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भोपाल। राज्य में १९७२ में मध्यप्रदेश प्रदूषण बोर्ड की स्थापना जिस उद्देश्य से की गई थी उस उद्देश्य की पूर्ति की दिशा में राज्य प्रदूषण बोर्ड अपनी जिम्मेदारी का निर्वाहन करता नजर नहीं आ रहा है। हालांकि राज्य प्रदूषण बोर्ड के अधिकारियों के मामले में सोम डिस्टलरी द्वारा बेतवा को प्रदूषित करने के मामले में विधानसभा की याचिका समिति ने अपनी रिपोर्ट में जिस तरह के शब्दों का उपयोग प्रदूषण निवारण मण्डल बोर्ड की कार्यप्रणाली को लेकर किया गया था। याचिका समिति ने अपने निष्कर्ष और अनुशंसाओं में प्रदूषण निवारण मण्डल के बारे में लिखा था कि उसके शीर्ष स्तर से लेकर निचले स्तर तक की जो भूमिका है वह निश्चित ही दुर्भाग्यजनक है और उसकी उदासीनता दर्शाती है,
मण्डल अध्यक्ष जैसे जिम्मेदार व्यक्ति जब समिति के समक्ष प्रोसीक्यूशन की कार्यवाही संबंधी बात कहकर जायें और उसका पालन न करें तो निचले अमले से क्या उम्मीद की जा सकती है। वहीं समिति की अनुशंसाओं में प्रदूषण मण्डल बोर्ड की कार्यप्रणाली के बारे में एक नहीं कई ऐसी अनुशंसाएं की गई थीं जिन्हें पढ़कर ऐस लगता है कि प्रदूषण मण्डल इस दिशा में आज भी गंभीर नहीं है जनहित में प्रदूषण की रोकथाम हेतु प्रभावी कार्यवाही करने की बजाए प्रदूषण निवारण मण्डल की गतिविधियां प्रदेश में फैल रहे प्रदूषण रोकने की बजाए भजकलदाम् में कुछ ज्यादा ही है
हालांकि दिग्विजय ङ्क्षसह के शासनकाल के फरवरी-मार्च १९९७ के सत्र में प्रस्तुत याचिका क्रमांक २६४४ (बेतवा नदी में प्रदूषण संबंधी) पर याचिका समिति का तीसवां प्रतिवेदन (भाग-दो) जो कि दिनांक एक मई १९९८ को मध्यप्रदेश विधानसभा में प्रस्तुत किया गया था उस प्रतिवेदन में दी गई अनुशंसाओं को असत्य बताने का काम भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल की द्वादश विधानसभा में प्रस्तुत प्रतिवेदन की सिफारिश पर शासन द्वारा की गई कार्यवाही पर याचिका समिति का बयालीसवां प्रतिवेदन जो कि दस जुलाई २०१३ को विधानसभा में प्रस्तुत किया गया था,
इस प्रतिवेदन के माध्यम से याचिका समिति के ही तीसवें प्रतिवेदन में की गई सोम डिस्टलरी के संबंध में अनुशंसाओं को असत्य करार दे दिया गया। इन दोनों प्रतिवेदनों को लेकर लोगों में तरह-तरह की चर्चाएं व्याप्त हैं और प्रदेश का आमजन इस सवाल का जवाब ढूंढने में लगा हुआ है कि एक मई १९९८ में विधानसभा में प्रस्तुत याचिका समिति का तीसवां प्रतिवेदन (भाग-दो) में सोम डिस्टलरी के द्वारा बेतवा प्रदूषण को लेकर याचिका समिति की अनुशंसाएं सही हैं कि भाजपा शासनकाल के दौरान दस जुलाई २०१३ को विधानसभा के पटल पर रखे गये बयालीसवें प्रतिवेदन किस प्रतिवेदन में दी गई अनुशंसा सही है और कौन गलत इस सही और गलत की तलाश को लेकर राज्य के प्रदूषण से जुड़े लोग खोजने में लगे हुए हैं
लेकिन इन दोनों प्रवितेदन के बाद यह बात लोगों को स्पष्ट दिखाई दे रही है और दिग्विजय सिंह के शासनकाल के दौरान सोम डिस्टलरी के परिसर में आयोजित समारोह में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा कहे गये वह शब्द भी लोगों को स्मरण आ रहे हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि अरेरा बंधुओं की तिजोरी पर लक्ष्मी सदैव प्रसन्न रहें…. ?
इससे यह साफ जाहिर हो जाता है कि राज्य सरकार सोम डिस्टलरी पर मेहरबान है तभी तो उसे हर तरह से लाभ पहुंचाने की कोशिश में रहती है फिर चाहे वह सोम डिस्टलरी पर लाखों रुपये बकाया का मामला हो या ट्राइफेड द्वारा दिये गये कर्जे की वसूली का मामला हो इन सब मामलों में प्रशासनिक अधिकारियों के रुख को देखते हुए सोम डिस्टलरी पर सरकार की मेहरबानी स्पष्ट नजर आ रही है।

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