकि 198 मस्जिद से 200 मीटर दूर मंच पर मौजूद नेताओं के खिलाफ दर्ज की गई
- यूपी सरकार ने 197 के लिए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से इजाजत लेकर ट्रायल के लिए लखनऊ में दो स्पेशल कोर्ट बनाई
- जबकि 198 के लिए रायबरेली की कोर्ट में मामला चला
- 197 केस की जांच सीबीआई को दी गई जबकि 198 की जांच यूपी सीआईडी ने की.
- 198 के तहत रायबरेली में चल रहे मामले में नेताओं पर 120 B FIR में नहीं था लेकिन 13 अप्रैल 1993 में पुलिस ने चार्जशीट में आपराधिक साजिश की धारा जोड़ने की कोर्ट में अर्जी लगाई. कोर्ट ने इसकी इजाजत दे दी.
- इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका लगाई गई जिसमें मांग की गई कि रायबरेली के मामले को भी लखनऊ स्पेशल कोर्ट में ट्रांसफर किया जाए
- लेकिन 2001 में हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में ज्वाइंट चार्जशीट भी सही है और एक ही जैसे मामले हैं
- लेकिन रायबरेली के केस को लखनऊ ट्रांसफर नहीं किया जा सकता क्योंकि राज्य सरकार ने नियमों के मुताबिक 198 के लिए चीफ जस्टिस से मंजूरी नहीं ली
- केस सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. पुनर्विचार और क्यूरेटिव पेटिशन भी खारिज कर दी गई.
- रायबरेली की अदालत ने बाद में सभी नेताओं से आपराधिक साजिश की धारा हटा दी.
- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 20 मई 2010 को आदेश सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा.
- 2011 में करीब 8 महीने की देरी के बाद सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी
- 2015 में पीडि़त हाजी महमूद हाजी ने भी सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर की.

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