Friday, August 2, 2013

नरेंद्र मोदी (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड

By हर्षवर्धन त्रिपाठी 
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नरेंद्र मोदी के विरोधी और समर्थक जितने मुखर हैं उतने शायद भारतीय राजनीति में कभी किसी नेता के नहीं रहे। नरेंद्र मोदी के विरोधी ऐसे कि गलती से कोई छोटी सी बात भी मोदी के खिलाफ हो तो उसको पहाड़ बनाने में नहीं चूकते और समर्थक भी ऐसे कि देश की हर समस्या की रामबाण औषधि मोदी को ही मानते हैं। फिर कोई नरेंद्र मोदी के रास्ते में बाधा बनता दिखता है तो, उसकी मिट्टी पलीद करने से भी नहीं चूकता। फिर वो चाहे नोबल पुरस्कार विजेता, भारत रत्न अमर्त्य सेना ही क्यों न हों। यहां तक कि पत्रकार से नेता बने चंदन मित्रा जैसे लोग भी बहककर दोबारा एनडीए की सरकार आने की आशा में अमर्त्य सेन से भारत रत्न छीनने तक की बात कर बैठते हैं।

हालांकि, बाद में वो माफी मांग लेते हैं। लेकिन, अभी टीवी पर जो चेहरे नरेंद्र मोदी के समर्थक के तौर पर नजर आते हैं उनकी बात ही इस सहमति के बाद शुरू होती है कि नरेंद्र मोदी ही प्रधानमंत्री बनकर देश की सारी समस्याओं को सुलझा सकते हैं। ऐसा ही नरेंद्र मोदी की सोशल मीडिया ब्रिगेड का है। दरअसल नरेंद्र मोदी का करिश्मा ही कुछ ऐसा है। नरेंद्र मोदी का बोलना करना उनके समर्थकों को अंधभरोसा देता है कि वो जो चाहेंगे कर देंगे। और, यही अंधडर उनके विरोधियों को देता है कि वो जो चाहेंगे कर देंगे। इसीलिए समर्थक मोदी के आने से कम कुछ नहीं बर्दाश्त कर पा रहे और विरोधी मोदी के अलावा किसी भी और पर मान जाने को तैयार बैठे हैं। नरेंद्र मोदी ने एक काम तो कर दिया है कि गुजरात में जो स्थिति तैयार की थी। वैसी ही स्थिति देश में तैयार कर दी थी।

गुजरात विधानसभा के पिछले चुनाव यानी 2007 के दौरान मैं वहां कवरेज पर था। कारोबारी चैनल के लिए स्टोरी कर रहा था इसलिए कारिबोरियों के संपर्क में ज्यादा था। राजकोट, जामनगर और अहमदाबाद में कारोबारी नरेंद्र मोदी को राजा जैसी सत्ता दे देने के पक्ष में थे। क्योंकि, उनका मानना था कि मोदी के अलावा कोई नहीं जो इतनी आसानी से कारोबार के मौके दे सके। कुछ ऐसी ही राय गैर कारोबारियों की भी थी कि जीवन को सुखमय करने का बेहतर रास्ता मोदी ही खोज सकते हैं। लेकिन, उसी चुनाव कवरेज के दौरान भावनगर के हीरा व्यापारी और अलंग पोर्ट के कारोबारी भी मिले जिनका ये मानना था कि नरेंद्र मोदी का शासन उनके कारोबार के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। और उनके जीवन की बदहाली के रास्ते और पुख्ता कर रहा है। वजह साफ थी कि अलंग पोर्ट के कारोबारियों से नरेंद्र मोदी का संतुलन नहीं बैठ पाया था।

