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मानव सेवा से बढ़कर दुनिया में कोई दूसरा धर्म नहीं है, इसलिए नर सेवा को नारायण सेवा कहा गया है; इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर राधेश्याम अग्रवाल जी ने मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में जनसंवेदना नाम की एक सामाजिक संस्था की नींव रखी। 72 वर्ष के राधेश्याम पिछले कई वर्षों से गरीब और जरूरतमंद लोगों की सेवा में तत्पर हैं।
भोपाल में जन्में राधेश्याम पेशे से एक पत्रकार हैं और इन्होंने देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया इकाईयों से साथ काम किया है। बर्तमान में सामाजिक पत्रकारिता को बढ़ावा देने के लिए न्यूज़ पोर्टल चलाते हैं और साथ में जनसंवेदना नाम की संस्था के बैनर तले गरीबो को भोजन कराते, लावारिशो के शव का विधि विधान से अन्त्य संस्कार कराते और मरीजो को अस्पताल पहुचाने का भी प्रबंध करते हैं।
13 साल पहले मुंबई में एक जानलेवा दुर्घटना में बाल-बाल बचने के बाद राधेश्याम ने अपना सारा जीवन मानव सेवा को समर्पित कर दिया। सबसे पहले उन्होंने लावारिश शवों के अंतिम संस्कार करने का बीड़ा उठाया। शुरूआती दिनों में उन्हें सबकुछ अकेले करना होता था। लेकिन धीरे-धीरे कई लोगों ने उनके इस प्रयास से प्रेरित होकर साथ देने शुरू कर दिए और दिनों-दिन यह कारवां बढ़ता चला गया।
गृहस्थ होते हुए भी सन्यासी का जीवन व्यतीत करने वाले राधेश्याम को न भूक सताती है, न प्यास की परवाह है, कैसे गरीबो का भला किया बस यही चिंता उन्हें सताती रहती है। आज जनसंवेदना के बैनर तले चार हज़ार से ज्यादा लावारिशों का अंतिम संस्कार कराया जा चुका है। इतना ही नहीं इनकी संस्था गरीब लोगों के बीच भोजन और कपड़े भी बांटा करती है।
राधेश्याम जी का यह प्रयास सचमुझ सराहनीय और प्रेरणा के योग्य है। उम्र के एक ऐसे पड़ाव में जहाँ लोग थक-हार जाते हैं, लेकिन राधेश्याम जी जरुरतमंदों का सहारा बनकर उभरें हैं। उनके जज्बे को हमारा सलाम।

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