Monday, July 16, 2012

शिखण्डी प्रशासन


              (डा. शशि तिवारी)
 जिस देश में स्त्री शक्ति, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती के रूप में पूजी जाती हो वहीं स्त्री के शीलहरण, र्दुव्यवहार, अनैतिकता को लांधती वर्जनाएं न केवल स्त्री समाज को उद्धेलित करती है बल्कि पुरूषों के दोहरे मापदण्डों एवं चाल-चरित्र की भी कलाई खोलती है, जिससे विश्वस्तर पर भारतीय संस्कृति भी कलंकित होती है। 
 ‘‘स्त्री’’ को ले असम प्रदेश सुर्खियों में पहले जनप्रतिनिधि महिला की उसके पति के साथ भीड़ के द्वारा बेरहमी से की गई पिटाई का मामला अभी शांत हुआ ही नहीं था कि 9 जुलाई को 15-20 वहशी दरिन्दों द्वारा गुवाहाटी के भीड़-भरे बाजार में एक नाबालिग लड़की पर न केवल भूखे भेडि़यों की तरह टूट पड़े, बल्कि आधे घण्टे तक नौच-खचोट में जुट कपड़े भी फाड़ डाले, लोग तमाशबीन बन खड़े रहे, लड़की मदद की गुहार लगाती रही, लेकिन कोई भी मदद के लिये आगे नहीं आया। ऐसा लगता है वहां खड़े सभी दर्शकों का खून नीला पड़ चुका था। 
 वो तो भला हो पत्रकार दिव्या बोरदोलोई का जिसकी सजगता के कारण देश के सामने शासन-प्रशासन का बेशर्मी का काला स्याहा चेहरा जो उजागर हुआ। ऊपर से प्रशासन के डी.जी.पी. का शर्मनाक बयान कि ’’पुलिस कोई ए.टी.एम. मशीन नहीं, घटना घटी तत्काल हाजिर’’ देश के गृहमंत्री पी. चिदंबरम् को ऐसे बेहया अफसर को फटकार लगाना पड़ी। गुवाहाटी के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने भी घटना के बाद अभी तक ऐसा कोई भी कड़ा कदम नहीं उठाया जिसका प्रभाव दिखें? घटना के सात दिन व्यतीत हो जाने के उपरांत भी 20 में से अभी तक मात्र 4 लड़कों का पकड़ाया जाना न केवल शिखण्डी प्रशासन को बताता है बल्कि कहीं न कहीं ऐसा भी अब लगता है शेष बचे लोगों में प्रभावशाली लोगों के साथ उनकी बिगडै़ल औलाद भी हो सकती है। 
 महिलाओं से छेड़छाड़, अभद्रता, सरेराह बेइज्जती, इज्जत का तार-तार होने की यह कोई पहली घटना नहीं है। ऐसा लगता है अब भारतीय मानस भी बरसाती मेंढ़क की तरह समाजसेवी, जनप्रतिनिधि, मीडिया, संगठन, महिला आयोग या ऐसे अन्य आयोग, नेता, राजनीति चमकायेंगे कुछ दिन टर-टर करेंगे, फिर वही ‘‘ढाक के तीन पात’’ सब कुछ सामान्य हो जायेगा अगली घटना के इंतजार में। 
 इसी तरह की घटना 2 जनवरी 2008 में मुंबई में नए साल के जश्न के दौरान् मैरिट होटल के पास घटी जिसमें नशे में डूबे 70-80 युवाओं ने दो महिलाओं के साथ-साथ उनके पुरूष मित्रों की भी पिटाई की गई। बिहार में 2009 को एक्जीवीशन रोड पर स्थित एक रेस्तरां में अपने पुरूष मित्र के साथ बैठी लड़की को रेस्तरां से बाहर घसीट कर बदसलूकी की गई। यूं तो ऐसी सेैकड़ों घटनाएं है। 
 भारतीय संस्कृति में ‘‘यत्र नारियस्तु पूज्यन्ते’’ का गुणगान कर न थकने वाले भारत के लोगों द्वारा ये ‘‘राक्षस संस्कृति’’ को बढ़ावा देना न ही देश के लिए अच्छा है और न ही युवाओं के लिए। 
 महिलाओं के साथ बढ़ती अत्याचार की घटनाओं एवं राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण के कारण ही कुछ यक्ष प्रश्न उठ खड़े होते है, मसलन जब हमारे जनप्रतिनिधि जिनके कंधों पर देश का भविष्य टिका हैं, उनमें अपराधी तत्वों की बढ़ती संख्या और उन पर सालों-साल अंतहीन चलने वाले केसों से प्रभावित हो आज का युवा भी उनके राजसी ठाट-बाट जीवन से उत्साहित हो जाने-आजाने में आपराधिक गलियों में बढ़ने को ही अपनी आन व शान समझ रहा है। आज कोई भी राजनीतिक पार्टी नारी देह शोषण, अय्यासी के किस्सों से अछूती नहीं है फिर बात चाहे सी डी काण्ड की हो या देह शोषण से उत्पन्न बच्चे की हो या हत्या की ही क्यों न हो। ये दुर्भाग्य के साथ कलंक का टीका तब और भी स्याहा हो जाता है जब संसद, विधानसभा एवं अन्य संवैधानिक पदों पर बढ़ती महिलाओं की संख्या मात्र भाषण एवं सहानुभूति एक दूसरे को देने के सिवाए कोई भी बडा आंदोलन खड़ा नहीं कर पाती, हो सकता है यह उनकी कोई राजनीतिक मजबूरी हो या पार्टी में ही हो सकता है उन्हें दोयम दर्जे की अहमियत हासिल हो? सिद्धांत और भाषणबाजी को छोड़ महिलाओं को एक सशक्त आंदोलन चलाना ही चाहिए, महिला के चरित्र की रक्षा के लिए। क्योंकि आज महिला ही सभी के निशाने पर है फिर चाहे वो समाजसेवी हो, राजनीतिज्ञ हो, अधिकारी हो, बाबाओं का आश्रम हो, मंदिर हो, या थाना हो? यहां यक्ष प्रश्न यह भी उठता है जब संसद मंे पक्ष और विपक्ष के सांसद बिना बहस के एक मिनट में अपनी पगार बढा सकते है तो आधी आबादी अर्थात् महिलाओं की इज्जत पर हाथ डालने वालों को ‘‘उम्रकैद का अधिनियम’’ क्यों नहीं बना पास करा सकते? आखिर बात आधी आबादी की जो हैं, इसमें घिनोनी राजनीति आड़े नहीं आने दी जाना चाहिए। आखिर इसमें महिला की अस्मिता की जो बात हैं।
शशि फीचर     लेखिका ‘‘सूचना मंत्र’’ पत्रिका की संपादक है 

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