वैसे तो किसी भी ताकतवर नेता के साथ या खिलाफ वाला फॉर्मूला तगड़े से काम करते हैं लेकिन, नरेंद्र मोदी ने मेरे साथ या मेरे खिलाफ वाली अवधारणा को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। इतना कि लालकृष्ण आडवाणी जैसे ताकतवर नेता के घर के सामने मोदी के पक्ष में लोग नारे लगाने पहुंच गए। इतना ही नहीं लालकृष्ण आडवाणी दिल्ली में बीजेपी के अनुसूचित मोर्चे के कार्यक्रम में रिकॉर्डतोड़ नतीजे बीजेपी के पक्ष में आने का अनुमान लगा रहे थे तो, ट्विटर पर एक मोदी समर्थक महिला लिख रही थी बुड्ढा बोल रहा है शाम को टीवी पर डिबेट कराएगा। ये महिला कुछ देर पहले ही गोविंदाचार्य को भी गरिया चुकी थीं। गुजरात में नरेंद्र मोदी 5 करोड़ गुजरातियों की बात करते थे। अब इंडिया फर्स्ट की बात कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी के खिलाफ बेवजह 2002 दंगों का भूत उनके विरोधियों ने ऐसे मजबूत किया कि नरेंद्र के उत्साही समर्थकों की कतार बड़ी होती चली गई। हालांकि, अब उन्हीं समर्थकों का अतिउत्साह कई मोदी समर्थकों को विरोधी लाइन में भी खड़ा कर रहा है।

2007 विधानसभा चुनाव के दौरन मैंने वहां जो महसूस किया था कि नरेंद्र मोदी ने खुद को एक ऐसे ब्रांड के तौर पर स्थापित कर लिया था। जहां गुजरात को बेहतर तरीके से चलाने-बनाने की एकमात्र किरण मोदी दिखने लगे थे और ऐसे में फिर कोई केशुभाई पटेल, कांशीराम राणा, शंकर सिंह वाघेला, प्रवीण तोगड़िया वाली विहिप अगर नरेंद्र मोदी के रास्ते में बाधा बनते दिख रहे थे तो, गुजराती उसे दुश्मन मानने लगते थे। यही वजह थी कि जिस 2002 के लिए नरेंद्र मोदी को अभी अभी भी सबसे ज्यादा चुनौतियां झेलनी पड़ रही हैं। उसके असल आधार रहे विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया भी जब नरेंद्र मोदी की राह में बाधा दिखने लगे तो, बीजेपी और संघ का खांटी कैडर भी तोगड़िया का साथ छोड़ मोदी के साथ खड़ा हो गया। यहां तक कि संघ के एक राष्ट्रीय अधिकारी के पुत्र भी नरेंद्र मोदी का विरोध करके गुजरात में काम करने की स्थिति में नहीं रहे।

राष्ट्रीय परिदृष्य में भले ही सीधे तौर पर केशुभाई पटेल, कांशीराम राणा, शंकर सिंह वाघेला और प्रवीण तोगड़िया वाली विहिप सीधे तौर पर न दिख रही हो लेकिन, हालात कमोबेश वैसे ही बन गए हैं। फैसला लेने वाली बीजेपी की सर्वोच्च संस्था में जब तक नरेंद्र मोदी नहीं थे तब तक लालकृष्ण आडवाणी ही सबकुछ थे। यहां तक कि संघ के खांटी समर्थन से अध्यक्ष बने नितिन गडकरी ने भले ही बैठकों को आडवाणी के 30 पृथ्वीराज रोड के घर से उठाकर 13 तीनमूर्ति लेन ले आए लेकिन, सच्चाई यही थी कि बैठक से पहले और आडवाणी के इशारे से संसदीय बोर्ड की फैसला भी हिला रहता था या आशंकित रहता था। अब सबको गोवी की बीजेपी बैठक के समय 30 पृथ्वीराज रोड के सामने का वो दृष्य तो याद ही रहेगा जिसमें पता नहीं कौन कौन सी खांटी हिंदू सेना का दावा करने वाले लोग आडवाणी के विरोध और नरेंद्र मोदी के पक्ष में नारे लगा रहे थे। गुजरात के बापा केशुभाई की तरह बीजेपी के लौह पुरुष को नरेंद्र मोदी की तगड़ी चुनौती थी। इसके पहले भी हालांकि, मोदी ने सद्भावना उपवास और आडवाणी की भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा के समय मोदी के साथ या विरोध में रहने वाली अवधारणा को मजबूती दे दी थी। लेकिन, सबसे तगड़ी चोट दिल्ली में 30 पृथ्वीराज रोड पर ही लगी।

अब नरेंद्र मोदी इंडिया फर्स्ट की बात करने लगे हैं। नरेंद्र ने परिवार की जमी जमाई जमीन (शाखा) से आगे बढ़कर तकनीक को पकड़ा। सोशल मीडिया के जरिए हैलो हाय करने और अपनी ऊटपटांग तस्वीरे, वीडिया साझा करने वाले उन नौजवानों को पकड़ा जिनके लिए राजनीति मतलब चवन्नी छाप बात थी। उन नौजवानों के दिमाग में ये फिट कर दिया कि ये जौ मौज की जिंदगी है ये चलने वाली नहीं अगर नरेंद्र मोदी नहीं आया। क्योंकि, नरेंद्र मोदी आएगा तो इंडिया फर्स्ट कंपनी का मुनाफा तेजी से बढ़ेगा तुम नौजवानों के हाथ में ढेर सारी नौकरियां, जेब में जमकर पैसे और जिंदगी में हर सुविधा होगी।5 करोड़ गुजराती की बात नरेंद्र मोदी करते हैं भले ही मोदी को जो वोट मिले हैं वो इससे काफी कम हैं। लेकिन, गिरी हालत में भी एक करोड़ मुखर गुजराती मोदी के समर्थन में ऐसे बोलते हैं कि गैर मुखर उससे कई गुना गुजरातियों के नेता भी नरेंद्र मोदी ही दिखते हैं। गुजरात को मोदी ने वाइब्रैंट गुजरात नरेंद्र मोदी प्राइवेट लिमिटेड बना दिया। 

जिसे सीईओ नरेंद्र मोदी ज्यादा से ज्यादा मुनाफा दिलाया है। इसीलिए गुजरात के एक बड़े वर्ग को मोदी के खिलाफ कही गई कोई भी बात यहां के विकास में अड़ंगा जैसा लगता है। अब जैसे वाइब्रैंट गुजरात को नरेंद्र मोदी प्राइवेट लिमिटेड बनाने के लिए गुजरात के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स (विधानसभा) में मोदी के इतने मेंबर्स शामिल करने की जरूरत थी जो, मोदी को गुजरात का मुनाफा बढ़ाने के लिए उन्हें सीईओ और चेयरमैन (मुख्यमंत्री) की कुर्सी सौंप देगा। मोदी के बाइब्रैंट गुजरात का साल दर साल प्रॉफिट 10 प्रतिशत से ज्यादा की रफ्तार से बढ़ रहा है। वाइब्रैंट गुजरात में काम करने वाले कर्मचारियों (आम जनता) को हर साल अच्छा इंक्रीमेंट मिल रहा है। पूरे गुजरात में सड़कें-बिजली-पानी सब कुछ लोगों को देश के दूसरे राज्यों से अच्छे से भी अच्छा मिल रहा है। गांवों में भी कमोबेश हालात देश की दूसरी कंपनियों (राज्यों) से अच्छे हैं।

कांग्रेस (पहले के सीईओ) के गुजरात को मोदी (नए सीईओ) ने वाइब्रैंट गुजरात बना दिया है। नए सीईओ के परिवार के कुछ बुजुर्ग भी (भाजपा, संघ, विहिप के नेता) कह रहे हैं कि जब से इस बच्चे को कमान सौंपी गई ये फैसलों में किसी की सुनता ही नही। लेकिन, अब शेयर होल्डर्स (जनता) इनकी सुनते नहीं दिख रहे। अब यही फॉर्मूला नरेंद्र मोदी देश पर लागू करने की कोशिश में लगे हैं। काफी हद तक सफल भी हैं। इस बात का अंदाजा परिवार के बुजुर्गों (भाजपा, संघ, विहिप के नेता) को लग गया इसीलिए वो परिवार के सबसे तेज बच्चे पर दांव लगाने के लिए पूरी तरह तैयार हो गए। उन्हें पता है कि परिवार का नाम तो बढ़ेगा इसी के जरिए भले हमारी इसके बाद कम सुनी जाए लेकिन, परिवार का प्रतिष्ठा बढ़ने वाली है।

ये नौजवान भारतीय लोकतंत्र के सोते-जागते वाले पहरेदार थे। मोदी ने इन्हें जगा दिया है। ऐसा जगाया कि अब ये हैलो हाय, तस्वीरें, वीडियो अपलोड करने से पहले नमो-नमो जपने लगे हैं। नमो मंत्र को किसी ने अशुद्ध किया तो, उसका क्रियाकर्म करने को तैयार हो जाते हैं। पुराने बीजेपी के नेता गुजरात बीजेपी के नेताओं की तरह यूनियन यहां भी बना रहे हैं। बीजेपी के ‘शत्रु’ नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुखर हो गए हैं। स्थापित हो चुके दुश्मनों से हाथ मिला रहे हैं। लेकिन, नरेंद्र मोदी ने आजमाया फॉर्मूला ऐसा पका लिया है कि नीचे से आवाज आई तो, ये क्या कर लेंगे। बस मोदी की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि पुराने दमदार बीजेपी के सीईओ से ज्यादा बोर्ड डायरेक्टर्स वो कैसे चुनवा पाते हैं। खराश वाले गले से बीजेपी के पुराने सीईओ अभी भी बीजेपी के 2 से 184 वाली कहानी दोहराते रहते हैं। अब मोदी कैसे 543 वाली संसद में कम से कम 200 से ज्यादा सदस्य चुनवा पाते हैं ये सबसे बड़ी बात होगी। क्योंकि, पुराने सीईओ अब परिवार के समर्थन और परिवार के बाहर मोदी के डर से बने पक्के समर्थन के भरोसे बैठे हैं।

एक मुश्किल और है वाइब्रेंट गुजरात में कब्जे के लिए जो 51 प्रतिशत हिस्सेदारी चाहिए थी उससे छिटपुट शेयरधारक नहीं थे। इंडिया फर्स्ट में कांग्रेस बीजेपी दो बड़े शेयरधारक हैं लेकिन, छोटे-छोटे शेयरधारक मिल जाएं तो इन दोनों के बड़े शेयरधारकों से भी बड़े होने का खतरा है। इसीलिए नरेंद्र मोदी वही स्मार्टफोनपर गेम खेलने वाले नौजवानों को जगा रहे हैं जो, वोट करने के अधिकारी हैं करते नहीं हैं। उन्हें समझा रहे हैं कि पूरी ताकत दोगे तभी हम सीईओ बन पाएंगे और वाइब्रेंट गुजरात की तरह इंडिया फर्स्ट नरेंद्र मोदी प्राइवेट लिमिटेड का मुनाफा जमकर बढ़ाएंगे। जो इंडिया फर्स्ट में अपने मुनाफे देख रहे हैं वो नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक हैं। जो इंडिया फर्स्ट में अपने अधिकारों को एकदम समाप्त होता देख रहे हैं वो मोदी के घोर विरोधी हैं। दोनों के हित पूरी तरह बनने या बिगड़ने की बात है इसीलिए वो पूरी तरह से मोदी समर्थक या विरोधी हैं। और, यही नरेंद्र मोदी का चरित्र है, ताकत है।

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